भारत में निजी स्वास्थ्य सेवाएँ लंबे
समय तक सरकारी व्यवस्था की कमियों का विकल्प मानी जाती रही हैं। बेहतर सुविधाएँ, आधुनिक तकनीक और
त्वरित इलाज—इन वादों के साथ कॉरपोरेट अस्पतालों ने आम नागरिक का भरोसा
जीता। लेकिन हाल के वर्षों में सामने आ रही अनेक घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि
स्वास्थ्य सेवा और व्यावसायिक हितों के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है।
बेंगलुरु के एक प्रतिष्ठित निजी अस्पताल में घटित एक मामला इस चिंता को और गहरा
करता है।
अभिनव वर्मा की माँ, लगभग 50 वर्ष की, पेट दर्द की शिकायत
के साथ अस्पताल पहुँचीं। प्रारंभिक जाँच के बाद उन्हें गॉल ब्लैडर में पथरी होने
की जानकारी दी गई और एक साधारण ऑपरेशन की सलाह दी गई। कुछ दिनों के भीतर दर्द
दवाओं से नियंत्रित हो गया और स्थिति सामान्य प्रतीत होने लगी। इसके बावजूद
अस्पताल की ओर से संपर्क कर यह कहा गया कि पथरी का बने रहना खतरनाक हो सकता है और
कैंसर की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। भय और अनिश्चितता के बीच आगे की
जाँचों—ERCP, एंडोस्कोपी और बायोप्सी—की सहमति दी गई। इन सभी जाँचों की रिपोर्ट नकारात्मक आई।
नकारात्मक रिपोर्ट के बावजूद उपचार की
दिशा में स्पष्टता नहीं आई। इसके बाद रोगी की हालत अचानक बिगड़ने लगी और गॉल
ब्लैडर ऑपरेशन को स्थगित करते हुए उन्हें ICU
में भर्ती कर दिया गया। भर्ती के समय तक
लिवर, किडनी, हृदय और रक्त संबंधी सभी जाँचें सामान्य थीं। फिर क्रमशः बताया
गया कि लिवर प्रभावित हो रहा है, किडनी फेल हो रही है,
डायलिसिस की आवश्यकता है और अंततः
पेसमेकर लगाया गया। इन जटिलताओं के कारणों पर परिवार को कोई संतोषजनक जानकारी नहीं
दी गई।
लगभग पचास दिनों तक ICU में रहने के दौरान
उपचार की लागत लगातार बढ़ती चली गई। अस्पताल द्वारा प्रस्तुत बिलों के अनुसार, अस्पताल शुल्क लगभग 43 लाख रुपये तक पहुँच
गया, जबकि दवाइयों पर अलग से लगभग 12
लाख रुपये खर्च हुए। उपचार के दौरान
लगभग 50 यूनिट रक्त चढ़ाए जाने की जानकारी दी गई। कई अवसरों पर आगे के
उपचार के लिए तत्काल भुगतान की शर्त रखी गई,
जिससे परिवार पर गहरा आर्थिक और मानसिक
दबाव बना रहा।
मृत्यु के बाद स्थिति और अधिक संवेदनशील
हो गई। शेष भुगतान को लेकर कठोर रवैया अपनाया गया और शव को शवगृह में रखा गया।
परिजनों के अनुसार, अंतिम भुगतान तक सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की गई। शोक की
घड़ी में वित्तीय शर्तों की यह प्राथमिकता निजी स्वास्थ्य सेवाओं की नैतिक
जिम्मेदारियों पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
परिवार द्वारा स्वतंत्र चिकित्सा जाँच
की मांग किए जाने पर जो निष्कर्ष सामने आया,
उसने पूरे उपचार क्रम को संदेह के घेरे
में ला दिया। जांच रिपोर्ट के अनुसार,
रोगी के गॉल ब्लैडर में कभी पथरी थी ही
नहीं। यह निष्कर्ष केवल एक परिवार के साथ हुए संभावित अन्याय का मामला नहीं है, बल्कि उस प्रणाली पर
सवाल उठाता है जिसमें प्रारंभिक निदान से लेकर उपचार तक की प्रक्रिया पारदर्शी
नहीं दिखती।
स्वास्थ्य सेवा ऐसा क्षेत्र है जहाँ
मरीज और डॉक्टर के बीच सूचना का असंतुलन स्वाभाविक रूप से मौजूद रहता है। इसी कारण
यह क्षेत्र सख्त और प्रभावी नियमन की मांग करता है। निजी अस्पतालों के संदर्भ में
भारत में यह नियमन या तो अपर्याप्त है या प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पा रहा है। ICU ऑडिट, अनिवार्य सेकेंड
ओपिनियन और स्वतंत्र मेडिकल समीक्षा बोर्ड जैसी व्यवस्थाएँ अब विकल्प नहीं, आवश्यकता बन चुकी
हैं।
यह लेख किसी एक अस्पताल या चिकित्सक पर
अंतिम निर्णय सुनाने का प्रयास नहीं करता। लेकिन यह अवश्य रेखांकित करता है कि जब
चिकित्सा निर्णयों पर सवाल उठने लगें और जवाबदेही स्पष्ट न हो, तब राज्य की भूमिका
केवल मूक दर्शक बने रहने की नहीं हो सकती। निजी स्वास्थ्य सेवाओं में भरोसे का
संकट केवल व्यक्तिगत त्रासदियों तक सीमित नहीं रहता,
बल्कि यह पूरे समाज को प्रभावित करता
है।
अभिनव वर्मा की माँ की मृत्यु हमें यह
सोचने पर मजबूर करती है कि क्या भारत में इलाज धीरे-धीरे एक ऐसा क्षेत्र बनता जा
रहा है जहाँ असहाय मरीज और उनके परिवार सबसे कमजोर कड़ी हैं। यदि ऐसा है, तो स्वास्थ्य नीति, नियमन और निगरानी पर
गंभीर पुनर्विचार अब टाला नहीं जा सकता।
Reviewed by PSA Live News
on
10:19:00 pm
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