अनंत चतुर्दशी पर गणेश विसर्जन और विष्णु उपासना का दिव्य संगम: विहिप एवं प्रणामी ट्रस्ट के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया पर्व का पावन महत्व
- 25 सितंबर को पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाएगी अनंत चतुर्दशी
- 14 लोकों की रक्षा और अखंड समृद्धि का प्रतीक माना जाता है 14 गांठों वाला 'अनंत सूत्र'
- सत्य, संयम और कर्तव्यनिष्ठा के संकल्प का पर्व है अनंत चौदस
रांची:
श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट एवं विश्व हिंदू परिषद (सेवा विभाग) के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर सनातन संस्कृति में इसके धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व पर विस्तृत प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाने वाला 'अनंत चतुर्दशी' (अनंत चौदस) का व्रत भगवान विष्णु की अनंत सत्ता, सुख-शांति, समृद्धि और अखंड मंगल की कामना का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।
इस वर्ष यह पावन पर्व 25 सितंबर (शुक्रवार) को मनाया जाएगा। इसी दिन दस दिवसीय गणेशोत्सव का समापन भी रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान श्री गणेश की प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ होगा, जो इसे दो महान परंपराओं का अद्भुत संगम बनाता है।
'अनंत' सत्ता और 14 गांठों वाले अनंत सूत्र का रहस्य
पर्व की व्याख्या करते हुए संजय सर्राफ ने कहा:
"‘अनंत’ शब्द का अर्थ है - जिसका न कोई आदि है और न अंत। यह पर्व साक्षात सर्वव्यापी भगवान श्री हरि विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना को समर्पित है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ उनके शय्या-स्वरूप शेषनाग और पापनाशिनी माता यमुना का भी विशेष पूजन किया जाता है।"
इस दिन पूजा-अर्चना के उपरांत 'अनंत सूत्र' धारण करने की प्राचीन परंपरा है। कच्चे सूत से निर्मित इस पवित्र धागे में 14 गांठें लगाई जाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ये 14 गांठें ब्रह्मांड के चौदह लोकों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम, अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल) का प्रतिनिधित्व करती हैं। पूजा के पश्चात इस सूत्र को अपनी दाहिनी भुजा (पुरुष) या बायीं भुजा (महिला) पर बांधने से भगवान विष्णु की सूक्ष्म कृपा बनी रहती है और यह मनुष्य को धर्म मार्ग पर चलने का संकल्प दिलाता है।
ऋषि कौंडिन्य और सुशीला की पौराणिक कथा से सीख
अनंत चतुर्दशी के महत्व को रेखांकित करते हुए संजय सर्राफ ने ऋषि कौंडिन्य और उनकी धर्मपत्नी सुशीला से जुड़ी पौराणिक कथा का उल्लेख किया।
- कथा का प्रसंग: सुशीला ने अत्यंत श्रद्धापूर्वक अनंत भगवान का व्रत रखा और अनंत सूत्र धारण किया, जिसके शुभ प्रभाव से उनके परिवार में अपार सुख-समृद्धि आई।
- भूल और परिणाम: कालान्तर में ऋषि कौंडिन्य ने अज्ञानतावश अनंत सूत्र के आध्यात्मिक महत्व को समझे बिना उसे तोड़कर अग्नि में फेंक दिया। ईश्वर के इस अनादर के परिणामस्वरूप उनका सारा वैभव समाप्त हो गया और उन्हें दर-दर के कष्ट सहने पड़े।
- पश्चाताप और पुनरुद्धार: जब ऋषि को अपनी भूल का आभास हुआ, तो उन्होंने वन-वन भटककर भगवान अनंत की कठोर तपस्या और क्षमा-याचना की। भक्तवत्सल भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर उनके समस्त कष्टों का निवारण किया और उनका खोया वैभव लौटा दिया।
यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर की अनुकंपा, श्रद्धा और संयम का अनादर कभी नहीं करना चाहिए।
पूजन विधि और जीवन का संदेश
संजय सर्राफ ने बताया कि इस दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए पूजा स्थल को पवित्र करें। तत्पश्चात भगवान अनंत की प्रतिमा या चित्र के समक्ष पुष्प, फल, धूप, दीप, रोली, अक्षत और नैवेद्य अर्पित कर कथा का श्रवण करें। अंत में अनंत सूत्र का पूजन कर उसे धारण करें तथा अपनी सामर्थ्य अनुसार व्रत या दान-पुण्य करें।
जीवन मूल्य: अनंत चतुर्दशी का मूल उद्देश्य केवल धन-समृद्धि की प्राप्ति नहीं, बल्कि जीवन में सत्य, सदाचार, संयम और कर्तव्यनिष्ठा को आत्मसात करना है। परिस्थितियां चाहे अनुकूल हों या प्रतिकूल, मनुष्य को अपने धर्म, आस्था और सद्कर्म के मार्ग पर सदा दृढ़ संकल्पित रहना चाहिए।
Reviewed by PSA Live News
on
9:40:00 pm
Rating:

कोई टिप्पणी नहीं: