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विशेष ग्राउंड रिपोर्ट / मानवीय संवेदनशीलता आजादी के 78 साल बाद भी सिर पर छत नसीब नहीं: रांची-सिल्ली के बरवाटोली में जिंदगी और मौत से जूझ रहा मां-बेटे का परिवार, सरकार और सिस्टम बेखबर


विशेष संवाददाता, रांची दस्तक
रांची/सिल्ली: विकास के तमाम दावों और 'सबका साथ-सबका विकास' के नारों की जमीनी हकीकत देखनी हो, तो रांची जिले के सिल्ली विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत ग्राम बरवाटोली चले आइए। आजादी के सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यहां का एक बेबस मां-बेटे का छोटा सा परिवार उस एक बुनियादी हक के लिए तरस रहा है, जिसे संविधान जीवन जीने का अधिकार मानता है—सिर पर एक सुरक्षित छत।

इस परिवार के पास न तो रहने के लिए पक्का मकान है और न ही सिर छिपाने का कोई पक्का सहारा। गरीबी, बीमारी और प्रशासनिक उपेक्षा के तिहरे बोझ तले दबा यह परिवार आज तिनके की तरह जिंदगी गुजारने को मजबूर है।

दातुन बेचकर बुझती है पेट की आग, बीमारी से लाचार है इकलौता बेटा

इस बेबस परिवार की कहानी किसी के भी रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी है। परिवार का पेट पालने की पूरी जिम्मेदारी बुजुर्ग मां के कंधों पर है।

  • मां का संघर्ष: वृद्धावस्था में जहां शरीर को आराम मिलना चाहिए, वहां यह मां अलसुबह जंगलों और आसपास के इलाकों से दातुन तोड़कर लाती है और हाट-बाजारों में बेचती है। दिन भर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद जो चंद रुपये जुटते हैं, उसी से दो वक्त की सूखी रोटी का बंदोबस्त हो पाता है।
  • बेटे की लाचारी: विडंबना यह कि मां का इकलौता बेटा किसी गंभीर और असाध्य बीमारी से ग्रसित है। इलाज तो दूर, उसके लिए दो समय की पौष्टिक खुराक जुटा पाना भी इस परिवार के लिए किसी असंभव सपने जैसा है। बेटा खाट पर पड़ा तड़पता रहता है और मां बेबस आंखों से अपने कलेजे के टुकड़े को तिल-तिल मरता देखने को मजबूर है।

सरकारी योजनाओं की खुली पोल: न आवास मिला, न स्वास्थ्य कार्ड का लाभ

एक तरफ जहां केंद्र और राज्य सरकारें 'प्रधानमंत्री आवास योजना', 'अबुआ आवास योजना' और 'आयुष्मान भारत' जैसी योजनाओं का ढिंढोरा पीटती हैं, वहीं बरवाटोली का यह परिवार आज भी सिस्टम की घोर विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

  1. आवास से वंचित: आजादी के बाद से लेकर आज तक कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन इस परिवार तक एक पीएम या अबुआ आवास की ईंट भी नहीं पहुंच सकी।
  2. इलाज का अभाव: गंभीर बीमारी से जूझ रहे बेटे के इलाज के लिए सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की ओर से अब तक कोई सुध नहीं ली गई है।
  3. जनप्रतिनिधियों का नजरअंदाज: चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले स्थानीय जनसेवक और प्रशासनिक अमला चुनाव जीतते ही इन गरीब बस्तियों और बेबस परिवारों को भूल जाता है।

'रांची दस्तक' की अपील: मुखिया, विधायक और सांसद तत्काल लें संज्ञान

यह महज एक खबर नहीं, बल्कि सोए हुए प्रशासनिक तंत्र और जनप्रतिनिधियों के जमीर को झकझोरने की एक कोशिश है। 'रांची दस्तक' और 'PSA लाइव न्यूज' परिवार स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से पुरजोर मांग करता है:

  • तत्काल वैकल्पिक आवास: बेघर मां-बेटे को इस ढलती ठंड और असुरक्षित माहौल से बचाने के लिए तत्काल प्रभाव से रहने के लिए वैकल्पिक सरकारी या पक्के मकान की व्यवस्था की जाए।
  • समुचित इलाज की व्यवस्था: गंभीर बीमारी से ग्रसित बेटे को अविलंब बड़े अस्पताल में भर्ती कराकर सरकारी खर्च पर बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जाए।
  • आपातकालीन वित्तीय सहायता: परिवार के जीवन यापन के लिए रेडक्रॉस या आपदा राहत कोष से तुरंत आर्थिक मदद और राशन की पक्की व्यवस्था सुनिश्चित हो।

"जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय और बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंचतीं, तब तक विकास के सारे आंकड़े खोखले हैं। सिल्ली के बरवाटोली का यह परिवार आज हमारी व्यवस्था से जवाब मांग रहा है।"


विशेष ग्राउंड रिपोर्ट / मानवीय संवेदनशीलता आजादी के 78 साल बाद भी सिर पर छत नसीब नहीं: रांची-सिल्ली के बरवाटोली में जिंदगी और मौत से जूझ रहा मां-बेटे का परिवार, सरकार और सिस्टम बेखबर विशेष ग्राउंड रिपोर्ट / मानवीय संवेदनशीलता आजादी के 78 साल बाद भी सिर पर छत नसीब नहीं: रांची-सिल्ली के बरवाटोली में जिंदगी और मौत से जूझ रहा मां-बेटे का परिवार, सरकार और सिस्टम बेखबर Reviewed by PSA Live News on 12:27:00 pm Rating: 5

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