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जब मुख्यमंत्री जनता के बीच बैठकर उसका दर्द सुनते थे

डॉ. जगन्नाथ मिश्र की जनसुलभ राजनीति का स्मरण: सत्ता के शिखर पर बैठकर भी आम आदमी के अभिभावक बने रहने की कला और आज के लोकतंत्र के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल

विशेष संपादकीय
लेखक: अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक : PSA लाइव न्यूज एवं रांची दस्तक


बिहार की राजनीति के इतिहास में अनेक मुख्यमंत्री हुए। किसी ने विकास योजनाओं के माध्यम से अपनी पहचान बनाई, किसी ने सामाजिक समीकरणों के सहारे सत्ता प्राप्त की, किसी ने प्रशासनिक दृढ़ता को अपनी ताकत बनाया और किसी ने राजनीतिक संघर्षों के बीच अपनी जगह कायम की। लोकतंत्र में प्रत्येक जनप्रतिनिधि का मूल्यांकन उसके कार्यकाल, नीतियों, उपलब्धियों, कमियों और जनहित के प्रति उसके योगदान के आधार पर किया जाता है। लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान केवल उनके द्वारा लिए गए निर्णयों या उनके कार्यकाल की उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहती। वे अपने व्यवहार, संवेदनशीलता, सहजता और आम आदमी के साथ स्थापित किए गए आत्मीय संबंधों के कारण लोगों की स्मृतियों में स्थायी स्थान बना लेते हैं।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र ऐसे ही व्यक्तित्वों में से एक थे। उनके राजनीतिक जीवन का मूल्यांकन अनेक दृष्टिकोणों से किया जा सकता है। उनकी आर्थिक नीतियों, प्रशासनिक फैसलों, राजनीतिक संघर्षों, प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े विवादों और बिहार की राजनीति पर उनके प्रभाव को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं। लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक व्यक्तित्व की आलोचनात्मक समीक्षा आवश्यक भी है। लेकिन उनके व्यक्तित्व का एक ऐसा पक्ष है, जिसे उन लोगों की स्मृतियों से समझा जा सकता है, जिन्होंने उन्हें जनता के बीच सहजता से आते-जाते, आम लोगों की बातें सुनते और जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशील व्यवहार करते देखा या उनके बारे में ऐसे अनुभव साझा किए।

वह पक्ष था—जनता के प्रति अपनापन।

एक ऐसा अपनापन, जिसमें मुख्यमंत्री और नागरिक के बीच पद की दीवार छोटी पड़ जाती थी। जिसमें गरीब व्यक्ति अपनी समस्या लेकर सत्ता के दरवाजे पर पहुंचने से पहले सौ बार सोचने को मजबूर नहीं होता था। जिसमें फरियादी को यह भय नहीं सताता था कि कहीं उसकी बात सुनने से पहले ही उसे सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक औपचारिकताओं और अधिकारियों की बेरुखी के बीच वापस न लौटना पड़े।

आज जब देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और आम नागरिक की शासन तक पहुंच पर लगातार चर्चा होती है, तब डॉ. जगन्नाथ मिश्र की जनसुलभता का स्मरण एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है—क्या लोकतंत्र में जनता और उसके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि के बीच इतनी दूरी होनी चाहिए कि नागरिक अपने मुख्यमंत्री को केवल टेलीविजन की स्क्रीन, मोबाइल फोन या सोशल मीडिया के माध्यम से ही देख सके?

यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति या सरकार के विरुद्ध आरोप नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक व्यवस्था के आत्ममंथन का प्रश्न है, जिसमें जनता को सर्वोच्च माना जाता है, लेकिन कई बार उसी जनता को अपने चुने हुए प्रतिनिधि तक पहुंचने के लिए लंबी प्रतीक्षा, कठिन प्रक्रियाओं और सुरक्षा संबंधी बाधाओं से गुजरना पड़ता है।

मुख्यमंत्री का दरबार नहीं, जनता का अपना घर

डॉ. जगन्नाथ मिश्र के व्यक्तित्व के बारे में उनके समर्थकों, परिचितों और उनसे मिलने वाले लोगों की स्मृतियों में एक बात विशेष रूप से उभरकर आती है—आम आदमी के प्रति उनका सहज व्यवहार। उनके यहां पहुंचने वाला व्यक्ति केवल इस कारण महत्वहीन नहीं हो जाता था कि वह गरीब है, किसी बड़े पद पर नहीं है, उसके पास राजनीतिक सिफारिश नहीं है अथवा वह किसी प्रभावशाली परिवार से संबंध नहीं रखता।

बताया जाता है कि पटना स्थित उनके आवास पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग अपनी समस्याएं लेकर पहुंचते थे। उनमें ऐसे लोग भी होते थे, जिनके पास न कोई राजनीतिक पहचान थी, न किसी अधिकारी तक पहुंचने का साधन और न ही अपनी बात प्रभावशाली ढंग से रखने की क्षमता। किसी के सामने जमीन का विवाद होता, कोई सरकारी काम में हो रही परेशानी से चिंतित होता, किसी को रोजगार की आवश्यकता होती, तो कोई अपने परिवार की कठिनाइयों का समाधान खोजने के लिए मुख्यमंत्री से मिलने की उम्मीद लेकर पहुंचता था।

उनके आवास पर आने वाले फरियादियों के बैठने के लिए कुर्सियों की व्यवस्था होने और उनके बीच जाकर लोगों से बात करने की स्मृतियां उनके जनसंपर्क की एक अलग तस्वीर प्रस्तुत करती हैं।

कल्पना कीजिए, एक गरीब ग्रामीण व्यक्ति राजधानी पटना पहुंचा है। वह पहली बार मुख्यमंत्री के आवास पर आया है। उसके मन में कई तरह के प्रश्न हैं। वह सोच रहा है कि मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात कैसे रखेगा, कहीं उसकी बात अधूरी न रह जाए, कहीं उसे डांटकर बाहर न कर दिया जाए। उसके पास अपनी समस्या बताने के लिए शब्द तो हैं, लेकिन सत्ता के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति के सामने बोलने का आत्मविश्वास नहीं है।

ऐसी स्थिति में यदि कोई मुख्यमंत्री स्वयं उस व्यक्ति के करीब पहुंच जाए, उसके पास बैठ जाए, उसके कंधे या पीठ पर स्नेहपूर्वक हाथ रखे और पूछे कि बताइए, पटना किस काम से आए हैं? यहां रहने या खाने में कोई परेशानी तो नहीं है? आपको क्या समस्या है? तो उस गरीब व्यक्ति के लिए यह केवल बातचीत नहीं रह जाती। यह उसके भीतर पैदा हुए भय को समाप्त करने का माध्यम बन जाती है।

यह व्यवहार उसे विश्वास दिलाता है कि सामने बैठा व्यक्ति केवल सरकार का मुखिया नहीं, बल्कि उसकी समस्या सुनने के लिए जिम्मेदार जनप्रतिनिधि भी है।

यही लोकतांत्रिक संवेदनशीलता है। यही जनसेवा का वह मानवीय पक्ष है, जिसे किसी सरकारी आदेश, किसी विज्ञापन अथवा किसी औपचारिक जनसुनवाई कार्यक्रम से पूरी तरह स्थापित नहीं किया जा सकता।

जनता से जुड़ाव का अर्थ केवल यह नहीं कि मुख्यमंत्री जनता के सामने भाषण दें। इसका वास्तविक अर्थ यह है कि जनता अपनी बात उनके सामने कह सके, बिना भय के कह सके और यह विश्वास लेकर वापस लौटे कि उसकी समस्या पर विचार अवश्य होगा।

डॉ. जगन्नाथ मिश्र के बारे में प्रचलित ऐसी स्मृतियां इसी प्रकार की राजनीति की ओर संकेत करती हैं।

सुरक्षा के घेरे के भीतर भी जनता के लिए खुला रास्ता

किसी मुख्यमंत्री की सुरक्षा आवश्यक है। देश के संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की सुरक्षा में किसी प्रकार की लापरवाही नहीं होनी चाहिए। राजनीतिक हिंसा, असामाजिक गतिविधियों और संभावित खतरों को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियों का अपना दायित्व है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुरक्षा और जनसंपर्क, दोनों का महत्व है।

लेकिन समस्या उस समय पैदा होती है, जब सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य जनप्रतिनिधि की रक्षा करने तक सीमित न रहकर उसके और जनता के बीच स्थायी दूरी बनाने का माध्यम बन जाती है।

डॉ. जगन्नाथ मिश्र के जनसंपर्क से जुड़ी स्मृतियों में यह बात विशेष रूप से सामने आती है कि वे दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों में भी आम लोगों के बीच जाने से परहेज नहीं करते थे। बताया जाता है कि सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान वे केवल सामने खड़े चुनिंदा लोगों से मिलकर संतुष्ट नहीं हो जाते थे। यदि पीछे खड़ा कोई व्यक्ति अपनी बात नहीं कह पा रहा होता, तो वे उसके पास पहुंचने का प्रयास करते थे।

कई बार किसी गरीब व्यक्ति के लिए किसी मुख्यमंत्री तक पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती होती है। वह कार्यक्रम स्थल पर पहुंच तो जाता है, लेकिन सुरक्षा कर्मियों, अधिकारियों, स्थानीय प्रभावशाली लोगों और भीड़ के बीच उसकी आवाज दब जाती है। वह दूर खड़ा होकर केवल मुख्यमंत्री को देखता रहता है। उसकी समस्या उसके मन में ही रह जाती है और कार्यक्रम समाप्त होने के बाद वह निराश होकर घर लौट जाता है।

यदि जनप्रतिनिधि स्वयं ऐसे लोगों तक पहुंचने का प्रयास करे, तो यह दूरी काफी हद तक कम हो सकती है।

डॉ. मिश्र के व्यवहार के संबंध में सुनाई जाने वाली स्मृतियां बताती हैं कि वे सुरक्षा व्यवस्था को जनता से मिलने में बाधक नहीं बनने देना चाहते थे। उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि वे अपने सुरक्षा कर्मियों को इस बात का ध्यान रखने के लिए कहते थे कि सुरक्षा व्यवस्था के कारण आम लोगों को अनावश्यक परेशानी न हो।

इन बातों का ऐतिहासिक मूल्यांकन करने के लिए समकालीन अभिलेखों, प्रत्यक्षदर्शियों के साक्षात्कार और अन्य स्वतंत्र स्रोतों का अध्ययन किया जाना चाहिए। लेकिन इस स्मृति का मूल संदेश अपने आप में महत्वपूर्ण है—सुरक्षा और जनसुलभता को एक-दूसरे का विरोधी मानना आवश्यक नहीं है।

सुरक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जो खतरे को नियंत्रित करे, न कि जनता को शासन से पूरी तरह अलग कर दे।

मुख्यमंत्री की सुरक्षा का उद्देश्य उन्हें जनता से दूर रखना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखते हुए जनता की सेवा करने में सक्षम बनाना होना चाहिए।

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता के बीच जाते हैं, जनता से संवाद करते हैं और जनता की समस्याओं को समझते हैं। यदि यह संवाद केवल मंच पर खड़े होकर दिए गए भाषणों तक सीमित हो जाए, तो राजनीति का एक महत्वपूर्ण मानवीय पक्ष कमजोर पड़ जाता है।

बेलमोहन की वह कहानी, जो राजनीति के उद्देश्य पर सवाल खड़ा करती है

डॉ. जगन्नाथ मिश्र के जनसरोकारों की चर्चा करते हुए मुझे अपने क्षेत्र के एक गांव की स्मृति विशेष रूप से याद आती है। यह प्रसंग मेरे लिए केवल किसी राजनीतिक व्यक्तित्व की प्रशंसा का विषय नहीं है, बल्कि यह समझने का एक अवसर भी है कि समाज के सबसे कमजोर लोगों तक पहुंचने के लिए राजनीति किस प्रकार की दृष्टि अपना सकती है।

हमारे गांव से कुछ दूरी पर बेलमोहन नाम की एक बस्ती है। मेरे स्मरण और स्थानीय स्तर पर सुनाई गई जानकारी के अनुसार, एक चुनावी कार्यक्रम के दौरान डॉ. जगन्नाथ मिश्र को इस बस्ती के कुछ परिवारों के बारे में जानकारी मिली थी। बताया गया कि वहां कुछ ऐसे गरीब परिवार रहते थे, जिनके बीच चोरी जैसी गतिविधियां आजीविका का साधन बन गई थीं।

किसी भी समाज में अपराध की समस्या को केवल कानून और पुलिस की दृष्टि से देखना पर्याप्त नहीं होता। अपराध करने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी अपनी जगह है, लेकिन उन परिस्थितियों को समझना भी आवश्यक है, जिनमें कोई व्यक्ति गलत रास्ते पर चल पड़ता है। गरीबी, अशिक्षा, रोजगार का अभाव, सामाजिक उपेक्षा और पीढ़ियों से चली आ रही वंचना कई बार लोगों को ऐसे रास्तों की ओर धकेल देती है, जिनका परिणाम अंततः पूरे समाज को भुगतना पड़ता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि गरीबी अपराध को उचित ठहरा देती है। चोरी गलत है और कानून का पालन प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। लेकिन यदि समाज किसी व्यक्ति को केवल उसके अपराध से पहचानता रहे और उसे सम्मानजनक जीवन की ओर लौटने का अवसर न दे, तो समस्या की जड़ें और गहरी हो सकती हैं।

मेरे पास उपलब्ध स्थानीय स्मृति के अनुसार, जब डॉ. जगन्नाथ मिश्र को बेलमोहन बस्ती के बारे में बताया गया, तो उन्होंने वहां जाकर लोगों से मिलने की इच्छा जताई। वे उस बस्ती में पहुंचे और वहां के लोगों से बातचीत की।

बताया जाता है कि उन्होंने लोगों के सामने एक ऐसी बात रखी, जिसमें राजनीतिक वादा करने से अधिक सामाजिक परिवर्तन की संभावना निहित थी। उन्होंने लोगों से कहा कि वे उन्हें वोट दें या न दें, यह उनकी इच्छा है; लेकिन वे चोरी करना छोड़ने का संकल्प लें। इसके साथ उन्होंने यह आश्वासन दिया कि बस्ती के प्रत्येक परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दिलाने का प्रयास किया जाएगा।

इस प्रसंग में नौकरी दिए जाने, परिवारों की संख्या और बाद में रोजगार प्राप्त करने वाले लोगों के बारे में स्वतंत्र दस्तावेजी पुष्टि आवश्यक है। इसलिए इस घटना को एक स्थानीय संस्मरण के रूप में ही प्रस्तुत करना उचित होगा, न कि बिना अतिरिक्त प्रमाण के स्थापित प्रशासनिक तथ्य के रूप में।

लेकिन इस संस्मरण का केंद्रीय संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है।

एक ओर अपराध से दूर रहने का आग्रह और दूसरी ओर सम्मानजनक आजीविका की संभावना—इन दोनों बातों को साथ रखकर देखने का दृष्टिकोण अपने आप में एक सामाजिक संदेश देता है।

यदि किसी बस्ती के लोगों को यह विश्वास हो जाए कि ईमानदारी से जीवन बिताने पर उनके बच्चों के लिए शिक्षा और रोजगार के अवसर उपलब्ध हो सकते हैं, तो उनके भीतर बदलाव की प्रेरणा पैदा हो सकती है। इसके लिए केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं है; रोजगार के अवसर, शिक्षा, कौशल विकास, कानूनी सहायता और प्रशासनिक सहयोग जैसी व्यवस्थाओं की भी आवश्यकता होती है।

फिर भी, राजनीति का यह स्वरूप विचारणीय है कि वह लोगों को केवल उनकी कमजोरियों के आधार पर अस्वीकार करने के बजाय उन्हें बेहतर जीवन की ओर लौटने का अवसर दे।

आज भी देश के अनेक हिस्सों में ऐसी बस्तियां हैं, जहां गरीबी और सामाजिक उपेक्षा के कारण पीढ़ियां कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताती हैं। यदि सरकारें इन इलाकों की पहचान कर शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण, रोजगार और सामाजिक पुनर्वास की योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करें, तो व्यापक सकारात्मक परिवर्तन संभव है।

बेलमोहन का यह संस्मरण हमें याद दिलाता है कि समाज में बदलाव केवल दंड से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण अवसरों और भरोसे से भी आता है।

यदि इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू चुनना हो, तो वह किसी व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने के कथित वादे से अधिक यह होगा कि एक मुख्यमंत्री ने उस बस्ती के लोगों से मिलने और उनकी परिस्थितियों को समझने की इच्छा जताई।

सत्ता का वास्तविक सामाजिक मूल्यांकन इसी कसौटी पर होना चाहिए कि वह समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के जीवन में कितनी सकारात्मक संभावना पैदा कर पाती है।

जाति और धर्म से ऊपर मानवीय सम्मान का प्रश्न

भारत की राजनीति में जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और समुदाय की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। भारतीय समाज विविधताओं से भरा हुआ है और लोकतांत्रिक राजनीति में विभिन्न समूहों की आकांक्षाएं स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त होती हैं। लेकिन किसी भी जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि वह अपने राजनीतिक समर्थन के दायरे से बाहर खड़े लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है।

किसी व्यक्ति का वास्तविक जनसरोकार केवल उसके समर्थकों तक सीमित नहीं होना चाहिए। यदि कोई नागरिक चुनाव में किसी दूसरे उम्मीदवार को वोट देता है, तो भी उसके अधिकार और उसकी समस्याएं उतनी ही महत्वपूर्ण रहती हैं, जितनी किसी समर्थक की।

डॉ. जगन्नाथ मिश्र के बारे में लोगों की स्मृतियों में यह बात बार-बार सामने आती है कि उनके पास अपनी समस्या लेकर पहुंचने वाले व्यक्ति की जाति, धर्म अथवा राजनीतिक विचारधारा से पहले उसकी परेशानी को सुना जाता था। उनके राजनीतिक विरोधियों के प्रति भी व्यक्तिगत स्तर पर सहायता और संवाद का व्यवहार किए जाने के प्रसंग सुनने को मिलते हैं।

इन संस्मरणों को उनके संपूर्ण राजनीतिक जीवन के बारे में अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता, लेकिन वे एक ऐसी लोकतांत्रिक परंपरा की याद अवश्य दिलाते हैं, जिसमें राजनीतिक विरोध को व्यक्तिगत शत्रुता में बदलना आवश्यक नहीं समझा जाता था।

राजनीति में विरोध स्वाभाविक है। अलग-अलग विचारधाराएं होंगी, नीतियों पर मतभेद होंगे, चुनावी प्रतिस्पर्धा होगी और एक दल दूसरे दल की आलोचना करेगा। लेकिन राजनीतिक मतभेदों के बावजूद मानवीय संबंधों को बनाए रखना लोकतंत्र की परिपक्वता का परिचायक है।

किसी विपक्षी नेता की आलोचना करना एक बात है और संकट में फंसे किसी व्यक्ति की सहायता से केवल इसलिए इनकार कर देना कि वह राजनीतिक विरोधी है, बिल्कुल दूसरी बात।

लोकतांत्रिक संस्कृति का तकाजा है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता नीतियों और विचारों तक सीमित रहे। व्यक्तिगत दुर्भावना और सामाजिक बहिष्कार को राजनीति का स्थायी आधार नहीं बनने दिया जाना चाहिए।

यदि कोई विरोधी किसी कठिन परिस्थिति में सहायता मांगता है, तो कानून और नियमों के दायरे में उसकी समस्या सुनना किसी नेता की कमजोरी नहीं, बल्कि उसके मानवीय चरित्र की ताकत है।

इसी प्रकार, किसी गरीब व्यक्ति को सम्मान देना केवल इसलिए आवश्यक नहीं कि वह भविष्य में वोट दे सकता है। वह सम्मान का अधिकारी इसलिए है, क्योंकि वह इस देश का नागरिक है।

डॉ. मिश्र के व्यक्तित्व की जो तस्वीर इन स्मृतियों से उभरती है, उसका सबसे मूल्यवान पक्ष यही है कि जनता से संबंध को केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

‘तुम’ कहकर बात करने में छिपा अपनापन

किसी व्यक्ति के व्यवहार को समझने के लिए हमेशा उसके बड़े भाषणों और नीतिगत घोषणाओं का सहारा लेना आवश्यक नहीं होता। कभी-कभी उसके रोजमर्रा के व्यवहार की छोटी-छोटी बातें उसके व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ बता देती हैं।

डॉ. जगन्नाथ मिश्र के संबंध में एक स्मृति यह भी है कि वे अपने से छोटे लोगों से सहज और अनौपचारिक ढंग से बात किया करते थे। उनके बातचीत करने के तरीके में एक प्रकार का घरेलू अपनापन महसूस होता था।

भाषा और संबोधन का प्रभाव व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि, क्षेत्रीय संस्कृति और सामने वाले व्यक्ति के साथ उसके संबंधों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए किसी एक संबोधन को अपने आप में श्रेष्ठ या अनुचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन जब कोई व्यक्ति अपने पद की औपचारिकता से बाहर निकलकर सहजता से बात करता है, तो सामने वाला व्यक्ति कई बार अपने मन की बात अधिक आसानी से कह पाता है।

जनता के साथ संवाद स्थापित करने में यह सहजता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

एक गरीब ग्रामीण व्यक्ति किसी बड़े अधिकारी या मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात रखते समय अक्सर संकोच करता है। उसे लगता है कि सामने वाला व्यक्ति उससे बहुत ऊंचे पद पर है और उसकी बात को महत्व नहीं देगा। यदि जनप्रतिनिधि अपनी भाषा और व्यवहार से यह संदेश दे कि वह नागरिक की बात सुनने के लिए तैयार है, तो यह संकोच कम हो सकता है।

यही कारण है कि राजनीति में संवेदनशीलता केवल बड़े निर्णयों में नहीं, बल्कि व्यवहार की छोटी-छोटी बातों में भी दिखाई देती है।

किसी व्यक्ति की पीठ पर स्नेहपूर्वक हाथ रखना, उसकी परेशानी पूछना, उसे बैठने के लिए कहना, उसकी बात पूरी होने तक धैर्य रखना और उसकी समस्या को संबंधित अधिकारी तक पहुंचाना—ये सभी छोटे दिखाई देने वाले कार्य जनविश्वास के निर्माण में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

हालांकि अपनापन केवल अनौपचारिक भाषा से पैदा नहीं होता। यदि कोई नेता सहज शब्दों में बात करे, लेकिन नागरिक की समस्या पर कोई कार्रवाई न हो, तो धीरे-धीरे वह विश्वास भी समाप्त हो जाता है।

इसलिए संवेदनशील व्यवहार के साथ प्रशासनिक जवाबदेही का होना आवश्यक है।

एक जनप्रतिनिधि का दायित्व केवल लोगों को यह महसूस कराना नहीं कि वे उसके अपने हैं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि उनकी समस्याओं के समाधान के लिए संस्थागत व्यवस्था काम करे।

मुख्यमंत्री का जनता के प्रति भय नहीं, जवाबदेही होनी चाहिए

आज के राजनीतिक परिदृश्य में एक प्रश्न अक्सर सामने आता है—जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों के बीच इतनी दूरी क्यों बढ़ती जा रही है?

इसका उत्तर केवल सुरक्षा व्यवस्था में तलाशना उचित नहीं होगा। प्रशासनिक ढांचा, बढ़ती जनसंख्या, सार्वजनिक कार्यक्रमों की भीड़, संभावित सुरक्षा खतरे, सरकारी कामकाज की जटिलता और जनप्रतिनिधियों के समय की सीमाएं भी इस स्थिति को प्रभावित करती हैं। किसी मुख्यमंत्री के लिए प्रत्येक नागरिक से व्यक्तिगत रूप से मिलना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।

लेकिन इन सीमाओं को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं कि जनता की पहुंच को बेहतर बनाने की कोशिश ही छोड़ दी जाए।

समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब नागरिक को अपनी शिकायत रखने का कोई स्पष्ट रास्ता दिखाई नहीं देता। जब मुख्यमंत्री के आवास या कार्यालय तक पहुंचने की प्रक्रिया अस्पष्ट हो, जब जनसुनवाई के लिए महीनों इंतजार करना पड़े, जब अधिकारी शिकायत को आगे बढ़ाने के बजाय नागरिक को एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय भेजते रहें और जब आम व्यक्ति को यह पता ही न हो कि उसकी समस्या का समाधान कौन करेगा।

ऐसी स्थिति में लोकतंत्र की औपचारिक संरचना तो मौजूद रहती है, लेकिन नागरिक को शासन से जुड़ाव का वास्तविक अनुभव नहीं मिल पाता।

जनता अपने मुख्यमंत्री से हर दिन मिलने की मांग नहीं करती। वह यह अपेक्षा करती है कि उसकी समस्या सुनने की व्यवस्था हो, उसके प्रतिनिधि उसकी स्थिति से परिचित हों और जरूरत पड़ने पर वह अपनी बात उन तक पहुंचा सके।

किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री की भूमिका केवल शासन चलाने तक सीमित नहीं होती। वह प्रशासनिक व्यवस्था का सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व भी प्रदान करता है। इसलिए उसके कार्यालय की जनसुनवाई व्यवस्था, शिकायतों के निस्तारण और अधिकारियों की जवाबदेही का व्यापक महत्व है।

यदि मुख्यमंत्री तक सीधे पहुंचना संभव न हो, तो ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए, जिसके माध्यम से नागरिक की शिकायत समयबद्ध तरीके से संबंधित विभाग तक पहुंचे और उसकी प्रगति का पता चल सके।

आज डिजिटल तकनीक ने यह काम आसान बनाने की संभावनाएं पैदा की हैं। ऑनलाइन शिकायत पोर्टल, वीडियो जनसुनवाई, टेलीफोन हेल्पलाइन, जिला स्तर पर नियमित जनसंवाद और शिकायतों की सार्वजनिक समीक्षा जैसे माध्यमों से प्रशासनिक दूरी कम की जा सकती है।

लेकिन तकनीक तभी उपयोगी होगी, जब उसके साथ जवाबदेही भी जुड़ी हो। केवल शिकायत दर्ज कर लेने से समस्या का समाधान नहीं होता। नागरिक को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उसकी शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई, कितने समय में हुई और यदि समाधान नहीं हुआ, तो उसका कारण क्या है।

एक संवेदनशील मुख्यमंत्री वही होगा, जो जनता की आवाज सुनने के लिए एक से अधिक रास्ते खुले रखे।

आज जनता मुख्यमंत्री को देखती है, लेकिन क्या अपनी बात कह भी पाती है?

समय के साथ राजनीति की कार्यशैली बदली है। संचार के साधन बढ़े हैं। टेलीविजन, मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने मुख्यमंत्री तथा अन्य जनप्रतिनिधियों की गतिविधियों को आम नागरिक तक पहुंचाना आसान बना दिया है।

अब जनता किसी मुख्यमंत्री के भाषण, सरकारी कार्यक्रम, विदेश यात्रा, विकास योजनाओं की घोषणा और राजनीतिक गतिविधियों को अपने घर बैठे देख सकती है। कुछ ही क्षणों में किसी सरकारी घोषणा की जानकारी लाखों लोगों तक पहुंच जाती है।

यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है और इसके अनेक सकारात्मक पक्ष हैं।

लेकिन यहां एक बुनियादी अंतर को समझना आवश्यक है—जनता तक सूचना पहुंचना और जनता की बात सत्ता तक पहुंचना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।

यदि नागरिक मुख्यमंत्री का भाषण सुन सकता है, लेकिन अपनी समस्या उनके कार्यालय तक नहीं पहुंचा सकता, तो संवाद अधूरा है। यदि सरकार योजनाओं की जानकारी दे सकती है, लेकिन लोगों की शिकायतों का उत्तर नहीं दे सकती, तो पारदर्शिता अधूरी है। यदि मुख्यमंत्री जनता को संबोधित कर सकते हैं, लेकिन जनता के प्रश्नों का उत्तर देने की व्यवस्था कमजोर है, तो जनसंपर्क एकतरफा बन जाता है।

सोशल मीडिया पर लाखों लोगों तक पहुंच बना लेना जनसुलभता का प्रमाण तभी बन सकता है, जब उस माध्यम से आने वाली शिकायतों और सुझावों को भी गंभीरता से लिया जाए।

आज अनेक नागरिक अपनी समस्याएं सोशल मीडिया पर लिखते हैं। कभी-कभी संबंधित अधिकारियों तक शिकायत पहुंच जाती है और समाधान भी होता है। लेकिन डिजिटल माध्यमों तक समान पहुंच सभी के पास नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों के बुजुर्ग, अशिक्षित नागरिक, आर्थिक रूप से कमजोर परिवार और तकनीकी जानकारी से वंचित लोग अब भी व्यक्तिगत सहायता पर निर्भर हो सकते हैं।

इसलिए शासन को डिजिटल संवाद के साथ प्रत्यक्ष जनसुनवाई की व्यवस्था भी मजबूत रखनी चाहिए।

जनता को अपने मुख्यमंत्री से मिलने के लिए हमेशा किसी प्रभावशाली व्यक्ति की सिफारिश की आवश्यकता पड़े, तो यह व्यवस्था की कमजोरी है। नागरिक को अपनी समस्या रखने के लिए राजनीतिक कार्यकर्ता या स्थानीय बिचौलिए की सहायता पर निर्भर रहना पड़े, तो यह भी विचारणीय स्थिति है।

लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती इसी में है कि सामान्य नागरिक अपनी बात रखने के लिए असामान्य साधनों का सहारा लेने को मजबूर न हो।

सुरक्षा का घेरा और जनता के बीच की अदृश्य दीवार

मुख्यमंत्री और अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की सुरक्षा को लेकर एक व्यावहारिक वास्तविकता है। उनके सामने संभावित खतरे हो सकते हैं। सार्वजनिक कार्यक्रमों में बड़ी भीड़ के कारण दुर्घटना या अव्यवस्था की आशंका भी रहती है। इसलिए सुरक्षा कर्मियों की उपस्थिति और सुरक्षा प्रोटोकॉल को अनावश्यक नहीं कहा जा सकता।

लेकिन सुरक्षा की व्यवस्था किस प्रकार लागू की जाती है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में यदि सुरक्षा कर्मी भीड़ को व्यवस्थित करने के बजाय सामान्य नागरिकों के साथ अपमानजनक व्यवहार करने लगें, तो शासन की छवि प्रभावित होती है। यदि कोई बुजुर्ग अपनी समस्या लेकर मुख्यमंत्री के पास जाना चाहता है और उसे बिना उचित जानकारी दिए धक्का देकर हटा दिया जाता है, तो उसके मन में केवल उस कर्मचारी के प्रति नाराजगी पैदा नहीं होती। वह इस अनुभव को पूरे प्रशासन के व्यवहार से जोड़कर देखने लगता है।

ऐसी घटनाएं हर जगह और हर समय होती हैं, ऐसा कहना उचित नहीं होगा। लेकिन जहां भी ऐसी शिकायतें सामने आती हैं, उनकी गंभीरता से समीक्षा होनी चाहिए।

सुरक्षा कर्मियों का प्रशिक्षण केवल खतरे की पहचान और भीड़ नियंत्रण तक सीमित नहीं होना चाहिए। उन्हें नागरिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार, दिव्यांग और बुजुर्ग लोगों की सहायता, शिकायत लेकर आए व्यक्तियों को सही स्थान तक पहुंचाने तथा तनावपूर्ण परिस्थितियों में संयम बनाए रखने का प्रशिक्षण भी मिलना चाहिए।

मुख्यमंत्री की सुरक्षा और नागरिक के सम्मान के बीच संतुलन स्थापित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

यदि सुरक्षा के कारण किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री से सीधे मिलने की अनुमति नहीं दी जा सकती, तो उसे यह बताया जा सकता है कि वह अपनी समस्या किस अधिकारी या जनसुनवाई केंद्र के माध्यम से दर्ज कराए। उसकी शिकायत को स्वीकार करने और आगे बढ़ाने की व्यवस्था होनी चाहिए।

जनता को हर प्रतिबंध के पीछे केवल निषेध दिखाई दे, यह लोकतांत्रिक संवाद के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

सुरक्षा व्यवस्था जनता को यह विश्वास दिलाए कि मुख्यमंत्री सुरक्षित हैं और उनकी समस्याएं सुनने के लिए प्रशासन तैयार है। यही आदर्श स्थिति होनी चाहिए।

संयुक्त बिहार की स्मृतियां और जनसंपर्क की परंपरा

डॉ. जगन्नाथ मिश्र का राजनीतिक जीवन उस दौर में विकसित हुआ, जब बिहार और झारखंड एक ही राज्य का हिस्सा थे। झारखंड राज्य के गठन से पहले संयुक्त बिहार का राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक परिदृश्य आज की तुलना में अलग था। राज्य का भौगोलिक विस्तार बड़ा था और विभिन्न क्षेत्रों की समस्याएं भी अलग-अलग थीं।

डॉ. मिश्र तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। उनके राजनीतिक जीवन में कई महत्वपूर्ण फैसले, उपलब्धियां और विवाद रहे। उन्होंने अर्थशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में अपना करियर शुरू किया और बाद में राज्य की राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए।

उनकी राजनीति का मूल्यांकन करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी मुख्यमंत्री का कार्यकाल केवल व्यक्तिगत व्यवहार से नहीं, बल्कि उसके शासन के परिणामों से भी मापा जाता है। विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, प्रशासनिक सुधार, सामाजिक न्याय, नागरिक स्वतंत्रता और कानून के शासन जैसे प्रश्न किसी भी राजनीतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं।

डॉ. मिश्र के कार्यकालों से जुड़े कई फैसलों पर अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, उनके शासनकाल में प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़ा विवाद बिहार की राजनीतिक स्मृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। बिहार प्रेस विधेयक, 1982 को लेकर पत्रकारिता और नागरिक स्वतंत्रता के क्षेत्र में गंभीर बहस हुई थी। इस प्रसंग को उनके जनसुलभ व्यक्तित्व की चर्चा से अलग रखकर देखना आवश्यक नहीं, बल्कि दोनों पहलुओं को साथ रखकर उनकी राजनीतिक विरासत का संतुलित मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

एक नेता जनता से व्यक्तिगत रूप से सहज व्यवहार कर सकता है, फिर भी उसकी सरकार का कोई नीतिगत निर्णय विवादास्पद हो सकता है। इसी प्रकार, किसी सरकार की नीतियों की आलोचना करने का अर्थ यह नहीं कि उसके नेता के सभी मानवीय गुणों को नकार दिया जाए।

लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि हम व्यक्तित्वों को न तो पूरी तरह देवत्व प्रदान करें और न ही उनकी कमियों के कारण उनके सकारात्मक पक्षों को देखने से इनकार करें।

संयुक्त बिहार के लोगों की स्मृतियों में डॉ. मिश्र के प्रति जो अपनापन दिखाई देता है, उसे भी इसी संतुलित दृष्टिकोण से समझा जाना चाहिए।

बिहार और झारखंड के अलग-अलग राज्य बनने के बाद दोनों प्रदेशों की राजनीतिक यात्राएं अलग हुईं। प्रशासनिक ढांचे, विकास की प्राथमिकताओं और राजनीतिक नेतृत्व में परिवर्तन आए। लेकिन संयुक्त बिहार के दौर से जुड़ी सामाजिक स्मृतियां आज भी दोनों राज्यों के अनेक परिवारों और राजनीतिक चर्चाओं में जीवित हैं।

ऐसी स्मृतियां हमें यह समझने का अवसर देती हैं कि शासन की संस्थाएं बदल सकती हैं, सीमाएं बदल सकती हैं, राजनीतिक दल बदल सकते हैं, लेकिन जनता की अपने प्रतिनिधियों से मूल अपेक्षाएं बहुत हद तक समान रहती हैं।

जनता चाहती है कि उसकी बात सुनी जाए। उसे सम्मान मिले। उसके साथ अन्याय होने पर उसे न्याय पाने का रास्ता दिखाई दे। उसकी गरीबी को उसकी बेबसी न समझा जाए और उसके राजनीतिक मतभेदों को उसके नागरिक अधिकारों में बाधा न बनने दिया जाए।

विकास आवश्यक है, लेकिन जनविश्वास उससे अलग नहीं

आज बिहार सहित देश के अनेक राज्यों में सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, आवास और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार पर काम हो रहा है। विकास की उपलब्धियों का मूल्यांकन आंकड़ों, योजनाओं के परिणामों और नागरिकों के जीवन में आए वास्तविक बदलावों के आधार पर किया जाना चाहिए।

यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि पिछले दशकों में शासन की परिस्थितियां बदली हैं। जनसंख्या बढ़ी है, नागरिकों की अपेक्षाएं बढ़ी हैं, सरकारी योजनाओं का दायरा विस्तृत हुआ है और प्रशासनिक जिम्मेदारियां पहले से अधिक जटिल हो गई हैं।

लेकिन विकास की चर्चा के बीच एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या विकास के साथ नागरिक का शासन पर भरोसा बढ़ रहा है?

किसी गांव तक सड़क पहुंचना महत्वपूर्ण है, लेकिन उस गांव के व्यक्ति को अपनी समस्या लेकर प्रखंड कार्यालय पहुंचने पर सम्मान मिले, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अस्पताल में भवन और उपकरण उपलब्ध होना आवश्यक है, लेकिन मरीज के परिजन को उचित जानकारी मिले और उसकी शिकायत सुनी जाए, यह भी जरूरी है। स्कूल का निर्माण विकास का संकेत है, लेकिन शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक अपनी समस्याओं के समाधान के लिए संबंधित अधिकारियों तक पहुंच सकें, यह भी सुशासन का हिस्सा है।

इसी प्रकार, मुख्यमंत्री की विकास योजनाओं की घोषणाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उन योजनाओं से जुड़े सवालों का उत्तर देना भी शासन की जिम्मेदारी है।

विकास और जनसुलभता को अलग-अलग खांचों में नहीं रखा जा सकता।

यदि नागरिक की आय बढ़ती है, लेकिन उसे सरकारी कार्यालयों में अपमान सहना पड़ता है, तो उसका शासन से संबंध अधूरा रहता है। यदि सड़कें बनती हैं, लेकिन शिकायत करने पर कोई अधिकारी जवाब नहीं देता, तो नागरिक के मन में व्यवस्था के प्रति असंतोष बना रह सकता है।

सुशासन का अर्थ केवल योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं है। इसका अर्थ है कि शासन नागरिक के जीवन को सरल बनाए, उसकी समस्याओं के समाधान के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करे और उसके सम्मान की रक्षा करे।

एक संवेदनशील मुख्यमंत्री को विकास के आंकड़ों के साथ-साथ जनता के अनुभवों को भी महत्व देना चाहिए।

लोकतंत्र में जनता मालिक है या केवल मतदाता?

भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसका नागरिक है। चुनाव के माध्यम से जनता सरकार चुनती है। जनप्रतिनिधियों को अधिकार मिलते हैं, लेकिन वे अधिकार जनता के विश्वास से उत्पन्न होते हैं।

चुनाव के समय राजनीतिक दल जनता के बीच जाते हैं। गांव-गांव सभाएं होती हैं। घर-घर संपर्क किया जाता है। लोगों की समस्याएं सुनी जाती हैं और उन्हें समाधान के आश्वासन दिए जाते हैं। उम्मीदवार जनता से समर्थन मांगते हैं और अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं।

लेकिन लोकतंत्र की परीक्षा केवल चुनाव के दौरान नहीं होती। असली परीक्षा चुनाव के बाद शुरू होती है।

क्या चुनाव जीतने के बाद भी जनप्रतिनिधि जनता के बीच जाते हैं? क्या वे उन लोगों की समस्याएं सुनते हैं, जिन्होंने उन्हें वोट दिया था? क्या वे उन नागरिकों की भी सहायता करते हैं, जिन्होंने उन्हें वोट नहीं दिया? क्या उनकी सरकार आलोचना को सुनने के लिए तैयार रहती है? क्या कोई गरीब व्यक्ति बिना सिफारिश के सरकारी व्यवस्था में अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है?

ये प्रश्न किसी एक दल या एक मुख्यमंत्री तक सीमित नहीं हैं। ये लोकतंत्र की गुणवत्ता से जुड़े प्रश्न हैं।

यदि जनता को केवल चुनाव के समय याद किया जाए, तो राजनीति धीरे-धीरे जनसेवा से हटकर चुनावी प्रबंधन का माध्यम बन सकती है। यदि नागरिक की भूमिका केवल मतदान तक सीमित कर दी जाए, तो शासन में उसकी भागीदारी कमजोर हो सकती है।

लोकतंत्र में नागरिक केवल मतदाता नहीं होता। वह अधिकारों से संपन्न व्यक्ति है। उसे जानकारी प्राप्त करने, सवाल पूछने, शिकायत दर्ज कराने, सरकारी नीतियों की आलोचना करने और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांग रखने का अधिकार है।

मुख्यमंत्री और अन्य जनप्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि जनता से प्रश्न सुनना उनके पद की गरिमा के विरुद्ध नहीं है। बल्कि जनता के सवालों का उत्तर देने की क्षमता ही सार्वजनिक नेतृत्व की विश्वसनीयता बढ़ाती है।

जनता कभी सरकार के किसी फैसले से नाराज हो सकती है। वह विरोध प्रदर्शन कर सकती है, आलोचना कर सकती है और अगले चुनाव में अपना निर्णय बदल सकती है। यह लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा है।

हर नाराज नागरिक को विरोधी या शत्रु समझना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।

जनता का असंतोष शासन के लिए चेतावनी भी हो सकता है और सुधार का अवसर भी। यदि कोई मुख्यमंत्री नागरिकों की शिकायतों को ध्यान से सुनता है, तो उसे अपनी सरकार की कमियों का पता चलता है। यदि वह केवल प्रशंसा सुनता है, तो उसके सामने वास्तविक परिस्थितियों की तस्वीर अधूरी रह सकती है।

इसलिए जनता की आलोचना से भयभीत होने के बजाय उससे सीखने की क्षमता लोकतांत्रिक नेतृत्व का महत्वपूर्ण गुण है।

अभिभावक जैसी भूमिका और जवाबदेही की सीमा

डॉ. जगन्नाथ मिश्र के प्रति लोगों के अपनत्व का वर्णन करते हुए एक तुलना बार-बार सामने आती है—जनता उन्हें अपने अभिभावक की तरह देखती थी।

यह तुलना अपने भीतर एक महत्वपूर्ण भाव रखती है। अभिभावक से व्यक्ति केवल सहायता की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि न्याय, संरक्षण, मार्गदर्शन और कठिन समय में साथ मिलने की उम्मीद भी करता है।

जब कोई व्यक्ति अपने जनप्रतिनिधि को अभिभावक मानता है, तो वह उससे नाराज भी हो सकता है। वह उसकी नीतियों की आलोचना भी कर सकता है और उससे अपनी अपेक्षाएं भी रख सकता है। लेकिन इस संबंध में एक प्रकार का भरोसा बना रहता है कि संकट की स्थिति में उसकी बात सुनी जाएगी।

हालांकि आधुनिक लोकतंत्र में मुख्यमंत्री को केवल अभिभावक के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। लोकतंत्र नागरिकों को अधिकार देता है और सरकार को कानून तथा संविधान के प्रति जवाबदेह बनाता है। नागरिक को अपने अधिकार पाने के लिए किसी नेता की व्यक्तिगत कृपा पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

यही वह महत्वपूर्ण अंतर है, जिसे समझना आवश्यक है।

व्यक्तिगत अपनापन अच्छा है, लेकिन संस्थागत व्यवस्था उससे भी अधिक आवश्यक है। यदि कोई मुख्यमंत्री व्यक्तिगत रूप से बहुत संवेदनशील है, तो यह एक सकारात्मक गुण है। लेकिन यदि नागरिक को न्याय पाने के लिए केवल उसी मुख्यमंत्री तक पहुंचने पर निर्भर रहना पड़े, तो प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता बनी रहती है।

आदर्श स्थिति वह होगी, जिसमें नेता का व्यवहार संवेदनशील हो और संस्थाएं भी उतनी ही जवाबदेह हों।

किसी गरीब व्यक्ति की समस्या मुख्यमंत्री के व्यक्तिगत हस्तक्षेप से हल हो जाना अच्छी बात है। लेकिन उससे भी बेहतर स्थिति यह होगी कि वही समस्या किसी अन्य नागरिक के सामने आए, तो संबंधित विभाग निर्धारित नियमों के अनुसार उसका समाधान कर दे।

किसी जरूरतमंद को मुख्यमंत्री स्वयं सहायता प्रदान करें, यह मानवीय संवेदना का उदाहरण हो सकता है। लेकिन राज्य की ऐसी व्यवस्था बनाना, जिसमें जरूरतमंद व्यक्ति को अपने अधिकार के लिए मुख्यमंत्री के दरवाजे तक न जाना पड़े, सुशासन की बड़ी उपलब्धि होगी।

इसलिए डॉ. मिश्र के जनसुलभ व्यक्तित्व की चर्चा का उद्देश्य केवल अतीत के प्रति भावनात्मक लगाव पैदा करना नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य वर्तमान और भविष्य के शासन के लिए बेहतर मानक स्थापित करना भी होना चाहिए।

क्या आज के मुख्यमंत्री जनता के करीब नहीं आ सकते?

आज के राजनीतिक नेतृत्व के सामने सुरक्षा, प्रशासनिक दायित्व, समय की कमी और जनसंख्या के विस्तार जैसी अनेक चुनौतियां हैं। एक मुख्यमंत्री को प्रतिदिन अनेक विभागों की समीक्षा करनी होती है, नीतिगत निर्णय लेने होते हैं, अधिकारियों के साथ बैठकें करनी होती हैं और राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित मुद्दों पर ध्यान देना होता है।

इन परिस्थितियों को नजरअंदाज करके यह कहना उचित नहीं होगा कि आज के किसी भी मुख्यमंत्री के लिए जनता के बीच जाना आसान है। लेकिन यह भी सही नहीं कि इन चुनौतियों के कारण जनसंपर्क को गौण बना दिया जाए।

जनता के करीब रहने के अनेक तरीके हो सकते हैं।

मुख्यमंत्री नियमित रूप से खुली जनसुनवाई आयोजित कर सकते हैं। जिलों के दौरे के दौरान केवल अधिकारियों के साथ बैठक करने के बजाय स्थानीय नागरिकों की शिकायतों के लिए अलग समय निर्धारित किया जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं, जहां सामान्य नागरिक बिना किसी राजनीतिक सिफारिश के अपनी समस्याएं रख सकें।

मुख्यमंत्री कार्यालय में शिकायतों के निस्तारण की निगरानी के लिए प्रभावी तंत्र बनाया जा सकता है। शिकायतकर्ता को उसकी समस्या की स्थिति के बारे में जानकारी दी जा सकती है। लंबित मामलों की समीक्षा की जा सकती है और जिन अधिकारियों की लापरवाही सामने आए, उनके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।

इसी प्रकार, मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था के भीतर भी नागरिकों से संवाद के लिए पर्याप्त अवसर निर्धारित किए जा सकते हैं।

सुरक्षा एजेंसियों, प्रशासन और जनसंपर्क अधिकारियों के बीच ऐसा समन्वय विकसित किया जा सकता है, जिससे किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में नागरिकों की सुरक्षा और मुख्यमंत्री की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए लोगों को अपनी बात रखने का अवसर मिले।

आज तकनीक के माध्यम से शिकायतों की निगरानी करना पहले से अधिक आसान है। लेकिन प्रत्यक्ष संवाद का महत्व समाप्त नहीं हुआ है।

किसी गरीब व्यक्ति की परेशानी सुनने के लिए कभी-कभी उसके पास बैठकर बातचीत करना आवश्यक होता है। उसकी समस्या केवल सरकारी आवेदन में दर्ज शब्दों तक सीमित नहीं होती। उसके पीछे परिवार की परिस्थिति, आर्थिक कठिनाई, सामाजिक दबाव और भावनात्मक पीड़ा भी हो सकती है।

इसलिए शासन को आंकड़ों के साथ मानवीय अनुभवों को भी समझना होगा।

मुख्यमंत्री के लिए प्रत्येक व्यक्ति से मिलना संभव न हो, लेकिन प्रत्येक नागरिक की बात सुनने की व्यवस्था बनाना संभव है। यही जनसुलभता का व्यावहारिक अर्थ है।

राजनीति में सादगी और सहजता का महत्व

राजनीति में सादगी का अर्थ केवल साधारण कपड़े पहनना या सार्वजनिक कार्यक्रमों में सामान्य दिखाई देना नहीं है। सादगी का वास्तविक अर्थ व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए।

कोई नेता साधारण वेशभूषा में रह सकता है, लेकिन यदि उसके आसपास ऐसी व्यवस्था हो कि सामान्य व्यक्ति उसके निकट पहुंच ही न सके, तो उसकी बाहरी सादगी जनसुलभता का पर्याप्त प्रमाण नहीं है।

इसी प्रकार, कोई नेता औपचारिक सुरक्षा घेरे में रहकर भी जनता के लिए प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था स्थापित कर सकता है। इसलिए जनसुलभता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि मुख्यमंत्री कितनी बार सुरक्षा घेरा तोड़कर लोगों के बीच गए।

महत्वपूर्ण यह है कि उनकी सरकार ने जनता की बात सुनने के लिए कौन-सी व्यवस्थाएं बनाई हैं और उन व्यवस्थाओं से नागरिकों को कितना लाभ मिल रहा है।

डॉ. जगन्नाथ मिश्र के बारे में प्रचलित स्मृतियां हमें व्यक्तिगत सहजता और जनता के प्रति अपनत्व के महत्व की याद दिलाती हैं। लेकिन आज के समय में उस भावना को संस्थागत रूप देना भी उतना ही आवश्यक है।

राजनीति में सादगी तब सार्थक होती है, जब वह नागरिक के जीवन को सरल बनाने में योगदान दे। सहजता तब मूल्यवान होती है, जब वह नागरिक को अपनी बात कहने का साहस प्रदान करे। और जनसंपर्क तब सफल माना जाना चाहिए, जब उससे वास्तविक समस्याओं के समाधान का रास्ता खुले।

जनता को किसी मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत परिचय होने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। उसे केवल इतना विश्वास होना चाहिए कि उसकी समस्या सुनने और उसका समाधान करने के लिए सरकार में कोई न कोई जिम्मेदार व्यवस्था अवश्य मौजूद है।

अतीत की स्मृतियों से वर्तमान के लिए सबक

डॉ. जगन्नाथ मिश्र का निधन 19 अगस्त 2019 को हुआ। किसी राजनीतिक व्यक्तित्व के निधन के बाद उसके समर्थक उसके योगदान को याद करते हैं, विरोधी उसके फैसलों की आलोचना करते हैं और इतिहासकार उसके जीवन तथा कार्यकाल का विश्लेषण करते हैं।

समय बीतने के साथ किसी नेता की स्मृति में कुछ घटनाएं अधिक प्रमुख हो जाती हैं। कभी उसके विकास कार्य याद किए जाते हैं, कभी उसके राजनीतिक संघर्ष, कभी विवादास्पद फैसले और कभी जनता के साथ उसके व्यवहार से जुड़ी व्यक्तिगत स्मृतियां।

डॉ. मिश्र के संदर्भ में भी ऐसा ही है।

उनकी राजनीतिक विरासत को समझने के लिए उनके कार्यकाल के ऐतिहासिक दस्तावेजों, सरकारी नीतियों, उपलब्धियों, आलोचनाओं और समकालीन परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक है। लेकिन जनता के साथ उनके व्यवहार से जुड़ी स्मृतियों का सामाजिक महत्व भी कम नहीं है।

इन स्मृतियों को केवल किसी एक नेता के प्रति श्रद्धा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इन्हें उस जनतांत्रिक आदर्श के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसकी आवश्यकता आज भी महसूस होती है।

राजनीति में व्यक्ति आते हैं और चले जाते हैं। सरकारें बदलती हैं। दलों के समीकरण बदलते हैं। चुनावी मुद्दे बदलते हैं। लेकिन जनता की मूल अपेक्षाएं बनी रहती हैं।

वह चाहती है कि शासन उसके लिए काम करे। उसे अपनी समस्या रखने के लिए सम्मानजनक अवसर मिले। उसके साथ अन्याय होने पर वह न्याय की उम्मीद कर सके। और जब वह अपने जनप्रतिनिधि के सामने खड़ी हो, तो उसे यह महसूस न हो कि वह किसी ऐसे व्यक्ति के सामने है, जो उसकी बात सुनने के लिए तैयार ही नहीं है।

यही कारण है कि किसी नेता की स्मृति केवल उसके पद और कार्यकाल के कारण जीवित नहीं रहती। उसके व्यवहार से जुड़ी घटनाएं भी लोगों के मन में स्थान बना सकती हैं।

बेलमोहन जैसे किसी गांव की स्मृति, मुख्यमंत्री के आवास पर बैठे फरियादियों की तस्वीर और दूर खड़े किसी गरीब व्यक्ति तक पहुंचने की कोशिश—ये सभी प्रसंग एक ही सवाल की ओर संकेत करते हैं कि राजनीति का वास्तविक उद्देश्य क्या होना चाहिए?

क्या राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम है, या सत्ता प्राप्त करने के बाद समाज के कमजोर लोगों की समस्याओं को समझना और उनका समाधान करना भी उसका अनिवार्य दायित्व है?

लोकतंत्र में इसका उत्तर स्पष्ट होना चाहिए।

सत्ता का उद्देश्य जनसेवा है और जनसेवा का मूल्यांकन जनता के अनुभवों से होना चाहिए।

बिहार और झारखंड के लिए एक साझा लोकतांत्रिक संदेश

बिहार और झारखंड की राजनीतिक यात्राएं अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों राज्यों के सामाजिक और ऐतिहासिक संबंध गहरे हैं। संयुक्त बिहार के दौर की अनेक स्मृतियां आज भी दोनों प्रदेशों के लोगों के बीच साझा राजनीतिक विरासत का हिस्सा हैं।

डॉ. जगन्नाथ मिश्र का राजनीतिक जीवन भी इसी ऐतिहासिक संदर्भ से जुड़ा हुआ है। तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके कार्यकालों पर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन उनके जनसंपर्क से जुड़ी स्मृतियों को वर्तमान शासन के संदर्भ में देखना उपयोगी है।

दोनों राज्यों में आज भी ऐसे नागरिक हैं, जिन्हें सरकारी कार्यालयों तक पहुंचने में कठिनाई होती है। ऐसे लोग हैं, जिन्हें अपनी समस्या के समाधान के लिए कई स्तरों पर प्रयास करना पड़ता है। ऐसे परिवार हैं, जिनके लिए एक छोटी-सी प्रशासनिक बाधा भी बड़ी परेशानी बन जाती है।

किसी विधवा की पेंशन अटक जाए, किसी गरीब परिवार का राशन बंद हो जाए, किसी विद्यार्थी की छात्रवृत्ति का भुगतान न हो, किसी श्रमिक की मजदूरी लंबित रह जाए या किसी ग्रामीण की जमीन से जुड़ी शिकायत का समाधान न हो—तो उस व्यक्ति के लिए यह समस्या केवल सरकारी फाइल का विषय नहीं होती। उसका सीधा संबंध उसके जीवन और परिवार से होता है।

ऐसे मामलों में प्रशासन की संवेदनशीलता का महत्व बहुत अधिक है।

मुख्यमंत्री यदि जनता के बीच जाकर समस्याएं सुनते हैं, तो उन्हें यह समझने का अवसर मिलता है कि सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ लोगों तक किस प्रकार पहुंच रहा है। वे यह भी जान सकते हैं कि योजनाओं के क्रियान्वयन में कहां बाधाएं हैं और किन क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है।

इसलिए जनसंपर्क को केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं माना जाना चाहिए। यह शासन की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने का माध्यम भी हो सकता है।

जनता के बीच जाना सरकार के लिए सूचना प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है। वहां से मिलने वाली जानकारी प्रशासनिक समीक्षा और नीतिगत सुधार में उपयोगी हो सकती है।

यदि कोई मुख्यमंत्री जनता के बीच सहजता से जाता है, तो इससे सरकार की छवि पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन यह सकारात्मक प्रभाव तभी स्थायी होगा, जब जनता की समस्याओं के समाधान के लिए ठोस कदम भी उठाए जाएं।

जनता को केवल यह नहीं दिखना चाहिए कि मुख्यमंत्री उसके बीच आए थे। उसे यह भी दिखाई देना चाहिए कि उनके आने के बाद उसकी समस्या का क्या हुआ।

जनता को सम्मान देना किसी सरकार का उपकार नहीं, कर्तव्य है

लोकतंत्र में कई बार जनसंपर्क और जनसेवा की चर्चा इस प्रकार की जाती है, मानो किसी मुख्यमंत्री का आम नागरिक से मिल लेना कोई असाधारण उपकार हो।

वास्तव में ऐसा नहीं होना चाहिए।

जनता से चुने गए प्रतिनिधि का नागरिकों से संवाद करना उसकी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। नागरिक को सम्मान देना, उसकी शिकायत सुनना और नियमों के अनुसार उसका समाधान करने का प्रयास करना किसी नेता की व्यक्तिगत कृपा नहीं, बल्कि सुशासन की बुनियादी अपेक्षा है।

हां, जब कोई नेता अपने पद की औपचारिकता से ऊपर उठकर जरूरतमंद व्यक्ति के प्रति अतिरिक्त संवेदनशीलता दिखाता है, तो उसका मानवीय महत्व अवश्य होता है। लेकिन इस संवेदनशीलता को किसी विशेष व्यक्ति तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

लोकतंत्र का आदर्श यह है कि व्यवस्था इतनी सक्षम हो कि नागरिक को सम्मान पाने के लिए किसी विशेष नेता के व्यक्तिगत हस्तक्षेप की प्रतीक्षा न करनी पड़े।

यदि किसी गरीब व्यक्ति को अपनी समस्या के समाधान के लिए मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत रूप से मिलना पड़े, तो उसकी समस्या का समाधान हो जाना अच्छी बात है। लेकिन यदि वही समस्या संबंधित अधिकारी अपने स्तर पर समयबद्ध तरीके से हल कर दे, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की अधिक बड़ी सफलता होगी।

इसलिए जनसुलभ नेतृत्व और जवाबदेह प्रशासन एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए।

नेता जनता के प्रति संवेदनशील हों और अधिकारी जनता के प्रति उत्तरदायी। शिकायतों का समाधान पारदर्शी हो और नागरिकों को यह जानकारी मिले कि उनकी बात कहां तक पहुंची। सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों का व्यवहार सम्मानजनक हो और सरकार अपनी आलोचना को भी सुनने की क्षमता रखे।

ऐसी व्यवस्था में जनता को मुख्यमंत्री तक पहुंचने के लिए असाधारण प्रयास नहीं करने पड़ेंगे, क्योंकि शासन स्वयं नागरिक तक पहुंचने का प्रयास करेगा।

निष्कर्ष: मुख्यमंत्री जनता से दूर नहीं, जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए

डॉ. जगन्नाथ मिश्र को याद करने का अर्थ केवल अतीत के किसी राजनीतिक व्यक्तित्व के प्रति सम्मान प्रकट करना नहीं है। इसका अर्थ उस लोकतांत्रिक प्रश्न को फिर से सामने लाना भी है, जो आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है—जनता और सत्ता के बीच की दूरी को कैसे कम किया जाए?

किसी मुख्यमंत्री का पद बड़ा होता है, उसकी जिम्मेदारियां व्यापक होती हैं और उसकी सुरक्षा आवश्यक होती है। लेकिन इन सबके बीच यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में सत्ता का मूल स्रोत जनता है।

जनता मुख्यमंत्री को चुनती है। जनता कर देती है। जनता सरकार की नीतियों से प्रभावित होती है। जनता ही विकास योजनाओं की वास्तविक लाभार्थी होती है और जनता ही सरकार के कामकाज का अंतिम मूल्यांकन करती है।

इसलिए जनता से संवाद करना किसी सरकार की कमजोरी नहीं, उसकी लोकतांत्रिक ताकत है।

डॉ. जगन्नाथ मिश्र के बारे में सुनाई जाने वाली स्मृतियां बताती हैं कि एक मुख्यमंत्री का व्यक्तित्व केवल उसके पद की ऊंचाई से नहीं, बल्कि इस बात से भी पहचाना जा सकता है कि वह समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है। वह उस व्यक्ति को कितना महत्व देता है, जिसके पास न राजनीतिक शक्ति है, न आर्थिक सामर्थ्य और न ही अपनी बात मनवाने का कोई प्रभावशाली माध्यम।

बेलमोहन की स्मृति हो या फरियादियों के बीच जाकर बैठने का प्रसंग, इन सबके केंद्र में एक ही विचार है—जनता को सम्मान देना और उसकी समस्या को गंभीरता से सुनना।

आज आवश्यकता इस बात की है कि इस विचार को केवल अतीत की स्मृतियों तक सीमित न रखा जाए। इसे शासन की कार्यशैली का हिस्सा बनाया जाए।

मुख्यमंत्रियों के लिए नियमित जनसुनवाई की प्रभावी व्यवस्था हो। शिकायतों के निस्तारण की समयसीमा निर्धारित हो। सुरक्षा व्यवस्था के भीतर भी आम नागरिकों के साथ संवाद के अवसर उपलब्ध हों। सरकारी अधिकारियों को नागरिकों के प्रति संवेदनशील व्यवहार के लिए जवाबदेह बनाया जाए। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के कमजोर वर्गों की समस्याओं को प्राथमिकता दी जाए और जनप्रतिनिधियों के लिए अपनी जनता से नियमित संवाद की व्यवस्था विकसित की जाए।

यह सब किसी एक दल या एक राज्य के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए आवश्यक है।

आज बिहार विकास के नए अवसरों की ओर बढ़ रहा है। राज्य में शिक्षा, रोजगार, उद्योग, कृषि, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में आगे बढ़ने की व्यापक संभावनाएं हैं। इन सभी क्षेत्रों में प्रगति के लिए प्रशासनिक क्षमता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक सहभागिता की आवश्यकता होगी।

लेकिन विकास की इस यात्रा में जनता और सरकार के बीच विश्वास का संबंध कमजोर नहीं होना चाहिए।

सड़कें, पुल, भवन, उद्योग और योजनाएं किसी राज्य की प्रगति के महत्वपूर्ण संकेतक हैं। लेकिन जनता के मन में शासन के प्रति विश्वास भी उतना ही महत्वपूर्ण है। नागरिक को यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी आवाज सुनी जाएगी, उसकी शिकायत पर विचार होगा और उसके सम्मान की रक्षा की जाएगी।

डॉ. जगन्नाथ मिश्र के जीवन से जुड़ी जनसुलभता की स्मृतियां हमें इसी विश्वास का महत्व समझाती हैं।

हो सकता है कि उनके कार्यकाल के प्रत्येक निर्णय पर सहमति न हो। हो सकता है कि उनकी राजनीति के कुछ पहलुओं की आलोचना की जाए। किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व का निष्पक्ष मूल्यांकन इन्हीं विभिन्न पक्षों को सामने रखकर किया जाना चाहिए। लेकिन जनता के साथ संवाद, सहजता और जरूरतमंदों की समस्याओं को सुनने की भावना को एक सकारात्मक लोकतांत्रिक मूल्य के रूप में अवश्य स्वीकार किया जा सकता है।

आज के मुख्यमंत्रियों के सामने चुनौती यह नहीं है कि वे अतीत के किसी नेता की हूबहू नकल करें। चुनौती यह है कि वे अपने समय की आवश्यकताओं के अनुरूप जनता तक पहुंचने और उसकी समस्याओं के समाधान के बेहतर तरीके विकसित करें।

सुरक्षा के साथ संवाद, तकनीक के साथ मानवीय संवेदना, विकास के साथ जवाबदेही और सत्ता के साथ विनम्रता—इन्हीं के मेल से लोकतंत्र मजबूत होगा।

अंततः किसी मुख्यमंत्री की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल यह नहीं होनी चाहिए कि उसके शासनकाल में कितनी योजनाएं बनीं या कितनी घोषणाएं की गईं। यह भी होना चाहिए कि उसके राज्य का सबसे कमजोर नागरिक कितनी सहजता से अपनी बात कह सकता है और उसे न्याय मिलने की कितनी वास्तविक उम्मीद है।

जनता को मुख्यमंत्री का चेहरा देखने के लिए टेलीविजन या मोबाइल पर निर्भर रहना पड़े, यह अपने आप में जनसुलभता की कमी का प्रमाण नहीं है; लेकिन यदि उसे अपनी समस्या रखने और उसका समाधान पाने का कोई प्रभावी रास्ता ही न मिले, तो यह गंभीर चिंता का विषय अवश्य है।

लोकतंत्र की असली खूबसूरती इसी में है कि सत्ता के सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति भी जनता के प्रश्नों से स्वयं को अलग न समझे।

डॉ. जगन्नाथ मिश्र की जनसुलभता से जुड़ी स्मृतियां हमें यही संदेश देती हैं कि मुख्यमंत्री का पद जनता से ऊपर बैठने का अधिकार नहीं, बल्कि जनता के प्रति अधिक बड़ी जिम्मेदारी है।

राजनीति में पद बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं और समय के साथ परिस्थितियां भी बदलती हैं। लेकिन जनता के प्रति सम्मान, संवेदनशीलता और जवाबदेही के मूल्य कभी पुराने नहीं पड़ते।

बिहार और झारखंड के लोगों की साझा ऐतिहासिक स्मृतियों में डॉ. जगन्नाथ मिश्र का स्थान चाहे जिस रूप में दर्ज हो, उनके जनसंपर्क से जुड़ी इन स्मृतियों को वर्तमान शासन के लिए एक महत्वपूर्ण सबक के रूप में देखा जा सकता है।

जनता को अपने मुख्यमंत्री तक पहुंचने के लिए भय, सिफारिश और बाधाओं से जूझना न पड़े। मुख्यमंत्री और जनता के बीच संवाद के दरवाजे खुले रहें। और शासन की प्रत्येक व्यवस्था नागरिक को यह विश्वास दिलाए कि लोकतंत्र में उसकी आवाज का महत्व है।

यही किसी भी जनतांत्रिक सरकार की सबसे बड़ी नैतिक जिम्मेदारी है। यही जनसेवा का वास्तविक अर्थ है और यही वह लोकतांत्रिक विरासत है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाना चाहिए।

जब मुख्यमंत्री जनता के बीच बैठकर उसका दर्द सुनते थे जब मुख्यमंत्री जनता के बीच बैठकर उसका दर्द सुनते थे Reviewed by PSA Live News on 8:37:00 am Rating: 5

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