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जाति के आधार पर समाज को बांटना देश के भविष्य के लिए गंभीर खतरा: अशोक कुमार झा

सर्वजन विकास पार्टी के संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष ने संवैधानिक व्यवस्था पर जताई गहरी चिंता, कहा—आजादी किसी एक जाति या वर्ग के लिए नहीं मिली थी


रांची।
सर्वजन विकास पार्टी के संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार झा ने देश की वर्तमान सामाजिक एवं संवैधानिक व्यवस्था को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि भारत किसी एक जाति, वर्ग या समुदाय के लिए आजाद नहीं हुआ था। देश की आजादी के लिए हजारों स्वतंत्रता सेनानियों और महापुरुषों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया था। उनका सपना ऐसे भारत का था, जहां नागरिक की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके नागरिक अधिकारों से हो और प्रत्येक व्यक्ति के साथ कानून के सामने समान व्यवहार किया जाए।

अशोक कुमार झा ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन का मूल उद्देश्य केवल अंग्रेजी शासन से मुक्ति प्राप्त करना नहीं था, बल्कि एक ऐसे स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना करना भी था, जहां नागरिकों को समान अधिकार, समान सम्मान और न्याय प्राप्त हो। उन्होंने कहा कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने जिस भारत की कल्पना की थी, उसमें नागरिकों के बीच जाति, धर्म, वर्ग या सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए था। कानून का शासन ऐसा होना चाहिए जिसमें अपराध के आधार पर कार्रवाई हो, न कि व्यक्ति की जातीय पहचान के आधार पर।

उन्होंने कहा कि आज देश में जिस प्रकार अलग-अलग सामाजिक वर्गों को लगातार जातीय पहचान के आधार पर देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, वह चिंताजनक है। SC, ST, OBC और General जैसी श्रेणियां संविधान और कानून की विभिन्न व्यवस्थाओं में अपना संदर्भ रखती हैं, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में यदि इन्हीं पहचानों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा किया जाने लगे तो समाज में अविश्वास और तनाव बढ़ सकता है।

“जाति पहचान हो सकती है, लेकिन नागरिकता से ऊपर नहीं”

अशोक कुमार झा ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में सामाजिक रूप से वंचित समुदायों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा आवश्यक है। ऐतिहासिक भेदभाव और अत्याचार के विरुद्ध कानून बनाए जाने का उद्देश्य कमजोर वर्गों को न्याय दिलाना है। लेकिन उनका कहना है कि किसी भी कानून का इस्तेमाल किसी निर्दोष नागरिक को भयभीत करने, दबाव बनाने अथवा व्यक्तिगत विवाद को आपराधिक रूप देने के लिए नहीं होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के साथ जाति के आधार पर अत्याचार होता है तो कानून को पूरी मजबूती के साथ उसके पक्ष में खड़ा होना चाहिए। लेकिन यदि किसी मामले में झूठा या दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाया गया हो तो निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से निर्दोष व्यक्ति को भी संरक्षण मिलना चाहिए। न्याय का अर्थ केवल शिकायतकर्ता की सुरक्षा नहीं, बल्कि निर्दोष व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा भी है।

उन्होंने आरोप लगाया कि आज कई जगहों पर लोगों को बातचीत या विवाद के दौरान ही SC/ST कानून के तहत मुकदमे में फंसा देने की धमकियां दिए जाने की शिकायतें सामने आती हैं। उन्होंने कहा कि यदि ऐसी शिकायतें सही हैं तो यह गंभीर विषय है और सरकार तथा न्याय व्यवस्था को इसकी निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। उनका कहना था कि किसी भी कानून की गरिमा तभी बनी रह सकती है जब उसका इस्तेमाल वास्तविक अपराध के मामलों में हो और प्रक्रिया निष्पक्ष हो।

IIT Bombay के प्रसंग को लेकर उठाए सवाल

अशोक कुमार झा ने IIT Bombay से जुड़े हालिया विवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल को रोकना शिक्षकों और संस्थानों की जिम्मेदारी है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कोई छात्र परीक्षा में नकल करता है तो क्या शिक्षक अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लें? क्या किसी शिक्षक का कर्तव्य नहीं है कि वह परीक्षा की निष्पक्षता और संस्थान के नियमों का पालन सुनिश्चित करे?

उन्होंने कहा कि यदि कोई शिक्षक नियमों के अनुसार नकल रोकता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की मांग करने से पहले पूरे मामले के तथ्य, आरोप और कानूनी आधार की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किसी भी मामले में जातीय पहचान के आधार पर दबाव बनाना उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि यदि किसी घटना में शिक्षक पर किसी विशेष कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है या ऐसी कार्रवाई की मांग की गई है, तो पूरे मामले की सच्चाई सामने आनी चाहिए। किसने क्या किया, किस परिस्थिति में कार्रवाई हुई, आरोप क्या हैं और कानून के कौन-कौन से प्रावधान लागू होते हैं—इन सभी सवालों का जवाब तथ्यों और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से मिलना चाहिए।

“कानून सुरक्षा की ढाल बने, भय का हथियार नहीं”

अशोक कुमार झा ने कहा कि देश में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के खिलाफ होने वाले वास्तविक अत्याचारों को रोकना सरकार और समाज की जिम्मेदारी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे किसी भी प्रकार के जातिगत अत्याचार के पक्ष में नहीं हैं। लेकिन उनका कहना है कि किसी भी कानून का इस्तेमाल भय पैदा करने या किसी व्यक्ति को दबाने के साधन के रूप में नहीं होना चाहिए।

उन्होंने कहा, “कानून कमजोर और वंचित व्यक्ति की ढाल बने, यह लोकतंत्र की आवश्यकता है। लेकिन कानून किसी निर्दोष व्यक्ति के लिए भय का कारण बन जाए, यह भी चिंता का विषय है। दोनों पक्षों के अधिकारों का संतुलन ही वास्तविक न्याय है।”

जातीय राजनीति पर भी उठाए सवाल

सर्वजन विकास पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी समाज को जोड़ने की होनी चाहिए, बांटने की नहीं। उन्होंने कहा कि यदि राजनीतिक लाभ के लिए लगातार समाज को अलग-अलग जातीय समूहों में बांटा जाता रहा और एक जाति के सामने दूसरी जाति को खड़ा किया जाता रहा तो इसके दूरगामी परिणाम गंभीर हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक नेतृत्व जातीय भावनाओं को भड़काने के बजाय शिक्षा, रोजगार, महंगाई, भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और आर्थिक असमानता जैसे वास्तविक मुद्दों पर देश को एकजुट करे।

“जातीय संघर्ष की स्थिति पैदा होने से पहले चेतना जरूरी”

अशोक कुमार झा ने चिंता जताई कि यदि समाज में लगातार यह भावना मजबूत होती गई कि एक वर्ग दूसरे वर्ग का विरोधी है, तो आने वाले समय में सामाजिक तनाव बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता और सामाजिक एकता है। अलग-अलग जातियों, भाषाओं, धर्मों और समुदायों के बावजूद देश एक साथ खड़ा रहा है। इस सामाजिक एकता को कमजोर करना किसी भी स्थिति में देशहित में नहीं हो सकता।

उन्होंने कहा कि राजनीतिक नेतृत्व को यह समझना होगा कि चुनावी लाभ और तत्काल राजनीतिक समीकरणों से ऊपर राष्ट्र की सामाजिक एकता होती है। यदि समाज ही विभाजित हो गया तो विकास, लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था भी प्रभावित होगी।

“हमारे पूर्वजों की कुर्बानी का सम्मान तभी होगा, जब हर नागरिक को न्याय मिले”

अशोक कुमार झा ने कहा कि जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की आजादी के लिए अपने परिवार, संपत्ति, सुख-सुविधा और यहां तक कि अपने प्राणों तक का बलिदान दिया, उन्होंने ऐसी व्यवस्था की कल्पना नहीं की थी जिसमें नागरिक एक-दूसरे को जातीय पहचान के आधार पर प्रतिद्वंद्वी या दुश्मन समझने लगें।

उन्होंने कहा कि आज हमें अपने स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों को फिर से समझने की आवश्यकता है। आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजों से मुक्ति नहीं, बल्कि भय, अन्याय, भेदभाव और असमान व्यवहार से मुक्ति भी है।

उन्होंने कहा कि देश के प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास होना चाहिए कि उसके साथ अन्याय होने पर उसे न्याय मिलेगा और उसके खिलाफ अन्यायपूर्ण कार्रवाई होने पर भी कानून उसकी रक्षा करेगा।

“नागरिक पहले, जातीय पहचान बाद में”

अशोक कुमार झा ने कहा कि भारत में हर व्यक्ति सबसे पहले एक नागरिक है। उसकी जातीय पहचान उसके सामाजिक जीवन का हिस्सा हो सकती है, लेकिन उसके संवैधानिक अधिकारों और नागरिक सम्मान से ऊपर नहीं हो सकती।

उन्होंने कहा कि संविधान ने सभी नागरिकों के लिए समानता, स्वतंत्रता और न्याय की भावना को महत्व दिया है। इसलिए समाज को ऐसी दिशा में ले जाना होगा जहां किसी व्यक्ति को उसकी जाति के कारण न विशेषाधिकार मिले और न ही केवल जातीय पहचान के आधार पर उसे अपराधी माना जाए।

उन्होंने कहा कि वास्तविक समानता का अर्थ है—अत्याचार पीड़ित को न्याय, निर्दोष को सुरक्षा, आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई और दोषी को कानून के अनुसार सजा।

देश को जातीय टकराव से बचाने की जरूरत

अशोक कुमार झा ने अंत में कहा कि देश के सामने आज अनेक गंभीर चुनौतियां हैं। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता है। ऐसे समय में यदि समाज का ध्यान लगातार जातीय संघर्ष की ओर मोड़ा गया तो इससे देश की मूल समस्याएं पीछे छूट जाएंगी।

उन्होंने सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और देशवासियों से अपील करते हुए कहा कि जाति के नाम पर एक-दूसरे से नफरत करने के बजाय संविधान, कानून और मानव गरिमा के आधार पर समाज को आगे बढ़ाया जाए।

उन्होंने कहा कि किसी भी समुदाय के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए और किसी भी निर्दोष नागरिक के साथ भी अन्याय नहीं होना चाहिए। देश को जातीय टकराव की ओर जाने से रोकना होगा। समाज को बांटने के बजाय जोड़ना होगा और कानून को किसी वर्ग विशेष का नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के न्याय और सुरक्षा का माध्यम बनाना होगा।

अशोक कुमार झा ने कहा कि यदि आज देश ने इस दिशा में गंभीरता से विचार नहीं किया तो आने वाली पीढ़ियां हमसे सवाल करेंगी कि जब समाज में विभाजन की दीवारें मजबूत हो रही थीं, तब हम चुप क्यों बैठे रहे। इसलिए समय की मांग है कि भारत को जातियों में नहीं, नागरिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर एकजुट किया जाए।

जाति के आधार पर समाज को बांटना देश के भविष्य के लिए गंभीर खतरा: अशोक कुमार झा जाति के आधार पर समाज को बांटना देश के भविष्य के लिए गंभीर खतरा: अशोक कुमार झा Reviewed by PSA Live News on 6:48:00 pm Rating: 5

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