राज्य की राजधानी का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल RIMS (राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान) खुद बीमार!—मरीजों से ज़्यादा अव्यवस्था से जूझ रहा अस्पताल
रांची। झारखंड की राजधानी का सबसे बड़ा और प्रमुख सरकारी अस्पताल राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) आज गंभीर बीमारियों से नहीं, बल्कि अपनी अव्यवस्था, गंदगी और कुप्रबंधन से जूझ रहा है। यह वही संस्थान है, जहां पूरे राज्य से हज़ारों मरीज हर दिन जीवन की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। लेकिन अफसोस, अस्पताल की मौजूदा स्थिति देखकर लगता है मानो यह खुद किसी गहरी बीमारी की चपेट में है।
मरीजों की जगह परिजन ढो रहे स्ट्रेचर
अस्पताल में वॉर्डबॉय और नर्सिंग असिस्टेंट्स की भारी कमी है। स्थिति यह है कि मरीजों को स्ट्रेचर पर लाने-ले जाने का काम अब उनके परिजन ही करते दिखाई देते हैं। कई बार स्ट्रेचर टूटे या असमतल फर्श के कारण पलटते-पलटते बचते हैं। अस्पताल के कई हिस्सों की फर्श दरारों से भरी हुई है, और गलियारों में गड्ढे व असमान सतहों के कारण मरीजों को इधर-उधर ले जाना बेहद जोखिम भरा बन गया है।
पानी की किल्लत और टूटी मशीनें
RIMS के कई वार्डों में पीने के पानी की सुविधा लगभग ठप है। कुछ जगहों पर वॉटर कूलर महीनों से खराब पड़े हैं, जबकि कुछ वार्डों में तो नल में पानी ही नहीं आता। मरीजों और परिजनों को या तो बोतलबंद पानी खरीदना पड़ता है या पास के हैंडपंपों से पानी भरना पड़ता है।
बाथरूम बंद, दीवारों पर उग आए पेड़
अस्पताल की कई मंज़िलों के बाथरूम महीनों से बंद पड़े हैं। साफ-सफाई न होने के कारण उनमें बदबू और संक्रमण का खतरा लगातार बना हुआ है। वहीं, दीवारों और छज्जों पर उगे पीपल के पेड़ अब भवन की संरचना के लिए भी खतरा बन गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन पेड़ों को जल्द नहीं हटाया गया, तो दीवारों में दरारें और चौड़ी हो सकती हैं, जिससे भवन की मजबूती प्रभावित होगी।
खुले में मेडिकल वेस्ट, कचरे के ढेर
अस्पताल परिसर के कई हिस्सों में कचरे के ऊँचे ढेर जमा हैं। कई जगह इस्तेमाल की गई सिरिंज, ग्लव्स, पट्टियाँ और मेडिकल वेस्ट खुले में पड़े हुए हैं। यह न केवल संक्रमण का खतरा बढ़ाते हैं, बल्कि आवारा जानवरों और मक्खियों का अड्डा भी बन चुके हैं। संक्रमण विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे हालात किसी भी वक्त संक्रामक रोगों के प्रसार का कारण बन सकते हैं।
मरीजों के परिजन गलियारों में रात बिताने को मजबूर
अस्पताल में परिजनों के लिए कोई अलग वेटिंग रूम या विश्राम कक्ष नहीं है। रात के समय सैकड़ों लोग गलियारों, सीढ़ियों और खाली जगहों में बिस्तर बिछाकर सोते हैं। इससे न सिर्फ अस्पताल में भीड़ बढ़ती है, बल्कि मरीजों को लाने-ले जाने में रुकावट भी होती है। कई मरीज तो बिस्तर न मिलने पर ज़मीन पर ही इलाज कराने को मजबूर हैं।
बिना ग्लव्स के खाना परोसते कर्मचारी
मरीजों को खाना देने वाले कई स्टाफ ग्लव्स या फेस मास्क के बिना ही भोजन परोसते देखे गए हैं। अस्पताल में स्वच्छता के बुनियादी नियमों का पालन लगभग न के बराबर है। खुले कचरे के पास भोजन तैयार और परोसा जाता है, जिससे संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
संक्रमण का खतरा, महामारी की आशंका
चिकित्सक भी मानते हैं कि अस्पताल में आने वाले मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले से ही कमजोर होती है। ऐसे में, गंदगी, दूषित पानी, खुले कचरे और बिना सुरक्षा उपकरणों के काम करने वाले स्टाफ से संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि स्थिति पर तत्काल सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह संक्रमण फैलने और महामारी के रूप लेने की आशंका को जन्म दे सकता है।
प्रशासन मौन, मरीज त्रस्त
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन सभी समस्याओं के बावजूद अस्पताल प्रशासन की चुप्पी बनी हुई है। कई बार शिकायतों के बावजूद न तो नियमित सफाई होती है, न ही टूटे उपकरणों की मरम्मत। अस्पताल की प्रबंधन समिति की बैठकें भी औपचारिकता तक सीमित हैं।
ज़रूरत है ठोस सुधार की
RIMS झारखंड की चिकित्सा व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। लेकिन मौजूदा हालात न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल रहे हैं, बल्कि सरकार और प्रशासन की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं। अब समय आ गया है कि राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग तत्काल हस्तक्षेप कर अस्पताल में सुधार अभियान चलाए, ताकि वह सचमुच “राज्य का सबसे बड़ा और सक्षम चिकित्सा संस्थान” कहलाने योग्य बन सके — न कि “अव्यवस्था का सबसे बड़ा उदाहरण।”
Reviewed by PSA Live News
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11:17:00 pm
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