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बायोमेट्रिक में दर्ज नहीं होती इंसान की मजबूरी, जब गलती की सजा मेहनत से बड़ी हो जाए, नियमों के बीच कहीं पीछे न छूट जाए इंसान


संपादकीय — सुजीत कुमार मिश्र।

        सुबह का समय था। एक कर्मचारी रोज की तरह अपने काम पर पहुंचा। चेहरे पर वही जिम्मेदारी थी, मन में परिवार की चिंता और आंखों में महीने के अंत में मिलने वाली तनख्वाह की उम्मीद। वह कोई बड़ा अधिकारी नहीं था। वह उन लाखों लोगों में से एक था, जिनके लिए नौकरी केवल नौकरी नहीं होती—वह उनके परिवार की रोजी-रोटी होती है। उस दिन काम कुछ अधिक था। जिम्मेदारियां भी अधिक थीं। पूरे दिन वह अपने काम में लगा रहा। शाम को घर लौटा तो शायद उसे यह भी याद नहीं रहा कि किसी छोटी-सी औपचारिकता में उससे चूक हो गई है। कुछ दिनों बाद उसे पता चला कि उसकी तनख्वाह से एक राशि काट ली गई है। कारण था - उपस्थिति में हुई एक छोटी-सी त्रुटि। वह कुछ क्षण चुप रहा।

उसके सामने उस दिन का पूरा परिश्रम घूम गया। फिर उसे अपना घर याद आया। बच्चों की जरूरतें याद आईं। महीने का राशन याद आया। बिजली का बिल, दवा का खर्च और घर की छोटी-बड़ी आवश्यकताएं याद आईं। उसने मन ही मन शायद यही सोचा होगा - “मेरी एक छोटी-सी गलती इतनी बड़ी कैसे हो गई कि इसकी कीमत मेरे पूरे परिवार को चुकानी पड़े?”

     यह कहानी किसी एक कर्मचारी की नहीं है। यह कहानी हमारे आसपास मौजूद उन असंख्य लोगों की है, जो प्रतिदिन अपने श्रम के बदले मिलने वाले सीमित वेतन से अपने परिवार की जिंदगी चलाते हैं।

     नियम आवश्यक हैं, लेकिन क्या संवेदना अनावश्यक नहीं है ? आज लगभग हर संगठित संस्था में नियम हैं। बायोमेट्रिक उपस्थिति है। समय की पाबंदी है। अवकाश के नियम हैं। कार्य-प्रणाली है और अनुशासन भी है। वास्तव में नियम होने ही चाहिए। किसी संस्था को बिना नियमों के चलाया नहीं जा सकता। लेकिन असली सवाल नियम होने का नहीं है। सवाल यह है कि नियम लागू करते समय क्या हम उस व्यक्ति को भी देखते हैं, जिस पर वह नियम लागू हो रहा है? बायोमेट्रिक मशीन यह बता सकती है कि किसी कर्मचारी की उपस्थिति किस समय दर्ज हुई। वह यह नहीं बता सकती कि वह व्यक्ति पूरे दिन कितनी मेहनत कर रहा था। वह यह नहीं समझ सकती कि किसी कर्मचारी से तकनीकी या मानवीय भूल क्यों हुई। वह यह नहीं जान सकती कि उसके घर में कौन-सी परेशानी चल रही थी। मशीन केवल रिकॉर्ड देखती है, पर इंसान को परिस्थिति देखनी चाहिए।

      एक तरफ नियम, दूसरी तरफ एक गरीब परिवार का चूल्हा, जिस व्यक्ति की तनख्वाह लाखों में है, उसके लिए कुछ सौ या कुछ हजार रुपये की कटौती शायद उतनी बड़ी समस्या न हो। लेकिन जिस कर्मचारी की पूरी मासिक आय ही परिवार की जरूरतों के लिए मुश्किल से पर्याप्त है, उसके लिए वही रकम बहुत बड़ी हो सकती है। उस पैसे से घर में सब्जी आ सकती है ।बच्चे की कॉपी-किताब आ सकती है। किसी बुजुर्ग की दवा खरीदी जा सकती है। बिजली का बिल जमा हो सकता है या शायद उस दिन घर में चूल्हा जल सकता है।

    यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक निर्णय और मानवीय संवेदना आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। कागज पर कटौती एक आंकड़ा है, लेकिन गरीब के घर में वही कटौती एक आवश्यकता का टूट जाना है। क्या पूरे महीने की मेहनत से बड़ी होती है एक छोटी गलती? एक कर्मचारी पूरे महीने काम करता है, समय देता है, अपनी क्षमता लगाता है, कभी निर्धारित समय से अधिक रुकता है, कभी निजी परेशानियों को भुलाकर संस्था की जिम्मेदारी निभाता है, संस्था की सफलता में अपना योगदान देता है। लेकिन यदि किसी एक दिन उससे कोई छोटी-सी भूल हो जाए, तो क्या उस एक भूल के सामने उसके पूरे महीने की मेहनत छोटी हो जानी चाहिए? यही प्रश्न आज हमें स्वयं से पूछने की आवश्यकता है।

      गलती और अपराध में अंतर होता है।  अनजाने में हुई भूल और जानबूझकर की गई लापरवाही एक जैसी नहीं हो सकती। नियमों का पालन न करने की आदत और कभी-कभार होने वाली मानवीय त्रुटि को एक ही नजर से देखना भी न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। यदि किसी कर्मचारी की लगातार लापरवाही है, तो कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जहां गलती छोटी है, अनजानी है या तकनीकी कारणों से हुई है, वहां पहले स्पष्टीकरण और सुधार का अवसर देना अधिक मानवीय व्यवस्था हो सकती है।

     संस्था के लिए काम करने वाला व्यक्ति केवल एक कर्मचारी संख्या नहीं है । हम अक्सर कर्मचारी को उसके कर्मचारी कोड, उपस्थिति रिकॉर्ड या पदनाम से पहचानने लगते हैं।

     लेकिन उस रिकॉर्ड के पीछे एक पूरा इंसान होता है। उसके पीछे एक परिवार होता है, उसके बच्चों के सपने होते हैं, उसके माता-पिता की उम्मीदें होती हैं, उसकी अपनी परेशानियां होती हैं और सबसे महत्वपूर्ण - उसकी मेहनत होती है। किसी भी संस्था की वास्तविक शक्ति केवल उसकी मशीनों, भवनों और नियमों में नहीं होती। वह शक्ति उन लोगों में होती है, जो उस संस्था के लिए अपना समय, श्रम और जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा देते हैं। इसलिए किसी कर्मचारी की छोटी-सी त्रुटि को देखने से पहले उसके पूरे योगदान को देखना भी जरूरी है।

     जिसकी कलम संस्था के लिए चली, उसका हाथ गलती पर क्यों कांपे? यह बात केवल मजदूर की नहीं है। यह बात उस कर्मचारी की भी है जो अपने संस्थान के हित में वर्षों से ईमानदारी से काम करता आया है। कई लोग अपनी संस्था के लिए केवल निर्धारित जिम्मेदारी ही नहीं निभाते। वे संस्था की प्रतिष्ठा को अपनी प्रतिष्ठा समझते हैं। उसकी उपलब्धियों को समाज तक पहुंचाते हैं। अतिरिक्त जिम्मेदारियां लेते हैं। आवश्यकता पड़ने पर अपने निजी समय का भी उपयोग करते हैं। ऐसे व्यक्ति से यदि कभी कोई छोटी-सी भूल हो जाए, तो क्या उसके वर्षों के योगदान का कोई महत्व नहीं रह जाता? क्या उसके पूरे समर्पण को एक छोटी-सी त्रुटि के सामने रखकर तौलना न्यायपूर्ण होगा ।  किसी व्यक्ति की पहचान उसकी एक गलती से नहीं, उसके पूरे कर्म से होनी चाहिए। सजा देने से पहले एक बार उसके घर की कल्पना कीजिए । क्योंकि हमारे निर्णय अक्सर कार्यालय की चारदीवारी के भीतर लिए जाते हैं। एक फाइल आती है, एक नियम देखा जाता है, एक रिकॉर्ड सामने रखा जाता है, और निर्णय हो जाता है। लेकिन उस निर्णय का असर कार्यालय से बाहर जाकर किसी घर की चारदीवारी में पहुंचता है- वहां एक पत्नी इंतजार कर रही होती है, बच्चे पिता की ओर देख रहे होते हैं, कोई मां दवा की उम्मीद लगाए बैठी होती है और महीने का हिसाब पहले ही अधूरा होता है । इसलिए किसी कर्मचारी की मेहनत की कमाई से राशि काटने से पहले केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होना चाहिए कि “नियम क्या कहता है?” यह भी देखना चाहिए कि- “इस निर्णय का असर किस पर पड़ेगा?” नियम न्याय के लिए होते हैं। यदि उनका परिणाम किसी ऐसी परिस्थिति को जन्म देता है, जहां एक छोटी-सी गलती के कारण किसी गरीब परिवार की आवश्यक जरूरत प्रभावित हो जाए, तो कम-से-कम एक बार मानवीय विवेक से उस मामले को देखना चाहिए। अनुशासन रहे, लेकिन डर का वातावरण न बने ।

      किसी संस्था में अनुशासन होना अच्छी बात है। लेकिन ऐसा अनुशासन, जिसमें कर्मचारी हर समय इस भय में जीने लगे कि छोटी-सी भूल भी उसकी मेहनत की कमाई छीन सकती है, अंततः कार्य-संस्कृति को प्रभावित कर सकता है। काम केवल मशीन से नहीं होता, काम मनुष्य करता है और मनुष्य से बेहतर काम तब निकलता है, जब उसके भीतर सम्मान, विश्वास और अपनापन हो। जहां कर्मचारी को यह विश्वास हो कि संस्था उसकी गलती को समझेगी, वहां वह अपनी गलती स्वीकार करने और सुधारने के लिए अधिक तैयार होगा।

    नियमों में मानवीय रास्ता भी होना चाहिए, आधुनिक संस्थानों में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ना स्वाभाविक है। बायोमेट्रिक व्यवस्था भी उपयोगी है। डिजिटल रिकॉर्ड भी जरूरी हैं। लेकिन इनके साथ ऐसी व्यवस्था भी होनी चाहिए, जिसमें वास्तविक परिस्थितियों की समीक्षा की जा सके। तकनीकी त्रुटि के लिए वैकल्पिक सत्यापन हो, अनजानी गलती के लिए स्पष्टीकरण का अवसर हो, नियमित रूप से अच्छा काम करने वाले कर्मचारी की पिछली कार्य-प्रणाली को भी ध्यान में रखा जाए, और सबसे बढ़कर- हर निर्णय में मानवीय विवेक की गुंजाइश बनी रहे। क्योंकि न्याय केवल नियम पढ़कर नहीं होता।

न्याय के लिए परिस्थिति को समझना भी पड़ता है।

      अंत में एक सवाल - हम सभी चाहते हैं कि संस्थाएं अनुशासित हों, हम चाहते हैं कि कर्मचारी समय पर आएं, हम चाहते हैं कि काम ईमानदारी से हो, हम चाहते हैं कि नियमों का पालन हो - तो हमें यह भी तो चाहना होगा कि इन सबके बीच इंसान बचा रहे । क्या हम यह सुनिश्चित नहीं कर सकते कि नियम की किताब के साथ संवेदना की एक छोटी-सी जगह भी खुली रहे? किसी कर्मचारी की एक छोटी-सी भूल को सुधारने का अवसर देकर हम शायद कोई बहुत बड़ा नुकसान नहीं करेंगे । लेकिन उसकी मेहनत की कमाई काटकर हम उसके घर में जो कमी पैदा करते हैं, उसका दर्द शायद उस कार्यालय की फाइल में कभी दर्ज नहीं होता। इसलिए आज आवश्यकता नियम खत्म करने की नहीं है; आवश्यकता नियमों को मानवीय बनाने की है । क्योंकि - मशीन उपस्थिति दर्ज कर सकती है, नियम गलती दर्ज कर सकता है,फाइल कार्रवाई  दर्ज कर सकती है; लेकिन किसी गरीब परिवार की आंखों में उतर आया दर्द कोई रजिस्टर दर्ज नहीं करता और शायद यही वह जगह है, जहां हमें ठहरकर सोचना चाहिए कि क्या हमारी व्यवस्था इतनी कठोर हो गई है कि उसमें इंसान की गलती के लिए जगह नहीं बची? नियम जरूर रहेंगे, अनुशासन भी रहेगा, लेकिन व्यवस्था की सबसे बड़ी पहचान तब होगी जब वह गलती देखने के साथ-साथ इंसान को भी देखेगी।

                

             -: लेखक परिचय :-

             सुजीत कुमार मिश्र संदीप विश्वविद्यालय, सीजौल, मधुबनी के श्री नित्यानंद झा स्कूल ऑफ एजुकेशन में सहायक प्राध्यापक हैं। शिक्षा, कला, शिक्षक-शिक्षा, सामाजिक सरोकार एवं समसामयिक शैक्षिक विषयों पर निरंतर लेखन एवं अकादमिक कार्य से जुड़े रहने के साथ-साथ सामाजिक विषयों पर लेखन करते रहे हैं।

          -: संपादकीय का सारांश :-

      यह संपादकीय निजी संस्थानों में मानवीय पक्ष पर केंद्रित है। इसमें तकनीक आधारित उपस्थिति व्यवस्था की उपयोगिता के साथ-साथ आकस्मिक भूल, तकनीकी समस्या और वास्तविक कार्य-व्यस्तता जैसी परिस्थितियों को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता पर चर्चा की गई है। लेख संस्थानों में अनुशासन और पारदर्शिता के साथ मानवीय संवेदनशीलता तथा व्यावहारिक दृष्टिकोण के संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इसका उद्देश्य किसी व्यवस्था का विरोध करना नहीं, बल्कि उसे अधिक न्यायसंगत, व्यवहारिक और कर्मचारी-अनुकूल बनाने पर विचार प्रस्तुत करना है।

बायोमेट्रिक में दर्ज नहीं होती इंसान की मजबूरी, जब गलती की सजा मेहनत से बड़ी हो जाए, नियमों के बीच कहीं पीछे न छूट जाए इंसान बायोमेट्रिक में दर्ज नहीं होती इंसान की मजबूरी, जब गलती की सजा मेहनत से बड़ी हो जाए, नियमों के बीच कहीं पीछे न छूट जाए इंसान Reviewed by PSA Live News on 5:05:00 pm Rating: 5

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