84 वर्ष की उम्र में जेल, लेकिन तीन दशक की देरी का हिसाब कौन देगा?
भारत की न्याय व्यवस्था को लेकर एक पुरानी कहावत बार-बार दोहराई जाती है—"Justice delayed is justice denied" अर्थात् विलंबित न्याय, न्याय से वंचित करने के समान है। हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया जिसमें वर्ष 1992 में हुए अपराध में वर्ष 2026 में सजा सुनाई गई। कुल पांच आरोपियों में से चार की मृत्यु हो चुकी है और अब 84 वर्ष की आयु में बचे एक आरोपी को जेल जाना होगा। इस घटना ने केवल एक मुकदमे का अंत नहीं किया, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने खड़े कई असहज प्रश्नों को फिर से जीवित कर दिया है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या 34 वर्ष बाद सुनाई गई सजा वास्तव में न्याय है? यदि है, तो इतनी देरी के लिए जिम्मेदार कौन है? और यदि नहीं, तो इस व्यवस्था में सुधार कब होगा?
यह मामला केवल एक व्यक्ति, एक परिवार या एक अदालत का मामला नहीं है। यह भारत की उस न्यायिक व्यवस्था का आईना है जहां लाखों मुकदमे वर्षों नहीं, बल्कि दशकों तक लंबित रहते हैं। जहां पीड़ित न्याय की प्रतीक्षा करते-करते बूढ़े हो जाते हैं, गवाह मर जाते हैं, साक्ष्य कमजोर पड़ जाते हैं और कई बार आरोपी तथा पीड़ित दोनों ही इस दुनिया से चले जाते हैं।
न्याय का मूल उद्देश्य केवल अपराधी को दंड देना नहीं होता। उसका उद्देश्य पीड़ित को संतोष देना, समाज में कानून के प्रति विश्वास बनाए रखना और भविष्य में अपराध को रोकना भी होता है। लेकिन जब फैसला आने में 34 वर्ष लग जाएं तो इन उद्देश्यों की सार्थकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
यदि 1992 में कोई व्यक्ति अपराध का शिकार हुआ था, तो उसके परिवार ने न्याय की प्रतीक्षा में जीवन के 34 वर्ष गुजार दिए। संभव है कि पीड़ित के माता-पिता, पत्नी या अन्य परिजन आज जीवित भी न हों। ऐसे में अदालत का फैसला कानूनी दृष्टि से भले ही सही हो, लेकिन सामाजिक और मानवीय दृष्टि से वह अधूरा महसूस होता है।
दूसरी ओर आरोपी के दृष्टिकोण से भी प्रश्न कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि कोई व्यक्ति दोषी है तो उसे सजा अवश्य मिलनी चाहिए। कानून का यही सिद्धांत है। लेकिन जब कोई व्यक्ति 50 वर्ष की उम्र में आरोपी बनता है और 84 वर्ष की उम्र में सजा पाता है, तब यह सवाल उठता है कि क्या व्यवस्था ने अपना दायित्व समय पर निभाया?
यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि न्याय में देरी का अर्थ अपराध को माफ कर देना नहीं है। अपराध अपराध ही रहता है, चाहे एक दिन पुराना हो या 30 वर्ष पुराना। यदि अदालत ने साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी पाया है तो सजा मिलनी ही चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी उतना ही सत्य है कि न्यायिक प्रक्रिया की अत्यधिक देरी स्वयं व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करती है।
भारत में आज करोड़ों मुकदमे विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। उच्चतम न्यायालय से लेकर जिला अदालतों तक न्यायाधीशों की कमी, बुनियादी ढांचे का अभाव, बार-बार स्थगन, जांच एजेंसियों की धीमी कार्यप्रणाली और प्रशासनिक कमियां इस समस्या को लगातार बढ़ा रही हैं। परिणामस्वरूप कई मुकदमे पीढ़ियों तक चलते रहते हैं।
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पांच में से चार आरोपी अब जीवित नहीं हैं। इसका अर्थ है कि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही अधिकांश आरोपियों का जीवन समाप्त हो गया। यदि वे दोषी थे तो वे कानूनी दंड से बच गए। यदि निर्दोष थे तो वे अपने ऊपर लगे आरोपों से पूर्णतः मुक्त होने का अवसर भी नहीं पा सके। दोनों ही स्थितियां न्याय व्यवस्था के लिए चिंता का विषय हैं।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि ऐसे मामलों से आम नागरिक का न्यायपालिका पर विश्वास प्रभावित होता है। जब लोग देखते हैं कि किसी मामले में फैसला आने में तीन दशक से अधिक समय लग गया, तो उनके मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि उनके साथ कोई अन्याय हुआ तो क्या उन्हें भी न्याय पाने के लिए जीवन भर इंतजार करना पड़ेगा?
हालांकि इस पूरी बहस का दूसरा पक्ष भी है। कुछ लोग कहते हैं कि देर से मिला न्याय भी न्याय है। यदि अपराध सिद्ध हुआ है तो अपराधी को सजा मिलनी चाहिए, चाहे कितना भी समय बीत गया हो। अन्यथा समाज में यह संदेश जाएगा कि समय बीत जाने पर अपराध स्वतः समाप्त हो जाते हैं। कानून की नजर में अपराध की गंभीरता समय के साथ कम नहीं होती।
यह तर्क भी महत्वपूर्ण है। यदि केवल देरी के आधार पर अपराधियों को सजा से छूट मिलने लगे तो न्याय व्यवस्था का पूरा ढांचा कमजोर पड़ जाएगा। इसलिए अदालतों का दायित्व है कि वे साक्ष्यों और कानून के आधार पर निर्णय लें, न कि जनभावनाओं के आधार पर।
लेकिन यहां असली प्रश्न सजा का नहीं, बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही का है।
यदि एक मुकदमे में 34 वर्ष लगे, तो क्या किसी अधिकारी, जांच एजेंसी, अभियोजन पक्ष या प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही तय हुई? क्या किसी ने यह जांच की कि देरी क्यों हुई? कितनी बार तारीखें बदली गईं? कितनी बार फाइलें रुकीं? कितनी बार गवाह नहीं आए? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या ऐसी देरी दोबारा न हो, इसके लिए कोई ठोस व्यवस्था बनाई गई?
दुर्भाग्य से भारत में न्यायिक देरी पर चर्चा तो होती है, लेकिन जवाबदेही शायद ही कभी तय होती है।
आज आवश्यकता केवल अदालतों की संख्या बढ़ाने की नहीं है। आवश्यकता है न्यायिक सुधारों की, तकनीकी आधुनिकीकरण की, समयबद्ध सुनवाई की और सबसे बढ़कर जवाबदेही की। फास्ट ट्रैक अदालतें, डिजिटल केस प्रबंधन, न्यायाधीशों की नियुक्ति में तेजी और अनावश्यक स्थगनों पर नियंत्रण जैसे कदम अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुके हैं।
यह मामला हमें याद दिलाता है कि न्याय केवल फैसले का नाम नहीं है। न्याय समय, संवेदनशीलता और प्रभावशीलता का भी नाम है। यदि फैसला आने में एक पीढ़ी बीत जाए तो कानून अपना काम भले कर दे, लेकिन समाज के भीतर न्याय की अनुभूति अधूरी रह जाती है।
अंततः प्रश्न केवल यह नहीं है कि 84 वर्ष की उम्र में जेल जाने वाला व्यक्ति दोषी है या नहीं। बड़ा प्रश्न यह है कि 34 वर्षों तक लंबित रही प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार कौन है? यदि इस प्रश्न का उत्तर नहीं खोजा गया तो भविष्य में भी हजारों परिवार इसी तरह न्याय की प्रतीक्षा में अपना जीवन गुजारते रहेंगे।
न्याय की सबसे बड़ी शक्ति उसकी निष्पक्षता है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी आवश्यकता उसकी समयबद्धता है। क्योंकि अदालत का फैसला जितना महत्वपूर्ण होता है, उतना ही महत्वपूर्ण होता है उसका समय पर आना।
लेखक का परिचय
अशोक कुमार झा देश के वरिष्ठ पत्रकारों और सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषकों में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। वे "रांची दस्तक" एवं "PSA Live News" के प्रधान संपादक हैं। तीन दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय अशोक कुमार झा राष्ट्रीय सुरक्षा, राजनीति, सामाजिक न्याय, ग्रामीण विकास, प्रशासनिक जवाबदेही, जनहित के मुद्दों और समसामयिक घटनाओं पर निर्भीक, निष्पक्ष और तथ्याधारित लेखन के लिए जाने जाते हैं।
उनके लेख देश के अनेक प्रतिष्ठित समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और डिजिटल मंचों पर प्रकाशित होते रहे हैं। जनसरोकारों से जुड़े विषयों को मजबूती से उठाना, व्यवस्था की कमियों को उजागर करना और सत्ता से असहज प्रश्न पूछना उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है। उन्होंने हमेशा पत्रकारिता को केवल समाचार प्रसारण का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की निगरानी और जनता की आवाज़ को सशक्त बनाने के दायित्व के रूप में देखा है।
सामाजिक न्याय, प्रशासनिक पारदर्शिता, न्यायिक सुधार, ग्रामीण भारत की चुनौतियां और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही उनके लेखन के प्रमुख विषय रहे हैं। उनकी लेखनी तथ्यों की मजबूती, स्पष्ट विचार और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता के लिए जानी जाती है।
अशोक कुमार झा का स्पष्ट मानना है कि "पत्रकारिता केवल खबर देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और लोकतंत्र के प्रति जवाबदेही निभाने का सबसे बड़ा दायित्व है।"
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