लेखक: अशोक कुमार झा
क्रांति और चेतना के अमर प्रतीक
भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में शहीद-ए-आजम भगत सिंह का नाम एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र के रूप में अंकित है, जिसने अपनी अल्पायु में ही पूरे राष्ट्र की चेतना को झकझोर कर रख दिया था। 28 सितम्बर, 1907 को जन्मे भगत सिंह मात्र 23 वर्ष, 5 माह और 26 दिन की आयु में 23 मार्च, 1931 को हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे। उनका संपूर्ण जीवन देशभक्ति, अद्वितीय विचार और सर्वोच्च आत्मबलिदान की एक अमर गाथा है। वे केवल शस्त्र उठाने वाले क्रांतिकारी ही नहीं थे, बल्कि एक दूरदर्शी विचारक और लेखक भी थे, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई वैचारिक दिशा और ऊर्जा प्रदान की। आज भी उनका व्यक्तित्व और कृतित्व देश की युवा पीढ़ी के लिए शाश्वत प्रेरणास्रोत बना हुआ है।
बाल्यकाल और राष्ट्रभक्ति के बीजारोपण की गाथा
भगत सिंह का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जहाँ राष्ट्रसेवा और देशभक्ति की परंपरा पहले से विद्यमान थी। उनके पिता सरदार किशन सिंह तथा उनके चाचा स्वयं क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रूप से संलग्न थे। घर के इस ओजस्वी और राष्ट्रप्रेमी वातावरण ने बालक भगत सिंह के हृदय में बचपन से ही मातृभूमि की स्वाधीनता के प्रति अटूट निष्ठा और समर्पण भर दिया था। उनके बाल्यकाल से जुड़ी एक ऐतिहासिक घटना उनकी असाधारण संकल्पशक्ति को दर्शाती है—मात्र तीन वर्ष की आयु में जब वे अपने पिता के साथ खेत में गए और मिट्टी में छोटे-छोटे पौधे लगाने लगे, तो पिता द्वारा यह पूछने पर कि वे क्या कर रहे हैं, बालक भगत सिंह ने बड़ी निर्भीकता और सहजता से उत्तर दिया था कि वे खेत में बंदूकों के पेड़ लगा रहे हैं, ताकि बहुत सारी बंदूकें उगाकर अंग्रेजों को अपने देश से बाहर खदेड़ा जा सके। जैसे-जैसे वे बड़े हुए, उन्होंने स्वदेशी आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लिया, विदेशी वस्त्रों की होली जलाई और ब्रिटिश हुकूमत के प्रति अपना कड़ा विरोध प्रकट किया। इसके साथ ही, वे समाज के निर्धन, शोषित और कृषक वर्ग की पीड़ा को बहुत गहराई से महसूस करते थे और उनके अधिकारों के लिए सदैव चिंतित रहते थे।
वैचारिक परिपक्वता, अध्ययनशीलता और संगठन निर्माण
भगत सिंह एक असाधारण अध्येता थे, जिन्हें हिंदी, उर्दू, पंजाबी, अंग्रेजी और बांग्ला भाषाओं का गहरा ज्ञान था। उन्होंने विश्वभर के महान विचारकों, समाजशास्त्रियों और क्रांतिकारियों के ग्रंथों व जीवनियों का सूक्ष्म अध्ययन किया था। कॉलेज जीवन के दौरान उन्होंने जन-जागरण के लिए रंगमंच को माध्यम बनाया और 'राणा प्रताप', 'भारत दुर्दशा' तथा 'सम्राट चंद्रगुप्त' जैसे राष्ट्रभक्तिपूर्ण नाटकों में अपने सशक्त अभिनय के माध्यम से युवाओं में देशप्रेम की ज्वाला प्रज्वलित की। उनका स्पष्ट मानना था कि क्रांति केवल हिंसा या हथियारों का खेल नहीं है, बल्कि "इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर ही तेज हुआ करती है।"
महान क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा के आदर्शों से अनुप्राणित होकर तथा विवाह के पारिवारिक दबाव से मुक्त रहकर देशसेवा में पूर्णतः समर्पित होने के उद्देश्य से वे गृहत्याग कर चंद्रशेखर आजाद की 'हिन्दुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) से जुड़ गए। इसके उपरांत, मात्र 16 वर्ष की अवस्था में उन्होंने देश के युवाओं को संगठित करने और उनमें क्रांतिकारी चेतना का संचार करने के ध्येय से 'नौजवान भारत सभा' की स्थापना की।
ऐतिहासिक क्रांतिकारी संघर्ष: जलियांवाला बाग से असेंबली बमकांड तक
जलियांवाला बाग के अमानवीय नरसंहार ने भगत सिंह के संवेदनशील मन पर गहरा प्रभाव डाला था। उन्होंने उस रक्त-रंजित पवित्र माटी को अपने माथे से लगाकर देश को अंग्रेजी गुलामी से मुक्त कराने की दृढ़ प्रतिज्ञा ली। जब साइमन कमीशन के विरोध के दौरान अंग्रेजों के लाठीचार्ज से गंभीर रूप से घायल होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हुई, तो भगत सिंह ने राजगुरु और सुखदेव के साथ मिलकर ब्रिटिश पुलिस अधिकारी सांडर्स का वध करके इस अन्याय का मुंहतोड़ जवाब दिया।
इसके पश्चात, 8 अप्रैल, 1929 को जन सुरक्षा कानून (Public Safety Bill) और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल जैसे दमनकारी कानूनों का विरोध करने के लिए उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में खाली स्थान पर बम और पर्चे फेंके। इस साहसिक कदम का उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं, बल्कि "बहरी हो चुकी ब्रिटिश सरकार को जनता की आवाज सुनाना" था। घटना के बाद उन्होंने भागे बिना स्वेच्छा से अपनी गिरफ्तारी दी और असेंबली हॉल को 'इंकलाब जिंदाबाद' और 'साम्राज्यवाद का नाश हो' के गगनभेदी नारों से गुंजायमान कर दिया, जिसके बाद उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
जेल जीवन, बौद्धिक सृजन और भावी भारत का दर्शन
जेल की कालकोठरी में अमानवीय यातनाएं सहने के बाद भी भगत सिंह का मनोबल कभी डगमगाया नहीं। वे जेल के भीतर निरंतर अध्ययन और गंभीर साहित्य-सृजन में लीन रहे। जेल प्रवास के दौरान उन्होंने कई कालजयी कृतियों की रचना की, जिनमें शामिल हैं:
- 'आत्मकथा' (Autobiography)
- 'द डोर टू डेथ' (The Door to Death)
- 'आइडियल ऑफ सोशलिज्म' (Ideal of Socialism)
- 'स्वाधीनता की लड़ाई में पंजाब का उभार'
जेल की कोठरी में वे अमर क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की रचना 'मेरा रंग दे बसंती चोला' बड़े भाव से गुनगुनाया करते थे। भगत सिंह का दृष्टिकोण केवल अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने तक सीमित नहीं था; उनका वास्तविक स्वप्न एक ऐसे आजाद भारत का निर्माण करना था जो जातिवाद, छुआछूत, सामाजिक अन्याय और वर्ग-भेद से पूरी तरह मुक्त हो, जहाँ प्रत्येक नागरिक समृद्ध, सम्मानजनक और खुशहाल जीवन व्यतीत कर सके।
अमर शहादत और युगीन विरासत
23 मार्च, 1931 की संध्या को लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी के तख्ते पर ले जाया गया। फांसी से कुछ क्षण पूर्व तक भगत सिंह 'सत्यार्थ प्रकाश' और 'कामरेड लेनिन' की पुस्तकें पढ़ने में मग्न थे। फांसी के फंदे को सहर्ष चूमते हुए उनके अंतिम शब्द थे— "खुश रहो अहले-वतन, हम तो सफर करते हैं!"
उन्होंने भारत माता के चरणों में अपना शीश नवाते हुए यह पंक्तियां दोहराई थीं:
"दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फत, मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी।"
मातृभूमि की वेदी पर दी गई भगत सिंह की यह सर्वोच्च आहुति भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हो गई। उन्होंने अपनी शहादत से सोये हुए भारतीय समाज में नवचेतना और क्रांति की वह मशाल प्रज्वलित की, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाकर रख दी।
वर्तमान प्रासंगिकता और हमारा संकल्प
परंतु अत्यंत दुखद पहलू यह है कि उन्होंने जिस स्वतंत्र, समतामूलक और वैचारिक रूप से समृद्ध भारत की परिकल्पना को लेकर हंसते-हंसते अपनी शहादत दी थी, आज हम राह भटक कर उससे काफी दूर चले गए हैं। आजादी के इतने दशकों बाद भी सामाजिक विषमता, संकीर्णता और भ्रष्टाचार जैसी कुरीतियां हमारे समाज में व्याप्त हैं, जो उनके सपनों के भारत के आड़े आती हैं।
आज समय की मांग है कि हम केवल औपचारिकता के लिए शहीद-ए-आजम को याद न करें, बल्कि उनके विचारों और आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात करें। आज हमें उनको नमन करते हुए और उनके अमर बलिदान को स्मरण करते हुए उनके सपनों का भारत बनाने का सच्चा संकल्प लेना चाहिए। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि और कृतज्ञता होगी।
लेखक: अशोक कुमार झा (वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक, सामाजिक व प्रशासनिक विश्लेषक)
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11:49:00 pm
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