न्याय के नाम पर कानून का मज़ाक: अदालत से निर्दोष बरी हुई महिला डिटेंशन सेंटर में रही कैद, फिर झेला कस्टोडियल रेप का दंश; हाईकोर्ट ने गृह सचिव को किया तलब
विशेष संपादकीय रिपोर्ट | रांची
झारखंड की न्याय प्रणाली और प्रशासनिक तंत्र के लिए एक अत्यंत शर्मनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला सामने आया है। यह कहानी सिर्फ एक कानूनी लापरवाही की नहीं, बल्कि राज्य के पुलिस और प्रशासनिक अमले की उस असंवेदनशीलता का परिचायक है, जहाँ अदालत द्वारा बेगुनाह साबित कर दी गई एक असहाय महिला को कानून के संरक्षण के बजाय हैवानियत का शिकार होना पड़ा। जिस महिला को न्यायिक आदेश के बाद तुरंत आज़ाद हवा में सांस लेने का अधिकार मिलना चाहिए था, उसे प्रशासनिक हठधर्मिता के चलते अवैध रूप से डिटेंशन सेंटर की सलाखों के पीछे धकेल दिया गया। इतना ही नहीं, उस अवैध हिरासत के दौरान उसके साथ कस्टोडियल रेप (हिरासत में दुष्कर्म) जैसी जघन्य वारदात को अंजाम दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य में कानून के शासन और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।
मामले की जड़ें उस आपराधिक मुकदमे से जुड़ी हैं, जिसमें पीड़िता को संदिग्ध मानकर आरोपी बनाया गया था। वर्षों तक चली लंबी कानूनी लड़ाई और अदालती कार्यवाही के बाद, संबंधित न्यायालय ने मामले के तथ्यों और साक्ष्यों का सूक्ष्मता से अनुशीलन करते हुए महिला को सभी आरोपों से सम्मानपूर्वक बरी कर दिया था। अदालत के इस फैसले के साथ ही कानूनी तौर पर महिला के खिलाफ चल रहे सभी प्रतिबंध समाप्त हो चुके थे और उसे तत्काल प्रभाव से रिहा किया जाना राज्य प्रशासन की संवैधानिक जिम्मेदारी थी। परंतु, न्यायपालिका के स्पष्ट आदेशों की धज्जियाँ उड़ाते हुए पुलिस और प्रशासनिक तंत्र ने उसे स्वतंत्र करने के बजाय एक डिटेंशन सेंटर में भेज दिया। किस कानूनी आधार पर और किस अधिकारी के निर्देश पर एक बरी हो चुकी महिला को डिटेंशन सेंटर में बंद रखा गया, इसका कोई तर्कसंगत या वैधानिक जवाब प्रशासनिक महकमे के पास नहीं है।
अवैध हिरासत का यह सिलसिला केवल बेगुनाह की आज़ादी छीनने तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि डिटेंशन सेंटर की चारदीवारी के भीतर सुरक्षा के दावों की धज्जियाँ उड़ाते हुए पीड़िता को गंभीर मानवाधिकार हनन का सामना करना पड़ा। पीड़िता द्वारा लगाए गए आरोपों के अनुसार, इस अनधिकृत और अवैध कैद के दौरान उसके साथ हिरासत में दुष्कर्म (कस्टोडियल रेप) की घिनौनी वारदात को अंजाम दिया गया। जो डिटेंशन सेंटर राज्य की निगरानी में सुरक्षा का प्रतीक होना चाहिए था, वह उस महिला के लिए यातनागृह बन गया। अदालत से बेगुनाही का प्रमाणपत्र मिलने के बावजूद प्रशासन की अवैध कस्टडी में एक महिला की अस्मत का लुटना यह साबित करता है कि निचले स्तर पर प्रशासनिक निगरानी और कानून व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है।
जब यह दर्दनाक और गंभीर मामला याचिका के माध्यम से झारखंड हाईकोर्ट के समक्ष पहुँचा, तो न्यायालय ने इसे अत्यंत गंभीरता से लिया। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अखिल कुमार की खंडपीठ ने मामले की फाइल पलटते ही राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर कड़ा ऐतराज जताया। खंडपीठ ने नाराजगी व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। जब अदालत किसी व्यक्ति को आपराधिक मामले में बरी कर देती है, तो उसके बाद उसे एक पल के लिए भी कस्टडी में रखना सीधे तौर पर असंवैधानिक और मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है। बरी होने के बाद महिला को किस हैसियत से डिटेंशन सेंटर में रखा गया और इस दौरान उसके साथ हुई दरिंदगी का जिम्मेदार कौन है, इस पर अदालत ने राज्य सरकार से कड़े सवाल किए हैं।
प्रशासनिक शिथिलता और तंत्र की इस गंभीर नाकामी पर नकेल कसते हुए हाईकोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार किया है। खंडपीठ ने स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए झारखंड के गृह सचिव को निर्देश दिया है कि वे 5 अक्टूबर 2026 को अदालत में व्यक्तिगत रूप से हाजिर (सशरीर पेश) हों। गृह सचिव को न केवल अदालत के समक्ष उपस्थित होना होगा, बल्कि उन्हें यह भी हलफनामा दायर कर बताना होगा कि अदालत से बरी महिला को डिटेंशन सेंटर में बंद रखने वाले दोषी अधिकारियों पर अब तक क्या प्रशासनिक और आपराधिक कार्रवाई की गई है। इसके साथ ही, कस्टोडियल रेप के गंभीर आरोपों पर दर्ज प्राथमिकी, जांच की वर्तमान स्थिति और पीड़ित महिला की सुरक्षा व मुआवजा व्यवस्था पर पूरी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
यह पूरा मामला अब झारखंड के प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप का कारण बना हुआ है। 5 अक्टूबर को होने वाली हाईकोर्ट की सुनवाई न केवल इस पीड़िता के लिए न्याय की दिशा तय करेगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि राज्य में अधिकारियों की जवाबदेही किस हद तक तय की जाती है। यह घटना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यदि न्यायपालिका का कड़ा पहरा न हो, तो प्रशासनिक तंत्र किस कदर निरंकुश और संवेदनहीन हो सकता है।
Reviewed by PSA Live News
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8:16:00 pm
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