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रांची में ब्रह्माकुमारी केंद्र पर आध्यात्मिक होली संदेश — “योगाग्नि में जलाएं कटु स्मृतियां, ज्ञान के रंग में रंगें आत्मा”


रांची।
फाल्गुन पूर्णिमा के पावन अवसर पर चौधरी बगान, हरमू रोड स्थित प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के स्थानीय सेवा केंद्र में आध्यात्मिक होली मिलन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन ने होली के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि होली जलाने का वास्तविक अर्थ केवल लकड़ियां और उपले जलाना नहीं, बल्कि बीते वर्ष की कटु, तीखी और दुखद स्मृतियों को योगाग्नि में समर्पित कर नववर्ष का स्वागत करना है।

उन्होंने कहा कि सृष्टिकर्ता परमात्मा अत्याचार रूपी हिरण्यकश्यप तथा दुख, अशांति और भय रूपी होलिका के चंगुल से प्रहलाद अर्थात प्रभु-प्रिय संतानों — समस्त आत्माओं — को मुक्त करते हैं। होली का यह पर्व आत्मा की मुक्ति, नवचेतना और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक है। भारत में फाल्गुन पूर्णिमा के साथ वर्ष का समापन होता है और पुराने वर्ष के अंत में इस पर्व का मनाया जाना इस गहन रहस्य की ओर संकेत करता है कि जैसे कलियुग के अंत के बाद सतयुग का सुख-शांति भरा युग आरंभ होता है, वैसे ही आत्मा जब अपने विकारों को त्याग देती है तो उसके जीवन में भी सुख-शांति का नवप्रभात होता है।

निर्मला बहन ने कहा कि वास्तव में योगाग्नि प्रज्ज्वलित करने से ही मन की पुरानी कटु स्मृतियां और दूषित वृत्तियां नष्ट होती हैं। होलिका दहन के दिन गोबर, घास-फूस और लकड़ियों को अग्नि में समर्पित करना प्रतीक है मन की उबड़-खाबड़, दूषित और नकारात्मक प्रवृत्तियों को योगबल से भस्म करने का। गेहूं और जौ की बालियों को भूनने की परंपरा भी इस बात का द्योतक है कि हम अपने पुराने संस्कारों और अवांछित प्रवृत्तियों को जला दें और आत्मा को पवित्र बनाएं।

उन्होंने कहा कि इस संसार रूपी रंगमंच पर दो ही रंग हैं — एक माया का और दूसरा ईश्वर का। हर मनुष्य किसी न किसी रंग में रंगा हुआ है। जो ईश्वरीय ज्ञान और योग के रंग में रंग जाता है, वही सच्चा योगी है; और जो माया के आकर्षण में फंसा रहता है, वह भोगी बन जाता है। अतः अब समय है कि आत्मा रूपी चोली को ज्ञान के रंग से रंगकर परमात्मा से मंगल मिलन मनाया जाए।

आगे अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं को ज्ञान के रंग में रंग लेता है और सच्चा वैष्णव बनता है, वह बैकुंठ के सुखद झूलों पर विराजमान श्रीकृष्ण के दर्शन का आध्यात्मिक अनुभव करता है। उसकी दृष्टि इस कलियुगी संसार से हटकर दिव्यता की ओर केंद्रित हो जाती है और विषय-विकार उसे आकर्षित नहीं कर पाते। उसके लिए होली केवल रंगों और उल्लास का उत्सव नहीं, बल्कि ‘ज्ञान मंथन उत्सव’ बन जाती है।

उन्होंने यह भी कहा कि ज्ञानी मनुष्य केवल स्वयं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अपने संग से दूसरों को भी ज्ञान का रंग चढ़ाता है। आत्मा रूपी चोली को परमात्मा की याद में रंगकर वह मन-मुटाव, द्वेष और अहंकार का त्याग करता है। प्राचीन काल में होली का स्वरूप भी यही था — परमात्मा शिव से ज्ञान प्राप्त कर मनुष्यों ने ज्ञान-पिचकारी से एक-दूसरे को रंगा और सच्चे प्रेम व मंगल मिलन का उत्सव मनाया।

कार्यक्रम के अंत में निर्मला बहन ने आह्वान किया कि हम केवल चंद लकड़ियां और उपले जलाकर होली मनाने की औपचारिकता न निभाएं, बल्कि अपने भीतर छिपे क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और द्वेष जैसे मनोविकारों को योगाग्नि का ईंधन बनाकर उन्हें दग्ध करें। तभी होली का वास्तविक और आध्यात्मिक आनंद प्राप्त किया जा सकता है।

ज्ञातव्य हो कि चौधरी बगान, हरमू रोड स्थित ब्रह्माकुमारी केंद्र में प्रतिदिन निशुल्क राजयोग ध्यान एवं आध्यात्मिक ज्ञान सत्र आयोजित किए जाते हैं, जिसमें आमजन भाग लेकर अपने जीवन को सकारात्मक दिशा दे सकते हैं।

रांची में ब्रह्माकुमारी केंद्र पर आध्यात्मिक होली संदेश — “योगाग्नि में जलाएं कटु स्मृतियां, ज्ञान के रंग में रंगें आत्मा” रांची में ब्रह्माकुमारी केंद्र पर आध्यात्मिक होली संदेश — “योगाग्नि में जलाएं कटु स्मृतियां, ज्ञान के रंग में रंगें आत्मा” Reviewed by PSA Live News on 5:45:00 pm Rating: 5

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