रामनवमी पर ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन का संदेश: “राजा राम और राज्यदाता राम को समझे बिना अधूरी है राम की पहचान”
राँची: रामनवमी के पावन अवसर पर प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के स्थानीय सेवा केन्द्र में आयोजित आध्यात्मिक कार्यक्रम में केन्द्र संचालिका ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन ने भगवान राम के स्वरूप पर गहन आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि समाज में प्रचलित मान्यताओं के विपरीत, “राम” को केवल एक ऐतिहासिक राजा के रूप में देखना अधूरा ज्ञान है, जबकि वास्तव में राम के दो स्वरूपों को समझना आवश्यक है।
निर्मला बहन ने विस्तार से बताते हुए कहा कि एक ओर त्रेतायुग के मर्यादा पुरुषोत्तम, दशरथ पुत्र, शरीरधारी राजा राम हैं, जो चौदह कलाओं से पूर्ण थे और जिनके जीवन का स्मरण करते हुए रामनवमी का पर्व मनाया जाता है। वहीं दूसरी ओर “राज्य भाग्य के दाता राम” हैं, जिन्हें उन्होंने निराकार, अशीरी और सदा निर्लिप्त परमात्मा स्वरूप बताया। उन्होंने कहा कि यही निराकार परमात्मा “रामेश्वर” या “शिव” के रूप में जाने जाते हैं, जिनकी स्मृति में दक्षिण भारत के रामेश्वरम में मंदिर स्थापित है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जहाँ रामनवमी भगवान राम के शारीरिक जन्म की स्मृति का प्रतीक है, वहीं महाशिवरात्रि परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का पर्व है। उनके अनुसार, त्रेतायुग के राम “पावन” थे, जबकि परमात्मा शिव “पतित-पावन” हैं, जो कलयुग के दुखी संसार को पवित्र बनाने के लिए अवतरित होते हैं।
अपने संबोधन में उन्होंने रामायण के आध्यात्मिक अर्थों को भी समझाया। उन्होंने कहा कि वर्तमान कलयुग ही “कंटों का वन” है और मनुष्य का शरीर “पंचवटी” के समान है, जिसमें आत्मा रूपी सीता निवास करती है। मन में धारण किया गया लक्ष्य ही लक्ष्मण रेखा है, जिसका उल्लंघन करने पर आत्मा माया रूपी रावण के प्रभाव में आ जाती है। रावण को उन्होंने भौतिक नहीं, बल्कि नकारात्मक प्रवृत्तियों और विकारों का प्रतीक बताया।
निर्मला बहन ने आगे कहा कि जब संसार में अधर्म और अज्ञान बढ़ता है, तब परमात्मा शिव मनुष्य शरीर में प्रवेश कर आत्माओं को माया के बंधन से मुक्त करने का दिव्य कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि आज के “वानर” वे मनुष्य हैं, जो विकारों से ग्रसित हैं, लेकिन परमात्मा के ज्ञान के माध्यम से वही पत्थर बुद्धि आत्माएं ज्ञान सेतु बनाकर जीवन को पार कर सकती हैं।
कार्यक्रम के अंत में उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि रामनवमी के इस शुभ अवसर पर केवल उत्सव न मनाकर आत्मिक जागृति का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि यदि हम परमपिता निराकार शिव के ईश्वरीय ज्ञान को अपने जीवन में धारण करें, तो हम भी सर्वगुण सम्पन्न, निर्विकारी और अहिंसक बन सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि सच्चे अर्थों में “रामराज्य” की स्थापना तभी संभव है, जब प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर की बुराइयों को त्यागकर आध्यात्मिक मूल्यों को अपनाए। यही वह आदर्श है, जिसकी कामना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी की थी।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया और आध्यात्मिक ज्ञान के माध्यम से जीवन को सकारात्मक दिशा देने का संकल्प लिया।
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7:13:00 am
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