बड़े संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों की आत्महत्या हमें परीक्षा से आगे बढ़कर शिक्षा की पूरी व्यवस्था पर सोचने को मजबूर करती है
संपादकीय
देश में किसी बच्चे का आईआईटी, आईआईएम, एम्स अथवा किसी अन्य प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में प्रवेश मिलना केवल उस बच्चे के लिए नहीं, बल्कि पूरे परिवार के लिए गर्व और उत्सव का विषय होता है। वर्षों की मेहनत, प्रतियोगिता और संघर्ष के बाद जब किसी बच्चे का नाम देश के किसी शीर्ष संस्थान की सूची में आता है तो माता-पिता को लगता है कि उनके बच्चे ने जिंदगी की सबसे बड़ी मंजिल हासिल कर ली है। लेकिन क्या वास्तव में प्रवेश ही मंजिल है? क्या उस प्रतिष्ठित संस्थान की ऊंची इमारतों के भीतर पहुंच जाने के बाद उस बच्चे की जिंदगी आसान हो जाती है? शायद नहीं। असली परीक्षा तो कई बार उसके बाद शुरू होती है।
हाल की IIT Bombay की घटना ने पूरे देश को फिर सोचने के लिए मजबूर किया है। दूसरे वर्ष के छात्र साहिल वाकोड़े की आत्महत्या के बाद संस्थान में छात्रों का विरोध, मानसिक स्वास्थ्य सहायता को लेकर उठे सवाल और परिवार की ओर से लगाए गए कथित भेदभाव के आरोप जांच के दायरे में हैं। संस्थान ने भी कहा है कि मामला जांच के अधीन है और लोगों से अटकलों से बचने की अपील की है। इसलिए इस घटना के अंतिम कारण पर निष्कर्ष निकालना जांच पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा। लेकिन एक बात निर्विवाद है—एक युवा जीवन का इस तरह समाप्त हो जाना हमारी शिक्षा व्यवस्था, परिवार और समाज तीनों के सामने एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है।
सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों होता है?
हमारे समाज ने सफलता को अंकों, रैंक, संस्थान और नौकरी के पैमाने पर मापना शुरू कर दिया है। बच्चा स्कूल में अच्छे अंक लाए तो वह प्रतिभाशाली है। प्रतियोगी परीक्षा में अच्छी रैंक आए तो वह सफल है। आईआईटी में प्रवेश मिल जाए तो परिवार का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है। लेकिन उसी बच्चे के भीतर क्या चल रहा है, वह कितना दबाव महसूस कर रहा है, उसे अपने भविष्य को लेकर कितना भय है, उसे अपने साथियों के सामने कैसा महसूस होता है—इन सवालों के लिए हमारे पास अक्सर समय नहीं होता।
हम बच्चे से पूछते हैं—“कितने नंबर आए?”
बहुत कम लोग पूछते हैं—“तुम ठीक हो?”
यही अंतर समझना होगा।
प्रतिष्ठित संस्थानों में देश के अलग-अलग हिस्सों से बच्चे आते हैं। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि अलग होती है, आर्थिक परिस्थितियां अलग होती हैं, पारिवारिक परिस्थितियां अलग होती हैं और मानसिक तैयारी भी अलग होती है। प्रवेश की प्रक्रिया चाहे जिस नियम के तहत हुई हो, संस्थान में पहुंचने के बाद पढ़ाई का पाठ्यक्रम, परीक्षा और शैक्षणिक मानक सामान्य रूप से एक साझा व्यवस्था के अनुसार चलते हैं। यही किसी प्रतिष्ठित संस्थान की अकादमिक गुणवत्ता का आधार भी है। लेकिन यह भी वास्तविकता है कि सभी बच्चे एक ही स्तर की तैयारी और एक जैसी परिस्थितियों से वहां नहीं पहुंचते।
यहीं से एक महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है—क्या समान परीक्षा का अर्थ समान अवसर भी है?
निश्चित रूप से किसी भी संस्थान की शैक्षणिक गरिमा बनाए रखने के लिए मानक आवश्यक हैं। किसी छात्र को केवल उसके प्रवेश के तरीके के आधार पर अलग शैक्षणिक मानक देना उचित नहीं होगा। लेकिन समान मानक का अर्थ यह भी नहीं होना चाहिए कि जो बच्चा किसी विषय में पीछे रह गया, उसे आगे बढ़ने के लिए अतिरिक्त शैक्षणिक सहायता की आवश्यकता ही नहीं है।
जिस बच्चे ने प्रवेश परीक्षा में 90 या 95 प्रतिशत अंक प्राप्त किए हैं और वर्षों से अत्यंत प्रतिस्पर्धी माहौल में पढ़ने का अभ्यास किया है, उसकी शैक्षणिक यात्रा और उस बच्चे की यात्रा अलग हो सकती है जिसने अपेक्षाकृत कम अंक के साथ प्रवेश पाया और फिर संस्थान में पहुंचकर पहली बार उस स्तर की प्रतिस्पर्धा का सामना किया।
लेकिन एक बार संस्थान में पहुंचने के बाद दोनों के सामने एक ही परीक्षा है।
यहीं प्रतिस्पर्धा और आत्मसम्मान का संघर्ष शुरू हो सकता है।
बहुत से बच्चे इस चुनौती को स्वीकार करते हैं। वे अतिरिक्त मेहनत करते हैं। अपने कमजोर विषयों पर काम करते हैं। शिक्षकों से मदद लेते हैं। मित्रों का सहयोग लेते हैं और धीरे-धीरे अपने साथियों के स्तर तक पहुंच जाते हैं। ऐसे अनेक विद्यार्थी बाद में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं और यह साबित करते हैं कि प्रवेश के समय के अंक जीवन की अंतिम क्षमता का प्रमाण नहीं होते।
लेकिन हर बच्चा समान गति से आगे नहीं बढ़ पाता।
जो बच्चा लगातार अपने साथियों से पीछे रह जाता है, उसके भीतर धीरे-धीरे हीनभावना जन्म ले सकती है। उसे लग सकता है कि बाकी सभी उससे बेहतर हैं। उसे डर लग सकता है कि परिवार क्या कहेगा। दोस्त क्या सोचेंगे। घर जाकर क्या जवाब देगा। जिस बच्चे को कभी परिवार ने भविष्य का बड़ा अधिकारी, इंजीनियर, डॉक्टर या वैज्ञानिक समझा था, वही बच्चा जब लगातार असफलताओं से गुजरता है तो उसके भीतर यह भावना पैदा हो सकती है कि उसने अपने माता-पिता को निराश कर दिया है।
और यही वह मोड़ है, जहां हमें सबसे ज्यादा सावधान होने की आवश्यकता है।
असफलता और व्यक्ति—दो अलग चीजें हैं।
एक परीक्षा में असफल होना व्यक्ति का असफल होना नहीं है। किसी विषय में कम अंक आना जीवन में कम मूल्यवान होने का प्रमाण नहीं है। किसी प्रतिष्ठित संस्थान में टिकने में कठिनाई होना जिंदगी के बाकी रास्तों के बंद हो जाने का संकेत नहीं है।
लेकिन हमारा समाज बच्चों को यह बात पर्याप्त मजबूती से नहीं सिखा पाया है।
हमने उन्हें सफलता की सीढ़ियां तो गिना दीं, लेकिन असफलता के बाद उठकर खड़े होने का साहस नहीं सिखाया।
हमने कहा—“तुम्हें टॉप करना है।”
लेकिन यह नहीं कहा—“अगर टॉप नहीं कर पाए तो भी तुम हमारे लिए उतने ही महत्वपूर्ण रहोगे।”
हमने कहा—“आईआईटी में जाना है।”
लेकिन यह नहीं कहा—“अगर किसी कारण से यह रास्ता तुम्हारे लिए सही नहीं हुआ तो जिंदगी में और भी रास्ते हैं।”
यही सोच बदलनी होगी।
बच्चे को यह विश्वास होना चाहिए कि उसके माता-पिता का प्रेम उसके अंकों पर निर्भर नहीं है। उसे यह भरोसा होना चाहिए कि एक परीक्षा उसके पूरे जीवन का फैसला नहीं करती। उसे यह मालूम होना चाहिए कि कोई एक कॉलेज, कोई एक डिग्री, कोई एक नौकरी और कोई एक परीक्षा जिंदगी का अंतिम सत्य नहीं है।
यहां परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।
माता-पिता को अपने बच्चे की तुलना दूसरे बच्चे से करना बंद करना होगा। “देखो शर्मा जी का बेटा कितना अच्छा कर रहा है”, “तुम्हारे दोस्त के इतने नंबर आए”, “तुमसे तो वह कमजोर था, फिर भी आगे निकल गया”—ऐसे वाक्य कभी-कभी सामान्य बातचीत लग सकते हैं, लेकिन लगातार दोहराए जाने पर बच्चे के मन पर गहरा असर डाल सकते हैं।
बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि घर उसका अंतिम सुरक्षित स्थान है, अदालत नहीं।
इसी प्रकार संस्थानों की जिम्मेदारी भी केवल पाठ्यक्रम पूरा करने और परीक्षा लेने तक सीमित नहीं हो सकती।
एक उत्कृष्ट शिक्षण संस्थान वह नहीं है जहां केवल उत्कृष्ट अंक प्राप्त करने वाले बच्चे सफल हों। उत्कृष्ट संस्थान वह भी है जो कठिनाई में फंसे विद्यार्थी को पहचान सके, उसे संभाल सके और उसे गिरने से पहले सहारा दे सके।
हाल की IIT Bombay घटना के बाद छात्रों ने मानसिक स्वास्थ्य सहायता, छात्र प्रतिनिधित्व और संस्थागत संवेदनशीलता से जुड़े सवाल उठाए हैं। एक रिपोर्ट में छात्रों ने यह भी कहा कि उपलब्ध मानसिक स्वास्थ्य सहायता पर्याप्त नहीं लगती और कुछ छात्रों को सहायता लेते समय निर्णयात्मक व्यवहार का अनुभव होता है। ये आरोप और अनुभव भी गंभीरता से जांचे जाने चाहिए।
हमें ऐसे संस्थानों की जरूरत है जहां काउंसलिंग केवल संकट के बाद न हो, बल्कि संकट से पहले शुरू हो।
हर संस्थान में ऐसे तंत्र होने चाहिए जो यह पहचान सकें कि कौन विद्यार्थी लगातार असफल हो रहा है, कौन अचानक अलग-थलग पड़ रहा है, किसके व्यवहार में असामान्य बदलाव आया है, कौन लगातार कक्षाओं से अनुपस्थित हो रहा है या कौन बार-बार सहायता मांग रहा है। इसका अर्थ निगरानी या नियंत्रण नहीं, बल्कि संवेदनशील शैक्षणिक सहायता है।
शिक्षकों को भी केवल विषय पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि विद्यार्थी के जीवन का एक जिम्मेदार मार्गदर्शक बनना होगा।
एक शिक्षक का एक वाक्य किसी बच्चे को आगे बढ़ा सकता है और एक असंवेदनशील टिप्पणी उसे भीतर तक तोड़ सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि अनुशासन समाप्त कर दिया जाए। परीक्षा में नियमों का उल्लंघन हो तो कार्रवाई आवश्यक है। लेकिन अनुशासन और अपमान में अंतर है; नियम और संवेदनहीनता में अंतर है।
नियम सभी के लिए समान होने चाहिए, लेकिन विद्यार्थी से व्यवहार करते समय संवेदनशीलता भी सभी के लिए समान होनी चाहिए।
अगर कोई विद्यार्थी गलती करता है तो उसे उसकी गलती का परिणाम समझाना चाहिए। लेकिन साथ ही उसे यह भी बताया जाना चाहिए कि गलती उसके जीवन का अंत नहीं है।
यही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए।
हमें यह भी समझना होगा कि आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है। यह असफलता से निकलने का रास्ता नहीं है। एक कठिन परीक्षा, खराब परिणाम, अनुशासनात्मक कार्रवाई, पारिवारिक दबाव, आर्थिक परेशानी या सामाजिक अपमान—इनमें से कोई भी स्थिति जीवन से बड़ी नहीं हो सकती।
जिस क्षण किसी बच्चे को लगता है कि उसके सामने कोई रास्ता नहीं बचा, उसी क्षण समाज को उसके सामने दूसरे रास्ते खोलने चाहिए।
जरूरी नहीं कि हर बच्चा उसी संस्थान में पढ़े। जरूरी नहीं कि हर बच्चा उसी विषय में डिग्री पूरी करे। जरूरी नहीं कि हर विद्यार्थी इंजीनियर, डॉक्टर या प्रशासनिक अधिकारी ही बने। दुनिया बहुत बड़ी है। जीवन में असंख्य क्षेत्र हैं। किसी विद्यार्थी को यदि एक रास्ता कठिन लगता है तो उसके लिए दूसरा रास्ता तलाशना असफलता नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय है।
लेकिन इसके लिए पहले हमें बच्चों को यह विश्वास देना होगा कि रास्ता बदलना जिंदगी छोड़ना नहीं है।
हमें अपनी सफलता की परिभाषा बदलनी होगी।
क्या सफलता केवल 9 CGPA है?
क्या सफलता केवल कैंपस प्लेसमेंट है?
क्या सफलता केवल करोड़ों के पैकेज वाली नौकरी है?
क्या सफलता केवल आईआईटी, आईआईएम या किसी अन्य बड़े संस्थान की डिग्री है?
या सफलता यह भी है कि एक युवा कठिन परिस्थितियों के बावजूद जीवन को चुनता है, संघर्ष करता है, गिरकर उठता है और अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ता है?
इस प्रश्न का उत्तर अब समाज को देना होगा।
सरकार की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। देश के शीर्ष शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं, प्रशिक्षित काउंसलरों, आपातकालीन सहायता और स्वतंत्र शिकायत तंत्र को मजबूत करना होगा। संस्थानों के भीतर ऐसे तंत्र होने चाहिए जहां विद्यार्थी बिना भय और बिना कलंक के अपनी समस्या बता सके। केवल हेल्पलाइन नंबर जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। सहायता ऐसी होनी चाहिए जिस पर विद्यार्थी भरोसा कर सके और जिसे समय पर उपलब्ध कराया जा सके।
और सबसे महत्वपूर्ण बात—मानसिक स्वास्थ्य को कमजोरी समझने की सामाजिक आदत खत्म करनी होगी।
जिस तरह शरीर बीमार पड़ सकता है, उसी तरह मन भी संकट में पड़ सकता है। जिस तरह बुखार होने पर डॉक्टर के पास जाना कमजोरी नहीं है, उसी तरह मानसिक संकट में विशेषज्ञ से सहायता लेना भी कमजोरी नहीं है।
हम अपने बच्चों से यह क्यों नहीं कहते कि—
“तुम थक गए हो तो थोड़ा रुक जाओ।”
“तुम्हें मदद चाहिए तो हम तुम्हारे साथ हैं।”
“एक परीक्षा खराब हो गई तो कोई बात नहीं।”
“तुम्हारा परिणाम तुम्हारी पूरी पहचान नहीं है।”
और सबसे जरूरी—
“तुम्हारी जिंदगी किसी भी डिग्री से ज्यादा कीमती है।”
IIT Bombay की हाल की घटना में जांच एजेंसियां यह तय करेंगी कि वास्तव में क्या हुआ, किन परिस्थितियों में हुआ और किसी व्यक्ति या संस्था की कोई जिम्मेदारी बनती है या नहीं। परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों और संस्थान के पक्ष—दोनों की जांच आवश्यक है। बिना जांच के किसी को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा। लेकिन जांच का परिणाम चाहे जो हो, इस घटना से उठने वाला बड़ा सामाजिक प्रश्न अपनी जगह बना रहता है।
वह प्रश्न है—
क्या हम अपने बच्चों को केवल सफल बनाना चाहते हैं, या उन्हें सुरक्षित, संतुलित और मजबूत इंसान भी बनाना चाहते हैं?
अगर उत्तर दूसरा है तो हमें शिक्षा की पूरी सोच पर पुनर्विचार करना होगा।
बड़े संस्थान देश के गौरव हैं। वहां पढ़ने वाले विद्यार्थी देश की संपत्ति हैं। लेकिन किसी संस्थान की प्रतिष्ठा उसके भवनों, रैंकिंग, प्लेसमेंट पैकेज या प्रवेश परीक्षा की कठिनाई से ही नहीं बनती। उसकी असली प्रतिष्ठा इस बात से भी तय होती है कि वहां पढ़ने वाला एक कमजोर विद्यार्थी कितना सुरक्षित महसूस करता है, एक असफल विद्यार्थी को कितना सम्मान मिलता है और संकट में फंसे विद्यार्थी तक सहायता कितनी जल्दी पहुंचती है।
हमें ऐसे परिसर चाहिए जहां उत्कृष्टता हो, लेकिन भय नहीं।
जहां अनुशासन हो, लेकिन अपमान नहीं।
जहां प्रतिस्पर्धा हो, लेकिन अमानवीय दबाव नहीं।
जहां परीक्षा कठिन हो सकती है, लेकिन जिंदगी को परीक्षा से बड़ा माना जाए।
और जहां हर बच्चे को यह विश्वास हो कि—
“अगर मैं आज हार गया हूं, तो भी मेरी जिंदगी खत्म नहीं हुई है।”
क्योंकि सच यही है—एक परीक्षा खत्म हो सकती है, एक सेमेस्टर खत्म हो सकता है, एक डिग्री छूट सकती है, एक करियर बदला जा सकता है; लेकिन जिंदगी वापस नहीं आती।
इसलिए आज जरूरत केवल आत्महत्या पर शोक मनाने की नहीं है। जरूरत है उस सोच को बदलने की, जो बच्चे को यह विश्वास दिलाती है कि असफलता के बाद उसके लिए कोई जगह नहीं बची।
हमें बच्चों से कहना होगा—
हारो तो वापस आओ।
गिरो तो उठो।
मदद चाहिए तो मांगो।
रास्ता कठिन लगे तो रास्ता बदलो।
लेकिन जिंदगी मत छोड़ो।
क्योंकि कोई भी परीक्षा, कोई भी रैंक, कोई भी डिग्री, कोई भी संस्थान और कोई भी नौकरी—एक युवा जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती।
अब समय है कि माता-पिता, शिक्षक, शिक्षण संस्थान, सरकार और पूरा समाज मिलकर यह सुनिश्चित करे कि देश के किसी भी बच्चे को कभी यह महसूस न हो कि उसके सामने जीवन का कोई रास्ता नहीं बचा है।
बच्चों को केवल प्रतियोगिता के लिए तैयार मत कीजिए। उन्हें जिंदगी के लिए तैयार कीजिए।
यही हमारी शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा है—और इस परीक्षा में हमें केवल अंक नहीं, इंसान बचाने हैं।
Reviewed by PSA Live News
on
8:06:00 am
Rating:

कोई टिप्पणी नहीं: