अंग्रेजों के जमाने की विरासत: जामुदाग की ऐतिहासिक दुर्गाबाड़ी में आज भी अटूट श्रद्धा के साथ कायम है रायबहादुर नन्दलाल भगत के परिवार की अनूठी परंपरा
सोनाहातू (रांची): झारखंड की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक माटी में आस्था की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसकी एक जीवंत और प्रेरणादायक मिसाल रांची जिले के सोनाहातू प्रखंड अंतर्गत स्थित जामुदाग गांव की ऐतिहासिक दुर्गाबाड़ी में देखने को मिलती है। अंग्रेजों के शासनकाल में रायबहादुर नन्दलाल भगत द्वारा शुरू की गई मां दुर्गा की आराधना का यह सिलसिला आज भी अपनी उसी भव्यता, अनुशासन और दिव्यता के साथ अनवरत जारी है। वक्त के साथ दौर बदले, सत्ताएं बदलीं और परिवार की कई पीढ़ियां आगे बढ़ीं, लेकिन मां दुर्गा के प्रति अटूट विश्वास और पूर्वजों की विरासत के प्रति समर्पण में कभी कोई कमी नहीं आई। शरद ऋतु के आगमन के साथ ही जब पूरा झारखंड ढोल-नगाड़ों और मां दुर्गा के जयकारों से गूंज उठता है, तब जामुदाग की इस दुर्गाबाड़ी का कोना-कोना भक्तिमय और आलोकित हो उठता है। यहां होने वाली पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह उस अटूट पारिवारिक एकता का प्रतीक है, जिसे रायबहादुर नन्दलाल भगत ने दशकों पहले रोपा था और जिसे आज उनके वंशज एक बड़े वृक्ष के रूप में सींच रहे हैं।
आज के इस आधुनिक और भागदौड़ भरे दौर में जहां लोग अपनी परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं, वहीं रायबहादुर नन्दलाल भगत के वंशज अपनी इस पुश्तैनी विरासत को बचाने के लिए एक मिसाल पेश कर रहे हैं। आज परिवार के ये सदस्य आजीविका, उच्च शिक्षा, नौकरी और बड़े व्यवसायों के सिलसिले में देश और दुनिया के अलग-अलग कोनों में निवास करते हैं, लेकिन उनकी रूह हमेशा अपने पैतृक गांव जामुदाग में ही बसती है। जैसे ही शारदीय नवरात्र का समय नजदीक आता है, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फैले परिवार के सभी सदस्य अपने-अपने कार्यक्षेत्रों को छोड़कर सीधे जामुदाग की ओर रुख कर लेते हैं। हर कोई अपने परिवार और बच्चों के साथ इस महाअनुष्ठान में शामिल होने के लिए पैतृक घर पहुंचता है, जिससे पूरा गांव एक बार फिर से गुलजार हो उठता है। यह वार्षिक मिलन केवल पूजा-पाठ तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह परिवार की नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों, रीति-रिवाजों और पारिवारिक मूल्यों से जोड़ने का एक बहुत बड़ा माध्यम बन जाता है। इस आयोजन के बहाنے पूरा परिवार साल में एक बार एक ही छत के नीचे एकजुट होता है, जो आज के एकल परिवारों के दौर में समाज के लिए भी एक बहुत बड़ा संदेश है।
इस महान और पुरानी परंपरा को लगातार जीवंत बनाए रखने और हर साल इस महायोजन को सफलता की नई ऊंचाइयों पर ले जाने में परिवार के सभी सदस्यों की भूमिका बेहद सराहनीय और प्रेरणादायक रही है। इस पूरी व्यवस्था को संभालने और पूर्वजों के सपनों को साकार रखने में श्री दीप नारायण जायसवाल, श्री मुकुल भगत, श्री अनूप भगत, श्री बिनोद भगत, श्री संदीप भगत, श्री शेखर भगत, श्री सुभाष भगत, श्री सचिन भगत, श्री आशीष जायसवाल, श्री राहुल रंजन, श्री प्रभात रंजन और श्री प्रियम कुमार जैसे प्रमुख सदस्य सपरिवार अपनी अहम जिम्मेदारी निभा रहे हैं। इन सभी सदस्यों के साथ-साथ परिवार की बहुएं, बेटियां और युवा पीढ़ी भी तन, मन और धन से महाष्टमी और महानवमी के सभी कठिन अनुष्ठानों में पूरी निष्ठा के साथ जुटी रहती हैं। सबका सामूहिक उद्देश्य बस यही होता है कि उनके पुरखों द्वारा जलाई गई आस्था की यह अखंड ज्योति कभी मंद न पड़े और आने वाली पीढ़ियां भी इस महान विरासत पर गर्व महसूस कर सकें।
अंततः, जामुदाग गांव की यह ऐतिहासिक दुर्गाबाड़ी इस बात कासच्चा प्रमाण है कि यदि संस्कार पक्के हों और अपनों का साथ हो, तो समय के थपेड़े भी किसी मजबूत परंपरा को हिला नहीं सकते। अंग्रेजों के जमाने से लेकर आज इक्कीसवीं सदी के इस दौर तक का यह सफर इस बात की गवाही देता है कि सच्ची श्रद्धा और पारिवारिक एकजुटता ही किसी समाज की सबसे बड़ी पूंजी होती है। रायबहादुर नन्दलाल भगत के वंशजों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाई जा रही यह परंपरा न केवल उनकी पारिवारिक निष्ठा को दर्शाती है, बल्कि यह झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक और सामाजिक धरोहर को सहेजने में भी एक मील का पत्थर साबित हो रही है। जामुदाग की यह दुर्गाबाड़ी आज आने वाली हर नई पीढ़ी को यह सिखा रही है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में चाहे हम कितनी भी तरक्की क्यों न कर लें, लेकिन अपनी जड़ों, अपने पुरखों और अपनी संस्कृति से जुड़ाव ही हमारे अस्तित्व की असली पहचान है।
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2:41:00 pm
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