रांची : झारखंड में स्थानीय शहरी निकाय चुनाव कराने में हो रही लगातार देरी को लेकर झारखंड उच्च न्यायालय ने एक बार फिर राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। गुरुवार, 10 अक्टूबर 2025 को माननीय न्यायमूर्ति आनंदा सेन की एकलपीठ में इस मामले की सुनवाई हुई। यह अवमानना याचिका पार्षद रोशनी खलखो द्वारा दायर की गई थी, जिसमें अदालत के पुराने आदेश का पालन न करने का आरोप लगाया गया है।
क्या है मामला?
दरअसल, अदालत ने अपने 04 जनवरी 2024 के आदेश में स्पष्ट निर्देश दिया था कि तीन हफ्तों के भीतर स्थानीय शहरी निकाय चुनाव संपन्न कराए जाएं। लेकिन सरकार द्वारा अब तक चुनाव न कराए जाने के कारण अदालत की अवमानना याचिका दायर हुई।
सुनवाई के दौरान स्थिति
सुनवाई में प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता विनोद सिंह ने पक्ष रखा। वहीं, सरकार की ओर से महाधिवक्ता (Advocate General) ने अपना पक्ष रखा। इस दौरान मुख्य सचिव अलका तिवारी और नगर विकास सचिव भी न्यायालय में मौजूद रहे।
सरकार की ओर से फिर से ट्रिपल टेस्ट कराकर चुनाव कराने की दलील दी गई। इस पर अदालत ने गहरी नाराजगी जताई और कहा कि सरकार बार-बार बहाने बना रही है और कानून के साथ खिलवाड़ कर रही है।
न्यायालय की टिप्पणी और नाराजगी
न्यायमूर्ति आनंदा सेन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार ने समय पर चुनाव न कराकर अदालत के आदेश की अवमानना की है। अदालत ने टिप्पणी की कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव समय पर होना जरूरी है और अदालत के आदेशों की अवहेलना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।
कड़े निर्देश और चार्ज फ्रेम की तैयारी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि अब यह स्पष्ट हो गया है कि अदालत की अवमानना हुई है। इसी संदर्भ में अदालत ने आदेश दिया कि अगली सुनवाई पर कई शीर्ष अधिकारी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हों। इनमें शामिल हैं:
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तत्कालीन नगर विकास सचिव विनय चौबे
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अपर सचिव ज्ञानेश कुमार
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वरिष्ठ आईएएस अधिकारी वंदना दादेल
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वर्तमान नगर विकास सचिव
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और मुख्य सचिव अलका तिवारी
अदालत ने आदेश दिया है कि 14 अक्टूबर 2025 को होने वाली अगली सुनवाई में इन सभी अधिकारियों पर चार्ज फ्रेम (आरोप तय करने) की कार्रवाई की जाएगी।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल
इस मामले ने राज्य की राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल को और तेज कर दिया है। सरकार पहले ही कई बार स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर विपक्ष और नागरिक संगठनों के निशाने पर रही है। अब न्यायालय के इस सख्त रुख ने सरकार के लिए मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
कुल मिलाकर, झारखंड उच्च न्यायालय ने यह साफ कर दिया है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया और न्यायालयीय आदेशों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। 14 अक्टूबर की अगली सुनवाई राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों के लिए बेहद अहम साबित होगी।
Reviewed by PSA Live News
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11:25:00 pm
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