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राजधानी से महज़ कुछ किलोमीटर दूर प्यासा गोविंदपुर

जहां इंसान, मवेशी और जंगली जानवर एक ही कुएं का पानी पीने को मजबूर


रांची। राजधानी रांची की चमक-दमक, बड़े सरकारी दावे, करोड़ों की योजनाएं और विकास के नारों के बीच एक ऐसा गांव भी है, जहां आज भी लोगों की जिंदगी पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष कर रही है। यह गांव है गोविंदपुर, जो Namkum प्रखंड के अंतर्गत आता है। राजधानी रांची से जुड़ा होने के बावजूद यहां की स्थिति ऐसी है, मानो यह गांव आज भी दशकों पीछे छूट गया हो।

गांव के लोग आज भी उस कुएं का पानी पीने को मजबूर हैं, जहां इंसानों के साथ-साथ मवेशी और जंगली जानवर भी पानी पीते हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि यही पानी गांव के बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की प्यास बुझाने का एकमात्र सहारा बना हुआ है। गांव की महिलाएं और बच्चे रोजाना लगभग तीन किलोमीटर पैदल चलकर इस कुएं तक पहुंचते हैं, फिर उसी गंदे पानी को किसी तरह कपड़े से छानकर घर ले जाते हैं। यही पानी खाना बनाने, पीने और दैनिक जरूरतों में इस्तेमाल किया जाता है।

विकास के दावों पर बड़ा सवाल

झारखंड सरकार लगातार “हर घर नल”, “शुद्ध पेयजल”, “ग्रामीण विकास” और “स्वच्छ गांव” जैसे दावे करती रही है। लेकिन गोविंदपुर की तस्वीर इन दावों की सच्चाई को उजागर कर रही है। राजधानी के पास बसे इस गांव में आज तक न तो पाइपलाइन से शुद्ध पानी पहुंच पाया और न ही कोई स्थायी जलस्रोत विकसित किया गया।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब राजधानी के समीप बसे गांवों की यह हालत है, तो दूरदराज के आदिवासी और पहाड़ी इलाकों की स्थिति कैसी होगी? गोविंदपुर की कहानी केवल एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की असफलता का जीवंत उदाहरण बन चुकी है।

एक कुआं, पूरा गांव और मौत का डर

ग्रामीण बताते हैं कि गर्मी के दिनों में पानी की स्थिति और भी भयावह हो जाती है। कुएं का जलस्तर नीचे चला जाता है और पानी में गंदगी बढ़ जाती है। उसी पानी में जानवर उतर जाते हैं, जंगली पशु भी वहां पानी पीते हैं, लेकिन मजबूरी ऐसी है कि गांव वालों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं।

ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दिनों में कुएं का पानी और दूषित हो जाता है। कई बार पानी से बदबू आने लगती है, लेकिन पीने के लिए वही एकमात्र साधन है। गांव के बुजुर्गों को हमेशा इस बात का डर सताता रहता है कि कहीं पूरा गांव किसी बड़ी बीमारी की चपेट में न आ जाए।

बीमारी का खतरा, लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था भी दूर

गंदा पानी सीधे तौर पर डायरिया, टाइफाइड, हैजा, पीलिया और त्वचा रोग जैसी गंभीर बीमारियों को जन्म देता है। गांव के लोगों का कहना है कि कई बार बच्चे बीमार पड़ते हैं, पेट दर्द और उल्टी-दस्त की शिकायत आम हो चुकी है। लेकिन स्वास्थ्य सुविधाएं भी गांव से काफी दूर हैं। गरीब परिवार इलाज कराने में असमर्थ रहते हैं और मजबूरी में घरेलू उपचार से काम चलाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी गांव में स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था नहीं हो, तो वहां महामारी फैलने का खतरा हमेशा बना रहता है। गोविंदपुर में यही डर अब ग्रामीणों के मन में स्थायी रूप से बैठ चुका है।

सांसद और जनप्रतिनिधियों पर उठ रहे सवाल

यह गांव उसी संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जहां के सांसद केंद्र सरकार में रक्षा राज्य मंत्री हैं। ऐसे में ग्रामीणों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर राजधानी के पास बसे इस गांव की पीड़ा सत्ता और प्रशासन तक क्यों नहीं पहुंच रही?

ग्रामीणों का आरोप है कि चुनाव के समय नेता गांव में आते हैं, विकास के बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही गांव फिर अपनी बदहाली में छोड़ दिया जाता है। कई बार स्थानीय अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को पानी की समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया।

“हर घर नल” योजना पर सवाल

केंद्र और राज्य सरकारें करोड़ों रुपये खर्च कर “हर घर नल योजना” और ग्रामीण पेयजल योजनाओं का प्रचार करती हैं। विज्ञापनों में गांवों तक शुद्ध पानी पहुंचाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन गोविंदपुर जैसे गांव उन दावों की जमीनी सच्चाई बयान कर रहे हैं।

अगर राजधानी से सटे गांवों में लोग जानवरों के साथ एक ही कुएं का पानी पीने को मजबूर हैं, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनहीनता का भी बड़ा उदाहरण है।

महिलाओं की सबसे बड़ी पीड़ा

इस संकट का सबसे बड़ा बोझ गांव की महिलाओं पर पड़ रहा है। तपती गर्मी में कई किलोमीटर पैदल चलकर पानी लाना उनकी मजबूरी बन चुकी है। सुबह से लेकर शाम तक उनका बड़ा समय केवल पानी जुटाने में ही निकल जाता है। कई बार महिलाएं रात या तड़के सुबह पानी भरने निकलती हैं, ताकि लाइन कम मिले।

गांव की महिलाओं का कहना है कि अगर गांव में पानी की व्यवस्था हो जाए, तो उनकी आधी जिंदगी आसान हो जाएगी। लेकिन वर्षों से केवल आश्वासन ही मिल रहा है।

राजधानी की चमक और गांव की अंधेरी सच्चाई

एक तरफ राजधानी रांची में बड़े-बड़े भवन, स्मार्ट सड़कें, सरकारी कार्यक्रम और विकास की बातें हो रही हैं, वहीं दूसरी तरफ गोविंदपुर जैसे गांव आज भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह तस्वीर केवल पानी की समस्या नहीं दिखाती, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है, जिसमें गांवों की वास्तविक समस्याएं अक्सर फाइलों और भाषणों में दबकर रह जाती हैं।

अब बड़ा सवाल…

क्या गोविंदपुर के ग्रामीणों को स्वच्छ पानी मिल पाएगा?
क्या प्रशासन इस गांव की पीड़ा को गंभीरता से लेगा?
क्या “हर घर नल” योजना वास्तव में धरातल तक पहुंचेगी?
या फिर राजधानी के पास बसे इस गांव के लोग यूं ही जानवरों के साथ एक ही कुएं का पानी पीने को मजबूर रहेंगे?

गोविंदपुर आज केवल पानी नहीं मांग रहा…
वह व्यवस्था से अपना बुनियादी अधिकार मांग रहा है —
“जीने का अधिकार, स्वच्छ पानी का अधिकार।”

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