IIT बॉम्बे की घटना ने शिक्षा व्यवस्था, कानून, सामाजिक न्याय और संस्थागत जवाबदेही पर खड़े किए कई असहज सवाल
लेखक : अशोक कुमार झा
राजनीतिक, सामाजिक एवं प्रशासनिक समीक्षक
संपादक : रांची दस्तक एवं PSA लाइव न्यूज
IIT बॉम्बे जैसे देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान से सामने आई साहिल वाकोड़े की मौत की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। एक युवा छात्र की मृत्यु कभी सामान्य घटना नहीं हो सकती। यह परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है और समाज के लिए आत्ममंथन का अवसर भी। लेकिन इस घटना के साथ एक दूसरा प्रश्न भी खड़ा हुआ है—क्या किसी छात्र की मृत्यु के बाद हम बिना पूरी जांच के किसी शिक्षक को दोषी मान लें? और इसके विपरीत यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या किसी प्रतिष्ठित संस्थान का शिक्षक केवल इसलिए हर आरोप से मुक्त मान लिया जाए क्योंकि वह शिक्षक है? इन दोनों सवालों का उत्तर भावनाओं से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, प्रमाण, कानून और न्यायिक प्रक्रिया से ही मिल सकता है।
आज IIT बॉम्बे में जो कुछ हुआ है, वह केवल एक छात्र और एक प्रोफेसर के बीच का विवाद नहीं है। यह भारतीय शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ा वह आईना है, जिसमें हमें एक साथ कई चेहरे दिखाई देते हैं—नकल की बढ़ती प्रवृत्ति, परीक्षा का दबाव, मानसिक स्वास्थ्य, जातिगत भेदभाव के आरोप, शिक्षक की जिम्मेदारी, संस्थागत जवाबदेही, कानून का प्रयोग और सोशल मीडिया की अदालत। यही कारण है कि इस घटना को केवल इस सवाल तक सीमित करना कि ‘किसका पक्ष सही है’, उचित नहीं होगा। असली सवाल यह होना चाहिए कि घटना की वास्तविकता क्या है और उस वास्तविकता तक निष्पक्ष तरीके से कैसे पहुंचा जाए।
परीक्षा किसी भी शिक्षण व्यवस्था की विश्वसनीयता का आधार होती है। यदि कोई विद्यार्थी परीक्षा कक्ष में मोबाइल लेकर जाता है, प्रश्नपत्र को किसी AI प्लेटफॉर्म पर डालता है और उससे उत्तर प्राप्त करने का प्रयास करता है, तो यह केवल उस विद्यार्थी की व्यक्तिगत गलती नहीं है। इससे उन सभी विद्यार्थियों के अधिकार प्रभावित होते हैं जो ईमानदारी से परीक्षा दे रहे हैं। IIT बॉम्बे के प्रारंभिक बयान के अनुसार साहिल वाकोड़े परीक्षा के दौरान मोबाइल का इस्तेमाल करते हुए पकड़े गए थे और कथित तौर पर प्रश्नपत्र को ChatGPT पर डालकर उत्तर लेने का प्रयास किया गया था। संस्थान के अनुसार उस समय उनके खिलाफ औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं हुई थी और उन्हें काउंसलिंग दी गई थी। यदि जांच में यह तथ्य सही साबित होता है, तो सवाल उठता है कि परीक्षा में नकल रोकने की जिम्मेदारी किसकी है? निश्चित रूप से शिक्षक और संस्थान की।
यदि शिक्षक नकल देखकर आंखें बंद कर दें तो ईमानदार विद्यार्थियों के साथ अन्याय होगा। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि शिक्षक को असीमित अधिकार मिल जाएं। शिक्षक को संस्थान के नियमों के भीतर रहकर कार्रवाई करनी चाहिए और छात्र की गरिमा तथा मानसिक स्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए। अनुशासन और संवेदनशीलता दोनों साथ चलने चाहिए। शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक सफलता तभी संभव है जब नियमों का पालन भी हो और विद्यार्थी को एक इंसान के रूप में समझने की कोशिश भी की जाए।
इस घटना का सबसे संवेदनशील पहलू जातिगत आरोप हैं। साहिल के परिवार की ओर से प्रोफेसर सूर्यनारायण दूल्ला और संस्थान से जुड़े लोगों पर जातिगत उत्पीड़न तथा मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगाए गए हैं और पुलिस ने इन आरोपों के आधार पर मामला दर्ज किया है। इन आरोपों की जांच अभी जारी है और उन्हें न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। यहीं समाज को अत्यंत सावधान रहने की आवश्यकता है। SC/ST कानून ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और अत्याचार से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया है। यदि किसी व्यक्ति के साथ उसकी जाति के कारण अपराध होता है तो कानून का संरक्षण मिलना चाहिए। लेकिन दूसरी ओर किसी कानून का अस्तित्व यह भी नहीं कहता कि किसी व्यक्ति को बिना जांच के दोषी मान लिया जाए। FIR जांच की शुरुआत होती है, अंतिम फैसला नहीं। किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज होना और न्यायालय द्वारा अपराध सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं।
भारत के संविधान ने प्रत्येक नागरिक को समानता और न्याय का अधिकार दिया है। किसी व्यक्ति की जाति चाहे जो हो, वह सबसे पहले इस देश का नागरिक है। उसके अधिकार भी हैं और उसके कर्तव्य भी। यदि किसी SC/ST विद्यार्थी के साथ जातिगत अपमान होता है तो कानून उसकी रक्षा करे। यदि किसी OBC विद्यार्थी के साथ भेदभाव होता है तो कानून उसकी रक्षा करे। यदि सामान्य वर्ग के विद्यार्थी के साथ अन्याय होता है तो कानून उसकी रक्षा करे। और यदि किसी शिक्षक के खिलाफ झूठा आरोप लगाया जाता है तो उसे भी निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया का अधिकार मिलना चाहिए। न्याय का अर्थ किसी एक पक्ष को हराना या जिताना नहीं, बल्कि सत्य तक पहुंचना है।
यही कारण है कि इस घटना को किसी एक जाति के पक्ष या विरोध में खड़ा करना भी गलत होगा। भारत किसी एक जाति का देश नहीं है। भारत हर नागरिक का देश है। सामाजिक न्याय की आवश्यकता को स्वीकार करना और कानून के संभावित दुरुपयोग पर सवाल उठाना—दोनों बातें एक साथ संभव हैं। यदि किसी कानून के गलत इस्तेमाल की शिकायत है तो उसका समाधान कानून को खत्म करना नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, न्यायिक निगरानी और दोष सिद्ध होने पर उचित कार्रवाई है। उसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति के साथ वास्तव में जातिगत अत्याचार हुआ है तो उसकी शिकायत को केवल ‘कानून का दुरुपयोग’ कहकर खारिज करना भी न्यायसंगत नहीं होगा।
प्रोफेसर सूर्यनारायण दूल्ला की शैक्षणिक पृष्ठभूमि को लेकर भी सोशल मीडिया पर कई दावे किए जा रहे हैं। IIT बॉम्बे की आधिकारिक प्रोफाइल के अनुसार वे Energy Science & Engineering विभाग में प्रोफेसर हैं। उनकी प्रोफाइल में Nagarjuna University से B.Tech, IIT Bombay से M.Tech और IIT Delhi से PhD की जानकारी दर्ज है। वे JEE Advanced से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी निभा चुके हैं और 2022 में Organising Chairman रहे हैं। उनकी उपलब्धियां यह बताती हैं कि उनका एक लंबा अकादमिक और संस्थागत करियर रहा है। लेकिन किसी व्यक्ति की उपलब्धियां उसे कानून से ऊपर नहीं बनातीं। इसी तरह किसी व्यक्ति पर आरोप लग जाना भी उसे अपराधी नहीं बना देता। अंतिम निष्कर्ष प्रमाण और जांच के आधार पर ही निकलना चाहिए।
इस पूरी घटना का सबसे बड़ा संस्थागत प्रश्न यह है कि क्या भविष्य में शिक्षक परीक्षा में नकल करते हुए किसी विद्यार्थी को पकड़ने से डरेंगे? यदि किसी शिक्षक के मन में यह भय बैठ जाए कि नियमों के अनुसार कार्रवाई करने के बाद भी उसके खिलाफ गंभीर आरोप लगाए जा सकते हैं, तो परीक्षा व्यवस्था की पूरी विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। इसलिए शिक्षकों को यह भरोसा होना चाहिए कि यदि उन्होंने संस्थान के नियमों के अनुसार काम किया है तो संस्थान उनके साथ खड़ा रहेगा। साथ ही विद्यार्थियों को भी यह विश्वास होना चाहिए कि उनके साथ किसी प्रकार का अपमान, भेदभाव या अन्याय नहीं होगा।
इसके लिए IIT जैसे संस्थानों में स्पष्ट SOP यानी Standard Operating Procedure होना चाहिए। परीक्षा में नकल करते पकड़े गए विद्यार्थी के साथ क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी, किस अधिकारी को सूचना दी जाएगी, क्या काउंसलर को बुलाया जाएगा, विद्यार्थी की मानसिक स्थिति का आकलन कैसे किया जाएगा, CCTV और डिजिटल साक्ष्य कैसे सुरक्षित रखे जाएंगे तथा गंभीर स्थिति में परिवार को कब सूचना दी जाएगी—इन सभी बातों की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। इससे शिक्षक भी सुरक्षित रहेंगे और विद्यार्थी भी।
यहां छात्र मानसिक स्वास्थ्य का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। IIT में प्रवेश पाने वाला विद्यार्थी अत्यंत कठिन प्रतिस्पर्धा से होकर आता है। वह परिवार की अपेक्षाएं लेकर आता है, कई बार आर्थिक और सामाजिक दबाव लेकर आता है और अनेक विद्यार्थी यह महसूस करते हैं कि यदि वे असफल हुए तो उनके परिवार की सारी उम्मीदें टूट जाएंगी। ऐसे वातावरण में केवल यह कहना कि ‘दबाव नहीं झेल सकते तो घर बैठो’, समस्या का समाधान नहीं हो सकता। नकल गलत है और उस पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन किसी विद्यार्थी की मानसिक स्थिति को समझना भी उतना ही जरूरी है। अनुशासन के साथ मानवीय संवेदनशीलता भी आवश्यक है।
हमारे समाज की एक बड़ी समस्या यह है कि हमने सफलता को अंक, रैंक, पैकेज और प्रतिष्ठित संस्थान से जोड़ दिया है। बच्चा कम अंक लाता है तो उसे लगता है कि वह असफल व्यक्ति है। जबकि परीक्षा में असफलता जीवन की असफलता नहीं होती। माता-पिता, शिक्षक और संस्थान को विद्यार्थियों तक यह संदेश पहुंचाना होगा कि एक परीक्षा उनके पूरे जीवन का फैसला नहीं करती। यदि विद्यार्थी गलती करता है तो उसे नियम के अनुसार जवाबदेह बनाना चाहिए, लेकिन उसके जीवन और भविष्य को केवल एक गलती से परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए।
इस घटना ने सोशल मीडिया की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सोशल मीडिया पर एक पक्ष शिक्षक को पूरी तरह दोषी बता रहा है तो दूसरा पक्ष शिक्षक को पूरी तरह निर्दोष बता रहा है। लेकिन जांच अभी जारी है। जब जांच एजेंसी CCTV, डिजिटल साक्ष्य, मोबाइल फोन, गवाहों के बयान और अन्य उपलब्ध प्रमाणों की जांच करेगी, तभी घटना की पूरी तस्वीर सामने आएगी। सोशल मीडिया की अदालत में किसी को अपराधी घोषित कर देना न्याय का विकल्प नहीं हो सकता।
IIT बॉम्बे की एक छात्रा प्रिया मिश्रा के नाम से भी एक बयान सोशल मीडिया और विभिन्न माध्यमों में प्रसारित हुआ है, जिसमें परीक्षा में नकल और प्रोफेसर दूल्ला के खिलाफ कार्रवाई को लेकर तीखे सवाल उठाए गए हैं। इस बयान में परीक्षा की ईमानदारी, आर्थिक-सामाजिक विशेषाधिकार और शिक्षक की भूमिका को लेकर कई बातें कही गई हैं। यदि किसी विद्यार्थी की यह व्यक्तिगत राय है तो उसे भी बहस का हिस्सा माना जा सकता है, लेकिन किसी वायरल बयान को अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं है। यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी छात्र की राय पूरे IIT बॉम्बे के विद्यार्थियों की राय नहीं मानी जा सकती।
इस घटना से एक और महत्वपूर्ण प्रश्न निकलता है—क्या शिक्षक और विद्यार्थी को आमने-सामने खड़ा कर दिया जाए? बिल्कुल नहीं। शिक्षक विद्यार्थी का दुश्मन नहीं है और विद्यार्थी शिक्षक का दुश्मन नहीं है। दोनों शिक्षा व्यवस्था के आवश्यक स्तंभ हैं। शिक्षक को यह भरोसा होना चाहिए कि नियमों के अनुसार काम करने पर उसका संस्थान उसके साथ रहेगा। विद्यार्थी को भी यह भरोसा होना चाहिए कि यदि उसके साथ अन्याय होता है तो उसकी शिकायत निष्पक्ष रूप से सुनी जाएगी। इसलिए आवश्यकता एक ऐसे स्वतंत्र और पारदर्शी शिकायत तंत्र की है जिसमें छात्र और शिक्षक दोनों को न्याय मिले।
इस मामले में सोशल मीडिया पर यह दावा भी किया गया कि प्रोफेसर दूल्ला को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों में उनके प्रशासनिक पद से हटाए जाने और उनके संस्थान में फैकल्टी सदस्य बने रहने के बीच अंतर बताया गया है। इसलिए पत्रकारिता में यह जरूरी है कि ‘इस्तीफा’, ‘पद से हटाया जाना’, ‘निलंबन’ और ‘जांच’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल प्रमाणित तथ्यों के आधार पर ही किया जाए। एक शब्द भी किसी व्यक्ति की सार्वजनिक छवि को बदल सकता है। यही पत्रकारिता की जिम्मेदारी है।
अब सबसे कठिन सवाल यह है कि यदि आरोप झूठे साबित होते हैं तो क्या होगा? यदि जांच में यह साबित होता है कि शिक्षक पर लगाए गए गंभीर आरोप प्रमाणित नहीं हुए, तो क्या केवल यह कहना पर्याप्त होगा कि वह निर्दोष हैं? किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, करियर और सामाजिक सम्मान को नुकसान पहुंचने के बाद उसकी भरपाई आसान नहीं होती। दूसरी ओर यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि किसी छात्र के साथ जातिगत उत्पीड़न हुआ या किसी अधिकारी ने अपने पद का दुरुपयोग किया, तो कार्रवाई भी उतनी ही स्पष्ट और कठोर होनी चाहिए। न्याय का सिद्धांत सरल है—जो दोषी है उसके खिलाफ कार्रवाई और जो निर्दोष है उसकी रक्षा।
यह भी समझना होगा कि यदि किसी विद्यार्थी ने नकल की, तो इससे उसके जीवन का मूल्य कम नहीं हो जाता। नकल गलत है, लेकिन नकल करने वाले विद्यार्थी को केवल ‘नकलची’ कहकर उसकी पूरी जिंदगी पर मुहर लगा देना भी उचित नहीं है। एक युवा की मृत्यु के बाद उसके प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल समाज के लिए किसी भी तरह उचित नहीं हो सकता। हमें एक साथ दो बातें कहनी होंगी—नकल स्वीकार्य नहीं है और एक विद्यार्थी का जीवन किसी परीक्षा से बड़ा है।
माता-पिता की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। आज हर परिवार चाहता है कि उसका बच्चा IIT, मेडिकल कॉलेज या किसी प्रतिष्ठित संस्थान में पहुंचे। लेकिन बच्चों को यह भरोसा भी चाहिए कि यदि वे असफल होंगे तो उनका परिवार उनका साथ नहीं छोड़ेगा। यदि बच्चा यह महसूस करने लगे कि कम अंक आने पर उसका सम्मान, प्रेम और भविष्य सब खत्म हो जाएगा, तो दबाव और बढ़ता जाता है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में मानसिक स्वास्थ्य की चर्चा केवल संकट आने के बाद नहीं, बल्कि सामान्य शैक्षणिक जीवन का हिस्सा बननी चाहिए।
कानून का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, न्याय स्थापित करना है। SC/ST कानून हो या कोई अन्य आपराधिक कानून, उसका उद्देश्य नागरिकों की सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करना है। लेकिन यदि किसी कानून के नाम पर किसी निर्दोष व्यक्ति को धमकाया जाता है तो उसकी शिकायत भी सुनी जानी चाहिए। उसी तरह यदि कोई व्यक्ति वास्तव में जातिगत अत्याचार का शिकार है और शिकायत करता है तो उसकी शिकायत को केवल कानून के दुरुपयोग की संभावना के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। रास्ता स्पष्ट है—न शिकायतकर्ता को पहले से झूठा माना जाए और न आरोपी को पहले से अपराधी।
भारत को ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जहां नकल के खिलाफ स्पष्ट और प्रभावी कार्रवाई हो, लेकिन विद्यार्थी के प्रति संवेदनशीलता भी बनी रहे। जहां शिक्षक की गरिमा सुरक्षित हो, लेकिन शिक्षक कानून से ऊपर न हो। जहां जातिगत भेदभाव के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो, लेकिन किसी निर्दोष व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दंडित न किया जाए। जहां मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हों, शिकायत तंत्र स्वतंत्र हो, CCTV और डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं और हर गंभीर घटना की निष्पक्ष जांच हो।
IIT जैसी संस्थाओं को इस घटना को केवल विवाद के रूप में नहीं, बल्कि सुधार के अवसर के रूप में देखना चाहिए। स्वतंत्र शिकायत व्यवस्था, 24 घंटे मानसिक स्वास्थ्य सहायता, परीक्षा के दौरान स्पष्ट SOP, शिक्षकों के लिए संस्थागत कानूनी सहायता, जातिगत शिकायतों की निष्पक्ष जांच, डिजिटल साक्ष्यों के संरक्षण और विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित grievance redressal system जैसी व्यवस्थाओं को और मजबूत किया जाना चाहिए। इससे भविष्य में किसी भी विवाद को बढ़ने से पहले संभालने में मदद मिल सकती है।
आरक्षण और सामाजिक न्याय पर भी बहस जरूरी है, लेकिन यह बहस तथ्यों और संविधान के दायरे में होनी चाहिए। भारत में ऐतिहासिक सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन तथा भेदभाव को देखते हुए विशेष संवैधानिक प्रावधान बनाए गए हैं। इन व्यवस्थाओं पर मतभेद हो सकते हैं, उनके प्रभाव पर बहस हो सकती है और सुधार के सुझाव भी दिए जा सकते हैं। लेकिन किसी समुदाय के खिलाफ घृणा पैदा करके सामाजिक न्याय की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। समानता का अर्थ इतिहास को भूलना नहीं है और सामाजिक न्याय का अर्थ वर्तमान में किसी निर्दोष के साथ अन्याय करना भी नहीं है।
आज जब हम कहते हैं कि देश की प्रतिभा विदेशों में जा रही है, तो इसके पीछे अनेक आर्थिक, शैक्षणिक और पेशेवर कारण हैं। लेकिन यदि हम प्रतिभा को देश में बनाए रखना चाहते हैं तो केवल IIT और विश्वविद्यालयों का निर्माण पर्याप्त नहीं होगा। हमें ऐसी संस्थाएं बनानी होंगी जहां विद्यार्थी सुरक्षित महसूस करें, शिक्षक सम्मानित महसूस करें, असफल विद्यार्थी को सहायता मिले, मानसिक स्वास्थ्य को कमजोरी न समझा जाए और किसी भी शिकायत की निष्पक्ष जांच हो।
साहिल वाकोड़े की मौत दुखद है और उनके परिवार का दुख असहनीय है। यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि उनके साथ जातिगत भेदभाव या मानसिक प्रताड़ना हुई, तो दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं, तो जिन लोगों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं, उनके अधिकार और प्रतिष्ठा भी सुरक्षित रहनी चाहिए। यदि परीक्षा में नकल हुई है तो उस पर संस्थान के नियमों के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि शिक्षक ने नियमों के अनुसार अपनी जिम्मेदारी निभाई है तो केवल किसी दुखद परिणाम के कारण उन्हें अपराधी नहीं माना जा सकता। और यदि जांच में शिक्षक या कोई अन्य अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसके पद या प्रतिष्ठा के कारण उसे बचाया भी नहीं जाना चाहिए।
यही न्याय है।
भारत किसी एक जाति का नहीं है। भारत किसी एक वर्ग का नहीं है। भारत किसी एक राजनीतिक दल का नहीं है। भारत किसी एक विचारधारा का नहीं है। भारत उसके संविधान के अधीन रहने वाले प्रत्येक नागरिक का है। एक दलित विद्यार्थी इस देश का उतना ही नागरिक है जितना आदिवासी विद्यार्थी, OBC विद्यार्थी या सामान्य वर्ग का विद्यार्थी। गरीब विद्यार्थी का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना आर्थिक रूप से संपन्न विद्यार्थी का। शिक्षक का सम्मान भी जरूरी है और छात्र की गरिमा भी।
इसलिए आज असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन मालिक है और कौन गुलाम। असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या कानून सबके लिए न्यायपूर्ण तरीके से लागू हो रहा है? क्या जांच निष्पक्ष होगी? क्या दोषी को दंड और निर्दोष को संरक्षण मिलेगा? क्या विद्यार्थी और शिक्षक दोनों की गरिमा सुरक्षित रहेगी? क्या जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ाई और कानून के संभावित दुरुपयोग की चिंता—दोनों को साथ लेकर चला जा सकता है? इन सभी सवालों का जवाब एक ही है—हमें ऐसा न्याय चाहिए जो व्यक्ति की जाति, पद, आर्थिक स्थिति या सामाजिक पहचान देखकर नहीं, बल्कि प्रमाण और कानून के आधार पर फैसला करे।
IIT बॉम्बे का यह प्रकरण हमें याद दिलाता है कि शिक्षा केवल अंक और रैंक का खेल नहीं है। शिक्षा का पहला उद्देश्य मनुष्य बनाना है। जब शिक्षा संस्थान में संकट पैदा हो, तब किसी एक पक्ष को हराने से ज्यादा जरूरी यह देखना चाहिए कि सत्य सामने आए और भविष्य में ऐसी त्रासदी दोबारा न हो।
एक परीक्षा में नकल रोकना शिक्षक का कर्तव्य है। छात्र की गरिमा बचाना संस्थान का कर्तव्य है। जातिगत भेदभाव रोकना कानून और समाज का कर्तव्य है। झूठे आरोप से निर्दोष की रक्षा करना न्याय व्यवस्था का कर्तव्य है। और इन सभी कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाना लोकतंत्र की जिम्मेदारी है।
साहिल के लिए न्याय हो। शिक्षक के लिए निष्पक्ष जांच हो। विद्यार्थियों का मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षित रहे। शिक्षकों का मनोबल सुरक्षित रहे। नकल के खिलाफ स्पष्ट कार्रवाई हो। जातिगत भेदभाव के खिलाफ शून्य सहनशीलता हो। और सबसे ऊपर—कानून की नजर में हर नागरिक को समान न्याय मिले।
कड़वा सवाल यही है—हम न्याय चाहते हैं या केवल अपने-अपने पक्ष की जीत?
क्योंकि किसी एक पक्ष की जीत न्याय नहीं होती। सत्य की जीत ही न्याय है।
Reviewed by PSA Live News
on
5:21:00 pm
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