गौसेवा, संतान की सुख-समृद्धि और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देता गोवत्स द्वादशी का पावन पर्व: संजय सर्राफ
रांची: सनातन धर्म की महान परंपरा में गौमाता को केवल एक पशु नहीं, बल्कि साक्षात श्रद्धा, वात्सल्य, समृद्धि और संपूर्ण जगत के कल्याण का प्रतीक माना गया है। भारतीय संस्कृति के केंद्र में बसे इसी पूजनीय भाव को उजागर करने वाला गोवत्स द्वादशी का पर्व इस वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि यानी 5 नवंबर, दिन गुरुवार को पूरे देश में अपार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट एवं विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने इस पावन अवसर पर विस्तृत प्रेस वक्तव्य जारी करते हुए गोवत्स द्वादशी के धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह पर्व मुख्य रूप से गौवंश के प्रति अपनी निष्ठा व कृतज्ञता व्यक्त करने, संतान की मंगलकामना करने तथा प्रत्येक जीव के प्रति करुणा और सेवा का भाव जागृत करने का एक अत्यंत पवित्र अवसर है।
संजय सर्राफ ने भारतीय जीवन-दर्शन की गहराई को रेखांकित करते हुए कहा कि हमारी संस्कृति में गाय को माता के समान पूजनीय माना गया है और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गौमाता के शरीर में समस्त देवी-देवताओं का वास होता है। भारत के अलग-अलग राज्यों में इस पर्व को विविध सुंदर रूपों में मनाया जाता है, जहाँ महाराष्ट्र में इसे 'वसुबारस' और गुजरात में 'वाघ बारस' के नाम से जाना जाता है। कई क्षेत्रीय परंपराओं में गोवत्स द्वादशी को ही पंचदिवसीय दीपावली उत्सव के औपचारिक आरंभ का प्रतीक माना जाता है, जहाँ से पूरे वातावरण में शुभता और दीपोत्सव की ऊर्जा का संचार होने लगता है। इस दिन परिवार की महिलाएं अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए पूर्ण भक्ति भाव से व्रत रखती हैं। गौपूजन के माध्यम से न केवल बच्चों के जीवन के संकट दूर होते हैं, बल्कि पूरे घर-परिवार में सुख, शांति और लक्ष्मी का वास होता है।
धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक कथाओं के अनुसार, गोवत्स द्वादशी का यह व्रत मुख्य रूप से दिव्य गाय 'नंदिनी' से जुड़ा हुआ है, जिन्हें सुरभि यानी कामधेनु की पुत्री माना जाता है। मान्यता है कि नंदिनी गौमाता में अपने सच्चे भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करने की असीम शक्ति है और एक लोक प्रचलित कथा के अनुसार इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत व पूजन करने से संतान पर आने वाली बड़ी से बड़ी विपत्ति टल जाती है। इसी कारण सनातन परंपरा में इस पर्व को 'नंदिनी व्रत' के नाम से भी जाना और पूजा जाता है। इस दिन की पूजन विधि अत्यंत सात्विक और मन को शांति देने वाली होती है; प्रातःकाल स्नान के पश्चात गौमाता और उनके बछड़े को स्वच्छ जल से स्नान कराया जाता है, फिर उन्हें रोली, अक्षत, सुंदर पुष्पों और नए वस्त्रों या घंटी-मालाओं से सजाया जाता है। इसके पश्चात धूप-दीप प्रज्वलित कर उनकी आरती उतारी जाती है और उन्हें गुड़, भीगा हुआ चना तथा ताजा हरा चारा अत्यंत प्रेम से खिलाया जाता है। संध्या के समय परिवार के सभी सदस्य एकत्र होकर आरती करते हैं और गोवत्स द्वादशी की पावन कथा का श्रवण करते हैं।
अंत में संजय सर्राफ ने इस पर्व के आधुनिक और व्यावहारिक संदेश पर जोर देते हुए कहा कि गोवत्स द्वादशी केवल एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान या कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गौसंरक्षण, पशु कल्याण और पर्यावरण संतुलन का बहुत बड़ा मानवीय संदेश देता है। आज के वर्तमान युग में, जब प्राकृतिक असंतुलन बढ़ रहा है, गौवंश की निस्वार्थ सेवा, संरक्षण और संवर्धन के प्रति सामाजिक चेतना जगाना अत्यंत आवश्यक हो गया है। गोवत्स द्वादशी का यह पावन पर्व हम सभी को यही सिखाता है कि ईश्वर के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा केवल मंदिर या पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि वह समाज के हर मूक जीव के प्रति दया, सेवा, संवेदना और करुणा के भाव में निरंतर बहनी चाहिए।
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2:22:00 pm
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