रामगढ़ में प्रसूता की मौत: क्या ऑपरेशन के NOC से खत्म हो जाती है डॉक्टर की जिम्मेदारी? मरीज अधिकारों पर बड़ा सवाल
रामगढ़। झारखंड के रामगढ़ जिले से एक हृदयविदारक और गंभीर मामला सामने आया है, जिसने न सिर्फ एक परिवार को असहनीय पीड़ा दी है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की जवाबदेही पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। कुज्जू निवासी श्री शम्भु लाल ठाकुर की सुपुत्री दीपिका कुमारी की 2 मार्च 2026 को हुई मृत्यु ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ऑपरेशन से पहले लिया गया NOC (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट) डॉक्टर और अस्पताल प्रबंधन को हर जिम्मेदारी से मुक्त कर देता है?
क्या NOC का मतलब जिम्मेदारी से मुक्ति है?
अक्सर ऑपरेशन से पहले अस्पताल प्रबंधन परिजनों से एक सहमति पत्र या NOC पर हस्ताक्षर करवाता है, जिसमें संभावित जोखिमों का उल्लेख होता है। लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि इलाज में लापरवाही होने पर भी डॉक्टर या अस्पताल जवाबदेह नहीं होंगे?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, NOC केवल संभावित जटिलताओं के प्रति पूर्व सूचना है, यह किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय लापरवाही (Medical Negligence) को वैध नहीं ठहराता। यदि इलाज में गंभीर चूक, देरी, संसाधनों की कमी या गलत निर्णय सामने आता है, तो संबंधित चिकित्सक और अस्पताल प्रबंधन की जवाबदेही बनती है।
क्या है पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, दीपिका कुमारी को 2 मार्च 2026 को रामगढ़ स्थित रांची रोड के एक निजी अस्पताल — पल्स अस्पताल — में भर्ती कराया गया। अस्पताल की संचालक डॉ. ममता रंजन बताई जाती हैं। परिजनों के अनुसार, शुरुआत में नॉर्मल डिलीवरी का भरोसा दिया गया। मरीज पूरी तरह स्वस्थ थी, अस्पताल परिसर में परिजनों से हँस-बोल रही थी और लगभग एक घंटे तक टहलती भी रही।
बाद में अचानक बड़े ऑपरेशन (सी-सेक्शन) का निर्णय लिया गया, जिसके बाद पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। परिजनों का आरोप है कि ऑपरेशन के लगभग चार घंटे बाद अचानक मरीज और नवजात की स्थिति गंभीर बताई गई और रांची रेफर करने की बात कही गई।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि इस दौरान अस्पताल प्रबंधन ने परिजनों को समय रहते मरीज की स्थिति की गंभीरता से अवगत नहीं कराया। तत्पश्चात बिना पर्याप्त मेडिकल स्टाफ के एक साधारण एम्बुलेंस से रांची के Medica Superspecialty Hospital भेजा गया। वहां भर्ती के लगभग दो घंटे बाद दीपिका कुमारी की मृत्यु हो गई।
बताया जा रहा है कि वहां के चिकित्सकों ने मौखिक रूप से कहा कि यदि मरीज को कुछ देर पहले लाया जाता तो शायद जान बचाई जा सकती थी। यदि यह कथन सत्य है, तो यह और भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
उठते सवाल
यदि मरीज की स्थिति ऑपरेशन के बाद बिगड़ रही थी, तो तत्काल रेफर क्यों नहीं किया गया?
यदि अस्पताल के पास जटिल स्थिति संभालने की पर्याप्त सुविधा नहीं थी, तो ऑपरेशन का निर्णय क्यों लिया गया?
नॉर्मल डिलीवरी का भरोसा देने के बाद अचानक सर्जरी का निर्णय किन आधारों पर हुआ?
क्या एम्बुलेंस में प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ और आवश्यक उपकरण मौजूद थे?
नवजात शिशु की गंभीर स्थिति की जिम्मेदारी किसकी है?
मरीज अधिकार बनाम मेडिकल प्रोटेक्शन
देश में डॉक्टरों और अस्पतालों की सुरक्षा के लिए मेडिकल प्रोटेक्शन एक्ट जैसी व्यवस्थाएं हैं, ताकि हिंसा और अनावश्यक दबाव से उन्हें बचाया जा सके। लेकिन क्या मरीजों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी समान रूप से मजबूत कानून नहीं होना चाहिए?
एक “पेशेंट प्रोटेक्शन एक्ट” की मांग अब और तेज होती दिख रही है, जिसमें स्पष्ट प्रावधान हों—
इलाज में लापरवाही पर कठोर दंड
रेफरल में देरी पर जवाबदेही
गंभीर मामलों में लाइसेंस निलंबन या रद्द करने की प्रक्रिया
मरीज और परिजनों को पारदर्शी सूचना देने की अनिवार्यता
चिकित्सा सेवा एक पवित्र पेशा है, लेकिन जब इसमें व्यवसायिक लालच, संसाधनों की कमी या प्रबंधन की विफलता जुड़ जाती है, तो परिणाम जानलेवा हो सकते हैं।
प्रशासन से कार्रवाई की मांग
परिजनों और स्थानीय लोगों ने झारखंड सरकार के स्वास्थ्य विभाग, मुख्यमंत्री, उपायुक्त रामगढ़ तथा सिविल सर्जन से मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। साथ ही, भारतीय चिकित्सा परिषद (MCI) से संबंधित डॉक्टर के लाइसेंस की समीक्षा और आवश्यक होने पर रद्द करने की भी मांग उठ रही है।
यह आवश्यक है कि—
पूरे ऑपरेशन और पोस्ट-ऑपरेटिव प्रबंधन की मेडिकल ऑडिट हो
एम्बुलेंस और रेफरल प्रक्रिया की जांच हो
अस्पताल की लाइसेंसिंग और संसाधनों की स्थिति की समीक्षा की जाए
यदि लापरवाही सिद्ध होती है, तो कानून की सुसंगत धाराओं के तहत कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
एक परिवार का असहनीय दर्द
दीपिका कुमारी अब इस दुनिया में नहीं हैं। एक नवजात शिशु जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है। एक परिवार ने बेटी खो दी, एक शिशु ने जन्म के साथ ही मां का साया खो दिया।
हमारी गहरी संवेदनाएं शोकाकुल परिवार के साथ हैं। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और परिजनों को इस असहनीय दुख को सहने की शक्ति दें।
लेकिन संवेदना के साथ-साथ जवाबदेही भी जरूरी है।
क्योंकि सवाल केवल एक परिवार का नहीं है — यह हर उस मरीज का सवाल है, जो अस्पताल की चौखट पर भरोसा लेकर जाता है।
Reviewed by PSA Live News
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5:30:00 pm
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