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संपादकीय : अश्लील और जातिसूचक गीतों पर बिहार सरकार का शिकंजा: सांस्कृतिक शुद्धिकरण की पहल या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नई बहस?



बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर अश्लील, द्विअर्थी और जातिसूचक गीतों के प्रसारण पर प्रभावी नियंत्रण लगाने की पहल ने राज्य में एक महत्वपूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक बहस को जन्म दे दिया है। पहली नजर में यह निर्णय समाज में बढ़ती अश्लीलता, महिलाओं के प्रति अपमानजनक मानसिकता और जातीय विद्वेष को रोकने की दिशा में एक सकारात्मक कदम प्रतीत होता है। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर सरकारी हस्तक्षेप की तरह यह निर्णय भी कई सवालों, आशंकाओं और संभावनाओं के साथ सामने आया है।

सवाल यह नहीं है कि अश्लीलता अच्छी है या बुरी। सवाल यह है कि समाज किस दिशा में आगे बढ़ रहा है और सरकार उस दिशा को किस सीमा तक नियंत्रित कर सकती है।

पिछले डेढ़-दो दशकों में डिजिटल क्रांति ने मनोरंजन की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। कभी गांवों के चौपालों और मेलों में लोकगीतों की गूंज सुनाई देती थी, आज वहां डीजे संस्कृति का बोलबाला है। बिहार, पूर्वांचल और उत्तर भारत के कई हिस्सों में ऐसे गीतों का एक बड़ा बाजार विकसित हुआ है जिनकी लोकप्रियता का आधार कला नहीं बल्कि उत्तेजना, अश्लीलता और सामाजिक विभाजन है। विवाह समारोहों, बारातों, राजनीतिक जुलूसों और सार्वजनिक आयोजनों में खुलेआम ऐसे गीत बजाए जाते हैं जिनमें महिलाओं के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग होता है, जातीय श्रेष्ठता का प्रदर्शन किया जाता है और कई बार सामाजिक वैमनस्य को भी बढ़ावा मिलता है।

यह स्थिति केवल सांस्कृतिक गिरावट का संकेत नहीं है, बल्कि समाज की बदलती मानसिकता का भी आईना है।

सरकार ने अपने पत्र में बिल्कुल सही चिंता व्यक्त की है कि ऐसे गीत महिलाओं और बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपनी महिलाओं को कितना सम्मान देता है। यदि सार्वजनिक स्थानों पर ऐसे गीत बज रहे हों जिन्हें परिवार के साथ बैठकर सुना नहीं जा सकता, तो यह केवल मनोरंजन का प्रश्न नहीं रह जाता बल्कि सामाजिक मर्यादा और सार्वजनिक शिष्टाचार का विषय बन जाता है।

आज जब देश महिला सुरक्षा, लैंगिक समानता और महिला सम्मान की बात कर रहा है, तब यह भी आवश्यक है कि सार्वजनिक मंचों पर महिलाओं को वस्तु की तरह प्रस्तुत करने वाली मानसिकता पर रोक लगे। इस दृष्टि से बिहार सरकार की पहल का स्वागत किया जाना चाहिए।

लेकिन इस पूरे मामले का दूसरा पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार है। कला, साहित्य और संगीत हमेशा से समाज के विचारों और भावनाओं की अभिव्यक्ति के माध्यम रहे हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आखिर अश्लीलता की परिभाषा कौन तय करेगा? कौन यह निर्णय करेगा कि कोई गीत सांस्कृतिक है या असांस्कृतिक? कौन यह निर्धारित करेगा कि किसी गीत में जातीय गौरव है या जातीय विद्वेष?

यहीं से विवाद की शुरुआत होती है।

इतिहास गवाह है कि कई बार सत्ता और प्रशासन ने नैतिकता के नाम पर रचनात्मक अभिव्यक्ति को सीमित करने का प्रयास किया है। यदि स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं बनाए गए तो यह आशंका बनी रहेगी कि कहीं यह पहल मनमाने प्रतिबंधों का माध्यम न बन जाए। लोकतंत्र में कानून की सफलता उसकी कठोरता से नहीं बल्कि उसकी निष्पक्षता और पारदर्शिता से तय होती है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या समाप्त नहीं होती। आज का दौर इंटरनेट और सोशल मीडिया का है। यदि कोई गीत यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम या अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है तो उसे सुनने वालों की कमी नहीं होगी। इसलिए केवल सार्वजनिक स्थलों पर प्रतिबंध लगाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा।

असल चुनौती समाज की सोच बदलने की है।

जब तक दर्शक और श्रोता ऐसे गीतों को लोकप्रिय बनाते रहेंगे, तब तक ऐसे गीत बनते रहेंगे। मांग होगी तो बाजार भी होगा। इसलिए सरकार को केवल दंडात्मक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि सकारात्मक सांस्कृतिक विकल्प भी तैयार करने होंगे।

बिहार की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध रही है। विद्यापति के पद, भिखारी ठाकुर के लोकनाट्य, महेंद्र मिश्र के लोकगीत, नागार्जुन की रचनाएं और मिथिला, मगध, भोजपुर तथा अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपराएं आज भी भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। दुर्भाग्य से आधुनिक बाजारवाद के दबाव में इन मूल्यों को पीछे धकेल दिया गया है। यदि सरकार वास्तव में सांस्कृतिक पुनर्जागरण चाहती है तो उसे लोक कलाकारों को संरक्षण देना होगा, स्वच्छ मनोरंजन को प्रोत्साहित करना होगा और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना होगा।

जातिसूचक गीतों पर नियंत्रण का मुद्दा भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बिहार ने जातीय संघर्षों और सामाजिक विभाजन का लंबा दौर देखा है। ऐसे में यदि कोई गीत किसी जाति को श्रेष्ठ और दूसरी को हीन सिद्ध करने का प्रयास करता है तो वह केवल मनोरंजन नहीं बल्कि सामाजिक तनाव का कारण बन सकता है। ऐसे गीतों पर नियंत्रण सामाजिक सौहार्द की दृष्टि से आवश्यक प्रतीत होता है। लेकिन यहां भी समान रूप से कानून लागू होना चाहिए। किसी विशेष वर्ग या समुदाय को निशाना बनाकर की गई कार्रवाई सामाजिक विवाद को और बढ़ा सकती है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि बिहार सरकार का यह कदम न तो पूरी तरह गलत है और न ही अपने आप में अंतिम समाधान। यह एक ऐसी पहल है जिसकी सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। यदि सरकार पारदर्शिता, निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों का पालन करते हुए आगे बढ़ती है तो यह निर्णय समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। लेकिन यदि इसका उपयोग नियंत्रण और दमन के औजार के रूप में किया गया तो यह नई बहसों और विवादों को जन्म देगा।

समाज को अश्लीलता से बचाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के बीच संतुलन बनाना ही इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी चुनौती होगी। यही संतुलन तय करेगा कि बिहार सरकार की यह पहल सांस्कृतिक सुधार का अध्याय बनेगी या लोकतांत्रिक विमर्श का नया विवाद।


लेखक का परिचय

अशोक कुमार झा देश के वरिष्ठ पत्रकारों और सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषकों में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। वे "रांची दस्तक" एवं "PSA Live News" के प्रधान संपादक हैं। तीन दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय अशोक कुमार झा राष्ट्रीय सुरक्षा, राजनीति, सामाजिक न्याय, ग्रामीण विकास, प्रशासनिक जवाबदेही, जनहित के मुद्दों और समसामयिक घटनाओं पर निर्भीक एवं तथ्याधारित लेखन के लिए जाने जाते हैं। उनके लेख अनेक प्रतिष्ठित समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और डिजिटल मंचों पर प्रकाशित होते रहे हैं।

जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को बेबाकी से उठाना, सत्ता से असहज सवाल पूछना और आम नागरिक की आवाज़ को प्रमुखता देना उनकी पत्रकारिता की सबसे बड़ी पहचान है। वे मानते हैं कि लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता, बल्कि जागरूक नागरिकों और जिम्मेदार पत्रकारिता से सशक्त बनता है। उनकी लेखनी सत्ता और समाज दोनों के लिए एक आईना प्रस्तुत करती है। अशोक कुमार झा का स्पष्ट मानना है कि "पत्रकारिता केवल खबर देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और लोकतंत्र के प्रति जवाबदेही निभाने का सबसे बड़ा दायित्व है।"

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