जब कानून सुरक्षा की ढाल हो तो न्याय बचता है, लेकिन जब कानून का भय नागरिक की आवाज दबाने लगे तो सवाल लोकतंत्र से होता है
लेखक : अशोक कुमार झा
राजनीतिक, सामाजिक एवं प्रशासनिक समीक्षक
संपादक : रांची दस्तक एवं PSA लाइव न्यूज
कभी-कभी लोकतंत्र के सामने ऐसे सवाल खड़े हो जाते हैं, जिनका जवाब किसी एक व्यक्ति, किसी एक जाति या किसी एक राजनीतिक दल से नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र से मांगना पड़ता है। आज उन्हीं सवालों में से एक सवाल हमारे सामने खड़ा है—क्या इस देश में हर नागरिक वास्तव में बराबर है?
भारत का संविधान नागरिकों की समानता की बात करता है। कानून की नजर में व्यक्ति की पहचान उसके अधिकारों और कर्तव्यों से होती है। लेकिन जब किसी आम आदमी के मन में यह भय बैठने लगे कि किसी विवाद, बहस, शिकायत या आरोप के कारण उसके खिलाफ किसी विशेष कानून का इस्तेमाल हो सकता है और उसकी जिंदगी वर्षों तक अदालतों और थानों के चक्कर में उलझ सकती है, तब उस भय को भी लोकतंत्र की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
यह सवाल SC/ST समुदायों के अधिकारों के खिलाफ नहीं है। सदियों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव, सामाजिक अपमान और अत्याचार से सुरक्षा देना एक संवैधानिक आवश्यकता है। ऐसे कानून इसलिए बने कि कमजोर और वंचित व्यक्ति न्याय से वंचित न हो। यह व्यवस्था किसी की गुलामी स्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि अन्याय से सुरक्षा देने के लिए है।
लेकिन सवाल यह भी है—क्या सुरक्षा का अधिकार किसी दूसरे नागरिक के अधिकारों को समाप्त कर सकता है?
क्या किसी कानून का उद्देश्य यह हो सकता है कि शिकायत लगते ही किसी व्यक्ति को अपराधी मान लिया जाए?
क्या किसी नागरिक को केवल आरोप के आधार पर सामाजिक रूप से दोषी ठहरा देना न्याय है?
क्या किसी निर्दोष व्यक्ति को वर्षों तक मुकदमे का बोझ उठाना पड़े तो उसकी पीड़ा पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार नहीं होना चाहिए?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या शिकायत करने वाले और जिसके खिलाफ शिकायत हुई है, दोनों के अधिकारों की रक्षा एक साथ नहीं की जा सकती?
भारत का लोकतंत्र किसी एक जाति का लोकतंत्र नहीं है। यह केवल किसी वर्ग का लोकतंत्र नहीं है। यह हर उस व्यक्ति का लोकतंत्र है जो इस देश की मिट्टी में जन्मा है, जिसने इस देश को अपना घर माना है और जिसने संविधान को अपना सर्वोच्च नागरिक अनुबंध स्वीकार किया है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि SC/ST बड़े हैं या बाकी लोग।
प्रश्न यह होना चाहिए कि कानून बड़ा है या व्यक्ति?
और उत्तर साफ है—कानून सबसे बड़ा होना चाहिए।
अगर किसी SC/ST नागरिक के साथ अत्याचार होता है तो उसे न्याय मिलना चाहिए। अगर किसी अन्य नागरिक के साथ अपराध होता है तो उसे भी न्याय मिलना चाहिए। अगर कोई शिकायत वास्तविक है तो दोषी पर कार्रवाई होनी चाहिए। और अगर कोई शिकायत झूठी साबित होती है तो कानून की प्रक्रिया में निर्दोष व्यक्ति की प्रतिष्ठा, स्वतंत्रता और जीवन को भी संरक्षण मिलना चाहिए।
क्योंकि न्याय का अर्थ केवल पीड़ित को न्याय देना नहीं है; न्याय का अर्थ निर्दोष को अन्याय से बचाना भी है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में भी यह स्पष्ट रूप से सामने आया है कि SC/ST अत्याचार निवारण कानून पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण अधिकार देता है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया में यह भी देखा जाता है कि लगाए गए आरोप कानून के आवश्यक तत्वों को पूरा करते हैं या नहीं। कुछ मामलों में अदालतों ने ऐसे आरोपों पर कार्यवाही समाप्त भी की है जहां प्रथमदृष्टया कानूनी आधार नहीं पाया गया।
तो फिर आम आदमी का दर्द आखिर कौन सुने?
वह आदमी जो थाने जाने से डरता है।
वह आदमी जो मुकदमे के नाम से कांपता है।
वह परिवार जो अदालत की तारीखों के बीच अपनी जमा-पूंजी समाप्त कर देता है।
वह युवा जिसकी नौकरी और भविष्य पर मुकदमे की छाया पड़ जाती है।
वह बुजुर्ग जो सोचता है कि आखिर उसने ऐसा क्या अपराध कर दिया कि उसका पूरा जीवन अदालत की चौखट पर खड़ा हो गया?
क्या उसकी पीड़ा कम है क्योंकि वह SC/ST नहीं है?
नहीं।
और इसी तरह किसी SC/ST परिवार की पीड़ा भी कम नहीं है। किसी दलित या आदिवासी व्यक्ति को जातिगत अपमान, हिंसा या भेदभाव का सामना करना पड़े तो उसकी पीड़ा भी उतनी ही वास्तविक है। उसे न्याय मिलना ही चाहिए।
यही तो संविधान की खूबसूरती है—यह हमें पीड़ितों के बीच भेद करना नहीं सिखाता, बल्कि हर पीड़ित को न्याय देने की जिम्मेदारी देता है।
आज जरूरत है कि हम जातियों के बीच दीवार खड़ी करने के बजाय न्याय और अन्याय के बीच स्पष्ट रेखा खींचें।
SC/ST बनाम बाकी समाज का सवाल खड़ा करना समाधान नहीं है।
सवाल होना चाहिए—
सच बनाम झूठ।
न्याय बनाम अन्याय।
कानून बनाम कानून का दुरुपयोग।
अधिकार बनाम अधिकारों का अतिक्रमण।
हमारे पूर्वजों ने जिस आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया था, वह आजादी केवल अंग्रेजों से मुक्ति का नाम नहीं थी। वह उस भारत का सपना था जहां व्यक्ति को इंसान समझा जाए, जहां कानून किसी की जाति देखकर नहीं बल्कि तथ्य देखकर अपना काम करे और जहां सत्ता तथा व्यवस्था के सामने आम नागरिक अपनी बात कह सके।
आज अगर कोई नागरिक यह कहने से डरने लगे कि “मेरे साथ अन्याय हुआ है”, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।
और अगर कोई वंचित नागरिक यह सोचने लगे कि “मेरी जाति के कारण मेरी शिकायत भी शायद गंभीरता से नहीं ली जाएगी”, तो यह भी लोकतंत्र की विफलता है।
इसलिए लड़ाई किसी जाति के खिलाफ नहीं होनी चाहिए।
लड़ाई उस मानसिकता के खिलाफ होनी चाहिए जो कानून को हथियार बनाती है।
कानून कमजोर के हाथ में ढाल बने—यह जरूरी है।
लेकिन कानून किसी निर्दोष के गले में फंदा न बने—यह भी उतना ही जरूरी है।
किसी SC/ST नागरिक को सुरक्षा चाहिए तो राज्य उसे सुरक्षा दे।
किसी निर्दोष नागरिक को न्याय चाहिए तो राज्य उसे न्याय दे।
किसी पर झूठा आरोप लगे तो निष्पक्ष जांच हो।
किसी पर वास्तविक अपराध का आरोप हो तो कानून अपना काम करे।
न शिकायतकर्ता को पहले से झूठा माना जाए, न आरोपी को पहले से अपराधी।
क्योंकि अदालत का काम आरोप सुनना है, सच्चाई जांचना है और कानून के अनुसार फैसला देना है।
आज देश को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें किसी नागरिक को यह डर न हो कि वह किस जाति का है, सामने वाला किस जाति का है और विवाद होने पर कौन-सी धारा लग सकती है।
देश को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें हर नागरिक के मन में केवल एक विश्वास हो—
“मैं भारत का नागरिक हूं और मेरे लिए कानून है।”
न मैं किसी का गुलाम हूं,
न कोई मेरा मालिक है।
हम सब इस गणराज्य के नागरिक हैं।
हमारे पूर्वजों ने जिस आजादी के लिए बलिदान दिया था, उसकी सबसे बड़ी कीमत यही है कि आजादी केवल झंडा फहराने की रस्म न बन जाए। आजादी का अर्थ यह भी है कि आम आदमी अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा सके, न्याय मांग सके और कानून से डरने के बजाय कानून पर भरोसा कर सके।
इसलिए आज देश से एक करुण पुकार है—
ऐसा भारत मत बनाइए जहां नागरिक अपनी जाति देखकर अपने अधिकारों की सीमा तय करे।
ऐसा भारत बनाइए जहां किसी पर अत्याचार हो तो पूरा समाज उसके साथ खड़ा हो और किसी निर्दोष पर अन्याय हो तो पूरा समाज उसके साथ खड़ा हो।
क्योंकि अंततः सवाल यह नहीं है कि पीड़ित कौन है।
सवाल यह है कि—
क्या न्याय हुआ?
और यही सवाल हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानी के सामने भी खड़ा है।
उन्होंने अंग्रेजों से इसलिए लड़ाई नहीं लड़ी थी कि एक दिन भारत में एक नागरिक दूसरे नागरिक को अपना मालिक समझे।
उन्होंने आजादी इसलिए मांगी थी कि भारत में इंसान की पहचान उसकी जाति से पहले उसके नागरिक अधिकारों से हो।
आज जरूरत है उसी सपने को फिर से याद करने की।
न किसी की गुलामी।
न किसी की बादशाहत।
सिर्फ संविधान की सर्वोच्चता।
सिर्फ कानून का राज।
और हर नागरिक के लिए समान न्याय।
Reviewed by PSA Live News
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6:35:00 pm
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