रांची। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि झारखंड की समृद्ध जनजातीय संस्कृति में करमा पर्व प्रकृति, कृषि, भाई-बहन के स्नेह, सामाजिक समरसता और सामुदायिक जीवन से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आदर और संरक्षण की भावना को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने वाली जीवंत लोकपरंपरा है। करमा पूजा पर्व भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष करमा पर्व 22 सितंबर, दिन मंगलवार को मनाया जा रहा है। यह समय वर्षा ऋतु और कृषि कार्यों से जुड़ा होता है। खेतों में हरियाली छाने और फसलों के विकास के बीच प्रकृति तथा करम देवता के प्रति श्रद्धा प्रकट की जाती है। पर्व के अवसर पर युवक-युवतियां तथा ग्रामीण समुदाय सामूहिक रूप से पूजा, गीत और नृत्य करते हैं।इस पर्व का मुख्य आकर्षण करम वृक्ष की डाली है। इसे शक्ति, यौवन, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। पूजा के लिए श्रद्धालु करम वृक्ष की डाली लाकर अखड़ा अथवा पूजा स्थल के बीच स्थापित करते हैं। करम वृक्ष को शुभ और समृद्धि से जुड़ा पवित्र वृक्ष माना जाता है।करमा पर्व से जुड़ी अनेक लोककथाएं प्रचलित हैं। इनमें एक प्रसिद्ध कथा सात भाइयों और उनके परिवार की है। लोकमान्यता के अनुसार सात भाई मिल-जुलकर रहते थे और उनके जीवन में करम देवता की पूजा का विशेष महत्व था। एक अवसर पर करम पूजा की उपेक्षा होने और करम डाली का अनादर किए जाने से परिवार पर विपत्तियां आने लगीं। बाद में परिवार को अपनी भूल का एहसास हुआ। श्रद्धा और विधि-विधान से करम देवता की पूजा-अर्चना करने पर संकट दूर हुए और सुख-समृद्धि लौट आई। यह लोककथा मनुष्य को प्रकृति, परंपरा और कर्म के प्रति सम्मान रखने का संदेश देती है।करमा पर्व के दिन विशेष रूप से युवतियां और महिलाएं व्रत रखती हैं। पूजा स्थल को सजाकर करम डाली स्थापित की जाती है। फल, फूल, चावल आदि से पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद करमा गीत और करमा नृत्य का आयोजन होता है। मांदर की थाप पर युवक-युवतियां गोल घेरा बनाकर सामूहिक नृत्य करते हैं। यह उत्सव देर रात तक चलता है। करमा पर्व की सबसे बड़ी विशेषता प्रकृति और मानव के बीच गहरे संबंध को अभिव्यक्त करना है। यह पर्व भाई-बहन के अटूट स्नेह, पारिवारिक सुख-समृद्धि, सामाजिक एकता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देता है। करमा पर्व को समृद्ध संस्कृति, सभ्यता और जीवनशैली का प्रतीक तथा भाई-बहन के संबंध, सामाजिक समरसता और प्रकृति के प्रति आस्था से जुड़ा पर्व बताया गया है।आज पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संतुलन की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में करमा पर्व की परंपरा समाज को यह संदेश देती है कि प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी मानव जीवन सुरक्षित रहेगा। यही कारण है कि झारखंड का करमा पर्व लोकआस्था के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण, सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक एकता का प्रेरणादायी पर्व भी है।
प्रकृति,भाई-बहन के प्रेम और सामुदायिक एकता का पर्व है करमा: संजय सर्राफ
Reviewed by PSA Live News
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8:57:00 pm
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