लेखक: अशोक कुमार झा
संपादक, रांची दस्तक एवं PSA Live News
हिंदुस्तान की राजनीति में कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जो समय-समय पर केवल राजनीतिक बहस का विषय नहीं बनते, बल्कि समाज, संस्कृति, धर्म, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय पहचान से जुड़ी व्यापक चर्चा का केंद्र बन जाते हैं। गाय का विषय भी उन्हीं मुद्दों में से एक है। स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक देश में अनेक संतों, धार्मिक संगठनों, सामाजिक संस्थाओं तथा चारों शंकराचार्यों ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग उठाई है। भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े वैचारिक संगठनों ने भी वर्षों से गाय को भारतीय संस्कृति, कृषि परंपरा और सनातन सभ्यता का प्रतीक बताते हुए इसके संरक्षण की वकालत की है।
लेकिन हाल के दिनों में कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों द्वारा भी गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग किए जाने के बाद यह बहस अचानक नए मोड़ पर पहुंच गई है। यह मांग जितनी सरल दिखाई देती है, उसके राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक निहितार्थ उतने ही गहरे हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यह वास्तव में सामाजिक सद्भाव का प्रयास है, या फिर एक ऐसी राजनीतिक चाल है जिसने भाजपा को वैचारिक दुविधा में खड़ा कर दिया है?
वर्षों से भाजपा और व्यापक हिंदू समाज का एक बड़ा वर्ग यह कहता रहा है कि गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन का हिस्सा है। गांव की अर्थव्यवस्था, खेती-किसानी, दूध उत्पादन, जैविक कृषि और धार्मिक परंपराओं में गाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में जब मुस्लिम समाज का एक वर्ग भी उसी मांग का समर्थन करने लगे तो राजनीतिक समीकरण बदलना स्वाभाविक है।
यदि भाजपा इस मांग को स्वीकार करती है तो उसे अपने वैचारिक एजेंडे को लागू करने का श्रेय मिलेगा, लेकिन साथ ही यह भी कहा जाएगा कि इस मांग को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने में मुस्लिम नेतृत्व की भी भूमिका रही। दूसरी ओर यदि सरकार इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाती, तो विपक्ष यह प्रश्न पूछ सकता है कि दशकों से जिस मुद्दे को चुनावी मंचों पर उठाया गया, सत्ता में आने के बाद उसे लागू क्यों नहीं किया गया।
यहीं से भाजपा की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है।
यह भी संभव है कि इस मांग के पीछे कुछ मुस्लिम संगठनों की सोच यह हो कि वे बहुसंख्यक समाज की भावनाओं के प्रति सम्मान का संदेश देना चाहते हों। लंबे समय से गाय के मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम टकराव के चश्मे से देखा जाता रहा है। ऐसे में यदि मुस्लिम नेतृत्व स्वयं गाय संरक्षण का समर्थन करता है, तो इससे सामाजिक दूरी कम करने का संदेश भी जा सकता है। लेकिन राजनीति में किसी भी पहल का मूल्यांकन केवल भावनाओं से नहीं बल्कि उसके परिणामों से किया जाता है।
गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग का सबसे बड़ा और सबसे कम चर्चित पक्ष आर्थिक है। देश में भावनात्मक बहस बहुत होती है, लेकिन आर्थिक वास्तविकताओं पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। राष्ट्रीय पशु का दर्जा देना एक प्रतीकात्मक निर्णय हो सकता है, लेकिन उसके बाद संरक्षण, पुनर्वास, चिकित्सा, चारा, गौशालाओं और आवारा गोवंश के प्रबंधन की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाएगी।
आज देश के हजारों किसान आवारा पशुओं की समस्या से जूझ रहे हैं। अनेक राज्यों में किसान रातभर खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं। फसलें नष्ट हो रही हैं। हजारों गौशालाएं आर्थिक संकट का सामना कर रही हैं। यदि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से देश की जनता यह भी पूछेगी कि करोड़ों गोवंश के संरक्षण का खर्च कौन उठाएगा?
यहीं से अर्थव्यवस्था का प्रश्न सामने आता है।
आज हिंदुस्तान विश्व की सबसे बड़ी डेयरी अर्थव्यवस्था वाला देश है। करोड़ों ग्रामीण परिवार पशुपालन पर निर्भर हैं। डेयरी उद्योग लाखों करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था का आधार है। इसके अतिरिक्त चमड़ा उद्योग, पशु-आधारित उत्पाद, खाद्य प्रसंस्करण, परिवहन और निर्यात क्षेत्र भी इसी व्यवस्था से जुड़े हुए हैं।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पशुधन आधारित निर्यात का है। सार्वजनिक विमर्श में अक्सर "बीफ निर्यात" शब्द का प्रयोग किया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि हिंदुस्तान से निर्यात होने वाला अधिकांश मांस भैंस (बफैलो) का होता है, क्योंकि अधिकांश राज्यों में गाय के वध पर पहले से ही प्रतिबंध मौजूद है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय व्यापार में यह श्रेणी व्यापक रूप से "बीफ और बफैलो मीट" के अंतर्गत दर्ज की जाती है।
वित्तीय वर्ष 2024-25 के आंकड़े बताते हैं कि हिंदुस्तान का मांस निर्यात लगभग 35 हजार करोड़ रुपये से अधिक के स्तर पर पहुंच चुका है। इससे देश को अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। यह केवल निर्यातकों का कारोबार नहीं है, बल्कि इससे जुड़े लाखों किसान, पशुपालक, ट्रांसपोर्टर, कोल्ड स्टोरेज संचालक, श्रमिक और छोटे व्यवसायी अपनी आजीविका चलाते हैं।
ऐसे में यदि भविष्य में गोवंश संरक्षण के नाम पर अधिक कठोर नीतियां लागू होती हैं और उनका प्रभाव पशुधन आधारित व्यापार पर पड़ता है, तो सरकार के सामने स्वाभाविक प्रश्न होगा कि इस राजस्व और विदेशी मुद्रा की भरपाई कैसे की जाएगी?
क्या सरकार गोबर गैस उद्योग को इतना बड़ा बना पाएगी कि वह हजारों करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था खड़ी कर सके? क्या जैविक खेती और प्राकृतिक खाद का बाजार इतनी तेजी से विकसित हो पाएगा कि वह इस नुकसान की भरपाई कर सके? क्या पंचगव्य आधारित उत्पाद, जैविक कृषि और ग्रामीण ऊर्जा परियोजनाएं इतनी आय उत्पन्न कर पाएंगी कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को वैकल्पिक आधार मिल सके?
इन प्रश्नों के उत्तर आसान नहीं हैं।
गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के समर्थकों का तर्क है कि किसी राष्ट्र की पहचान केवल आर्थिक लाभ से निर्धारित नहीं होती। यदि कोई पशु करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक है, तो उसके संरक्षण के लिए आर्थिक कीमत चुकाई जा सकती है। दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि किसी भी निर्णय का मूल्यांकन उसके आर्थिक और सामाजिक प्रभावों के आधार पर भी होना चाहिए।
सच यह है कि दोनों पक्षों के तर्कों में वजन है।
आस्था का सम्मान भी आवश्यक है और आर्थिक यथार्थ को स्वीकार करना भी। किसी भी जिम्मेदार सरकार के लिए चुनौती यही होती है कि वह दोनों के बीच संतुलन स्थापित करे।
भाजपा के सामने भी आज यही चुनौती दिखाई दे रही है। यदि वह इस मांग को स्वीकार करती है तो उसे व्यापक राष्ट्रीय गौ-संरक्षण नीति, किसानों के लिए राहत पैकेज, गौशालाओं के लिए स्थायी वित्तीय व्यवस्था, आवारा पशुओं के पुनर्वास की योजना और वैकल्पिक आर्थिक मॉडल भी प्रस्तुत करना होगा। केवल घोषणा से समस्या का समाधान नहीं होगा।
दरअसल यह बहस गाय के राष्ट्रीय पशु बनने से कहीं बड़ी है। यह बहस उस हिंदुस्तान की है जो अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी सुरक्षित रखना चाहता है और आधुनिक आर्थिक विकास को भी आगे बढ़ाना चाहता है। यह बहस उस संतुलन की है जिसमें आस्था और अर्थव्यवस्था दोनों साथ चल सकें।
आज मुस्लिम नेताओं द्वारा उठाई गई इस मांग ने भाजपा, सरकार और पूरे देश के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया है। यदि गाय वास्तव में राष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है, तो क्या उसे राष्ट्रीय पशु का दर्जा मिलना चाहिए? और यदि मिलना चाहिए, तो उसके आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक परिणामों का बोझ कौन उठाएगा?
यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर केवल राजनीति नहीं, बल्कि नीति, अर्थशास्त्र और राष्ट्रीय दूरदृष्टि मिलकर ही दे सकते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक, रांची दस्तक और PSA Live News हैं। प्रस्तुत विचार लेखक के निजी हैं।)
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