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संपादकीय: स्वाभिमान पर टंगी चेतावनी की तख्ती, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की साख पर लगा एक गहरा और शर्मनाक दाग


अशोक कुमार झा 

प्रधान संपादक: PSA लाइव न्यूज एवं राँची दस्तक 

समय बड़ा बलवान रे भैया! यह उक्ति केवल किसी लोकगीत की अंतरा भर नहीं है, बल्कि समय चक्र का वह निष्ठुर और कड़वा सच है जो बड़ी से बड़ी व्यवस्थाओं, स्थापित संस्थाओं और रसूखदार वर्ग को उनकी धरातलीय हकीकत का अहसास करा देता है। हाल ही में झारखंड प्रदेश भारतीय जनता पार्टी कार्यालय के मीडिया विभाग के बाहर चस्पा किए गए एक लिखित आदेश ने राज्य के राजनीतिक और पत्रकारिता गलियारों में एक नया बवंडर खड़ा कर दिया है। उस पर्चे पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है — "प्रिय बन्धु, आप सभी से आग्रहपूर्वक निवेदन है कि बिना किसी आवश्यक कार्य के मीडिया विभाग में अनावश्यक रूप से बैठ कर अपना तथा मीडिया विभाग के सदस्यों का समय बर्बाद न करें। आदेश: प्रदेश कार्यालय।" प्रथम दृष्ट्या यह एक सामान्य प्रशासनिक सूचना या कार्यालयीय व्यवस्था बनाए रखने का पत्र प्रतीत होता है, लेकिन जब इसके अंतर्निहित संदेश, पृष्ठभूमि और सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों की परतों को उधेड़ा जाता है, तो इसके भीतर से लोकतंत्र के कहे जाने वाले 'चौथे स्तंभ' की एक बेहद लाचार, दयनीय और चिंताजनक तस्वीर निकलकर सामने आती है। यह नोटिस किसी आम जनमानस, फरियादी या विपक्षी दल के कार्यकर्ताओं के लिए नहीं है, बल्कि उन तथाकथित मीडियाकर्मियों के लिए एक कड़ा और सीधा तमाचा है जो राजनीतिक दलों के मीडिया प्रकोष्ठों में दिन-रात 'बिन-बुलाए मेहमान' की तरह जमावड़ा लगाए रहते हैं।

१. चाय-नाश्ते का लालच और विज्ञापनों की चाटुकारिता

राजनीतिक दलों के प्रदेश कार्यालयों का मीडिया विभाग मूलतः नीतियों के प्रचार-प्रसार, प्रामाणिक सूचनाओं के आदान-प्रदान और पार्टी के आधिकारिक दृष्टिकोण को जनता तक पहुँचाने का एक गंभीर केंद्र होता है। परंतु दुर्भाग्यवश, बीते कुछ वर्षों में यह पवित्र मंच समाचार संकलन का केंद्र कम और अनौपचारिक गपशप, चाटुकारिता तथा व्यक्तिगत लाभ साधने का मुख्य अड्डा अधिक बन चुका है। कड़वी हकीकत यह है कि पत्रकारिता का चोला ओढ़े कई तत्व इन कार्यालयों के चक्कर समाचार की खोज में नहीं, बल्कि दफ्तर के वातानुकूलित कमरों में बैठकर मुफ़्त की चाय, समोसे और नाश्ते का लुत्फ़ उठाने के लिए लगाते हैं। इससे भी बढ़कर, पार्टी के मीडिया प्रभारियों और प्रवक्ताओं की जी-हुज़ूरी करके अपने लिए कोई छोटा-मोटा विज्ञापन झटकना या कोई निजी काम निकलवाना ही इनका एकमात्र उद्देश्य बनकर रह गया है। जब किसी राजनीतिक दल को अपनी ही चौखट से पत्रकारों को दूर रखने के लिए ऐसा सार्वजनिक नोटिस चिपकाना पड़े, तो यह मान लेना चाहिए कि पानी अब सिर से ऊपर निकल चुका है और निष्पक्षता व गरिमा के सारे पैमानों को ध्वस्त किया जा चुका है।

२. आत्मसम्मान का क्षरण और धक्का-मुक्की की दहलीज पर खड़ा मीडिया

यह संदेश उन तमाम स्वघोषित पत्रकारों का सीधा और खुला अपमान है जो निष्पक्ष पत्रकारिता का दंभ तो भरते हैं, लेकिन आचरण में चाटुकारिता की पराकाष्ठा पार कर चुके हैं। इस नोटिस के बाद पैदा हुई स्थिति अत्यंत संवेदनशील और लज्जास्पद है। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या अब वह दिन देखना भी शेष रह गया है जब किसी राजनीतिक पार्टी के सामान्य कार्यकर्ता, सुरक्षाकर्मी या बाउंसर्स पत्रकारों को हाथ पकड़कर या धक्का देकर कार्यालय के बाहर का रास्ता दिखाएंगे? जिस मीडिया को लोकतंत्र का प्रहरी कहा जाता था, जिसके सामने कभी सत्ता और व्यवस्थाएं जवाबदेही के डर से थर्राती थीं, आज उसी मीडिया के प्रतिनिधियों को एक राजनीतिक दफ्तर के कमरे से बाहर खदेड़ने के लिए कागज़ के टुकड़ों पर धमकियों और चेतावनियों के फरमान जारी किए जा रहे हैं। यह स्थिति न केवल हास्यास्पद है, बल्कि भारतीय पत्रकारिता के उस स्वर्णिम और स्वाभिमानी इतिहास पर भी एक गहरा कलंक है जिसे गणेश शंकर विद्यार्थी और प्रभाष जोशी जैसे दिग्गजों ने अपने खून-पसीने से सींचा था।

        ╔════════════════════════════════════════════════════════════════════════════╗
        ║                     पत्रकारिता के गिरते स्तर का विश्लेषण                   ║
        ╠═════════════╦═════════════════════════════╦════════════════════════════════╣
        ║ क्षेत्र     ║ वर्तमान विकृति              ║ अपेक्षित सुधारात्मक कदम      ║
        ╠═════════════╬═════════════════════════════╬════════════════════════════════╣
        ║ कार्यशैली   ║ अकारण मीडिया सेल में बैठना  ║ केवल कवरेज/ब्रीफिंग हेतु जाना  ║
        ║ निष्ठा      ║ चाय-नाश्ते व विज्ञापनों का मोह ║ कलम व विचारों की स्वायत्तता  ║
        ║ सामाजिक साख ║ बिन-बुलाए मेहमान की छवि     ║ तथ्यपरक व खोजी पत्रकारिता    ║
        ╚═════════════╩═════════════════════════════╩════════════════════════════════╝

३. मुट्ठी भर 'मुफ़्तखोरों' के कारण पूरी मीडिया बिरादरी पर बदनामी का धब्बा

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दुखद और पीड़ादायक पहलू यह है कि इस अवांछित आचरण में पूरी मीडिया बिरादरी शामिल नहीं है, परंतु बदनामी का दंश सबको झेलना पड़ रहा है। आज भी पत्रकारिता जगत में ऐसे कई स्वाभिमानी, प्रतिबद्ध और गंभीर पत्रकार मौजूद हैं जो किसी भी राजनीतिक दल के कार्यालय में तब तक अपने कदम नहीं रखते जब तक कि उन्हें विधिवत और आधिकारिक रूप से आमंत्रित न किया गया हो। वे प्रेस कॉन्फ्रेंस या तय मुलाकातों के अलावा नेताओं के कमरों में बेवजह समय गँवाना अपने पेशवर स्वाभिमान के खिलाफ मानते हैं। वे किसी चाय-नाश्ते या विज्ञापन के लिए अपनी कलम और ज़मीर का सौदा कभी नहीं करते। लेकिन दुख की बात यह है कि मुट्ठी भर परजीवी और स्वार्थी तत्वों की हरकतों के कारण आज पूरा पत्रकार वर्ग कटघरे में खड़ा कर दिया गया है। जनता और राजनीतिक गलियारों में सभी पत्रकारों को एक ही लाठी से हाँका जाने लगा है, जिससे मुख्यधारा के समर्पित पत्रकारों का मनोबल भी टूट रहा है।

४. आत्मचिंतन की सख्त जरूरत: आने वाले समय के लिए गंभीर चेतावनी

झारखंड भाजपा कार्यालय के बाहर लगा यह पर्चा केवल एक राज्य या एक राजनीतिक दल तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि यह देशभर में तेज़ी से गिर रहे पत्रकारिता के नैतिक स्तर का एक अलार्म बेल (चेतावनी की घंटी) है। यदि मीडियाकर्मियों और पत्रकार संगठनों ने समय रहते इस स्थिति का संज्ञान नहीं लिया और अपने आचरण, मर्यादा तथा व्यावसायिक मानकों में सुधार नहीं किया, तो आने वाला समय संपूर्ण मीडिया जगत के लिए अत्यंत चिंतनीय और विनाशकारी साबित होगा।

  • आत्म-नियमन (Self-Regulation) का अभाव: जब मीडिया खुद अपनी मर्यादा तय नहीं करता, तो दूसरे लोग उस पर पाबंदियां लगाने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
  • संस्थागत साख का संकट: जनता का मीडिया पर से विश्वास पहले ही डगमगा रहा था, इस प्रकार की घटनाओं से बची-कुची साख भी पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।
  • पत्रकारिता संगठनों की चुप्पी: मीडिया यूनियनों को केवल अधिकारों की बात करने के बजाय ऐसे अवांछित तत्वों को चिन्हित कर बिरादरी से बाहर करने की पहल करनी होगी।

निष्कर्ष: समय के आईने में अपनी तस्वीर पहचाने मीडिया

"समय बड़ा बलवान रे भैया" — समय ने आज पूरे मीडिया तंत्र को एक ऐसे ऐतिहासिक चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ उसे कड़ा फैसला लेना ही होगा। उसे यह तय करना होगा कि वह लोकतंत्र के जागरूक प्रहरी के रूप में अपनी ऐतिहासिक भूमिका में बने रहना चाहता है या राजनीतिक दलों के दफ्तरों में मुफ़्त की चाय और विज्ञापनों की भीख माँगने वाला 'बिन-बुलाया मेहमान' बना रहना चाहता है। प्रदेश कार्यालय के बाहर चिपका यह आदेश पत्र केवल एक सूचना नहीं, बल्कि मीडिया के ज़मीर को झझोरने वाला एक आईना है। अगर आज भी पत्रकारों ने अपने खोए हुए स्वाभिमान को नहीं पहचाना और अपने आचरण में क्रांतिकारी सुधार नहीं किया, तो इतिहास उन्हें लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं, बल्कि व्यवस्था की चौखट पर पड़ा 'अवांछित बोझ' मानकर खारिज कर देगा।

संपादकीय: स्वाभिमान पर टंगी चेतावनी की तख्ती, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की साख पर लगा एक गहरा और शर्मनाक दाग संपादकीय: स्वाभिमान पर टंगी चेतावनी की तख्ती, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की साख पर लगा एक गहरा और शर्मनाक दाग Reviewed by PSA Live News on 11:45:00 am Rating: 5

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