क्या बाढ़ पीड़ितों की आवाज़ को गोलियों से खामोश कर दिया गया, या फिर यह कानून के दायरे में हुई कार्रवाई थी?
बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर प्रखंड स्थित बिलोटी गांव में 17 जून 2026 को हुई भरत भूषण तिवारी की मौत अब केवल एक पुलिस मुठभेड़ का मामला नहीं रह गई है। यह घटना कानून, प्रशासन, लोकतंत्र, मानवाधिकार और समाज के उन उपेक्षित वर्गों के बीच खड़े एक बड़े प्रश्नचिह्न में बदल चुकी है, जिनकी आवाज़ अक्सर सत्ता और व्यवस्था के गलियारों तक पहुंचने से पहले ही दब जाती है। एक ओर पुलिस और प्रशासन इस कार्रवाई को आवश्यक बताते हैं, वहीं दूसरी ओर बाढ़ प्रभावित ग्रामीण, महिलाएं, बच्चे और स्थानीय लोग भरत तिवारी को अपना मसीहा, संरक्षक और अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाला व्यक्ति मानते हैं। यही विरोधाभास इस पूरे प्रकरण को और अधिक संवेदनशील तथा गंभीर बना देता है।
ग्रामीणों की आंखोंदेखी कहानी प्रशासनिक दावों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है। बिलोटी गांव के विस्थापितों का दावा है कि जिस समय पुलिस पहुंची, उस समय भरत तिवारी उनके बीच मौजूद थे और बाढ़ पीड़ितों की समस्याओं को लेकर चर्चा कर रहे थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार भरत तिवारी के हाथ में एक पिस्टल और मोबाइल फोन था, लेकिन उन्होंने पुलिस पर अंधाधुंध फायरिंग नहीं की। ग्रामीणों का कहना है कि पुलिस की ओर से 20 से अधिक गोलियां चलाई गईं, जबकि भरत तिवारी ने केवल तीन फायर किए, जिनमें दो जमीन की ओर और एक हवा में था। सबसे महत्वपूर्ण आरोप यह है कि बाद में उन्होंने हथियार फेंककर आत्मसमर्पण कर दिया था। इसके बावजूद पुलिसकर्मियों ने उन्हें पकड़कर कुछ दूरी पर ले जाकर गोली मार दी। यदि यह दावा सत्य है तो यह केवल एक व्यक्ति की मौत का मामला नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की आत्मा पर चोट का विषय बन जाता है।
इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल पोस्टमार्टम रिपोर्ट को लेकर खड़ा हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने अपनी आंखों से केवल तीन गोलियां लगते देखीं, जबकि चिकित्सकीय रिपोर्ट में पांच गोलियां लगने की बात कही जा रही है। ऐसे में लोगों के मन में यह संदेह स्वाभाविक रूप से जन्म ले रहा है कि बाकी दो गोलियां कब और कैसे लगीं। यह संदेह तब और गहरा हो जाता है जब प्रत्यक्षदर्शी महिलाएं और बच्चे यह दावा करते हैं कि पुलिस ने उन्हें भरत तिवारी के पास जाने से रोक दिया था और डराया-धमकाया भी था। यदि घटनाक्रम में किसी प्रकार की विसंगति है तो उसकी निष्पक्ष जांच लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी बन जाती है।
भरत तिवारी की छवि को लेकर भी समाज दो हिस्सों में बंटा दिखाई देता है। प्रशासन यदि उन्हें कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती के रूप में प्रस्तुत करता है तो दूसरी ओर बाढ़ पीड़ित उन्हें अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाला योद्धा मानते हैं। बारह वर्षीय अंकुर कुमार जैसे बच्चों की बातें इस मामले को केवल कानूनी नहीं बल्कि मानवीय आयाम भी देती हैं। बच्चे बताते हैं कि भरत तिवारी अक्सर उनके बीच आते थे, चापाकलों की स्थिति देखते थे, बिजली-पानी की समस्याओं को अधिकारियों तक पहुंचाते थे और उनके लिए स्कूल खुलवाने की बात करते थे। ग्रामीणों के अनुसार वे उन लोगों की आवाज बने हुए थे, जिन्हें व्यवस्था ने वर्षों से अनदेखा कर रखा था। यही कारण है कि उनकी मृत्यु के बाद ग्रामीणों की आंखों में केवल आंसू ही नहीं, बल्कि गुस्सा और असुरक्षा की भावना भी दिखाई दे रही है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू बिहार में बाढ़ और विस्थापन की पुरानी समस्या भी है। गंगा कटाव और बाढ़ के कारण हजारों परिवार वर्षों से अपने घर-बार खोते रहे हैं। पुनर्वास की सरकारी योजनाओं के बावजूद अनेक परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। जिन लोगों को पुनर्वासित किया गया, उनमें से कई का आरोप है कि उन्हें ऐसी जगह बसाया गया जहां थोड़ी सी बारिश में पानी भर जाता है। बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव आज भी उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई है। ऐसे हालात में यदि कोई व्यक्ति उनकी समस्याओं को लेकर अधिकारियों के पास जाता है, ज्ञापन देता है और लगातार दबाव बनाता है, तो स्वाभाविक रूप से वह लोगों के बीच लोकप्रिय हो जाता है। भरत तिवारी के साथ भी शायद यही हुआ।
लोकतंत्र में असहमति और विरोध को हमेशा सम्मान मिलना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति सरकार या प्रशासन से सवाल पूछता है, तो उसे अपराधी की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने, विरोध दर्ज करने और न्याय मांगने का अधिकार देता है। यदि भरत तिवारी वास्तव में केवल बाढ़ पीड़ितों की समस्याओं को लेकर संघर्ष कर रहे थे, तो उनकी मौत एक गंभीर सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न बन जाती है। वहीं यदि उनके खिलाफ कोई गंभीर आपराधिक तथ्य मौजूद थे, तो उन्हें अदालत में प्रस्तुत कर न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से सजा दिलाई जानी चाहिए थी। किसी भी सभ्य लोकतंत्र में न्याय का अधिकार अदालत के पास होता है, न कि बंदूक के ट्रिगर पर उंगली रखने वाले व्यक्ति के पास।
देश में बढ़ती एनकाउंटर संस्कृति पर भी यह घटना नए सिरे से बहस छेड़ती है। अपराध नियंत्रण और कानून व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का दायित्व है, लेकिन कानून के शासन की मूल भावना यह है कि हर आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई का अवसर मिले। यदि पुलिस ही जांचकर्ता, अभियोजक और न्यायाधीश बन जाए तो फिर न्यायपालिका की भूमिका कमजोर पड़ जाती है। यही कारण है कि किसी भी मुठभेड़ के बाद स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग उठती है। भरत तिवारी प्रकरण में भी यही अपेक्षा की जा रही है कि सच्चाई चाहे जो हो, वह तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर जनता के सामने आए।
इस मामले में न्यायिक जांच की मांग केवल विपक्ष या सामाजिक संगठनों की मांग नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास को बनाए रखने की आवश्यकता भी है। घटनास्थल की फोरेंसिक जांच, बैलिस्टिक रिपोर्ट, पोस्टमार्टम की विस्तृत जानकारी, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और पुलिसकर्मियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच ही यह तय कर सकती है कि वास्तव में उस दिन बिलोटी गांव में क्या हुआ था। यदि पुलिस की कार्रवाई उचित थी तो जांच उसे प्रमाणित करेगी, और यदि कहीं नियमों का उल्लंघन हुआ है तो दोषियों को जवाबदेह ठहराना होगा।
आज भरत भूषण तिवारी इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी मौत ने कई ऐसे सवाल छोड़ दिए हैं जो आने वाले समय में बिहार की राजनीति, प्रशासनिक व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया के सामने खड़े रहेंगे। यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि उस भरोसे की परीक्षा है जो आम नागरिक लोकतंत्र और कानून पर करता है। जब तक इस घटना की पूरी सच्चाई सामने नहीं आती, तब तक यह प्रश्न बार-बार उठता रहेगा कि क्या यह वास्तव में एक वैध पुलिस कार्रवाई थी, या फिर उन आवाजों में से एक आवाज को हमेशा के लिए खामोश कर दिया गया जो व्यवस्था से जवाब मांग रही थी।
लेखक : अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक, रांची दस्तक एवं PSA Live News
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
सामाजिक-राजनीतिक विषयों, जनसरोकार, मानवाधिकार, राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक व्यवस्था एवं ग्रामीण विकास से जुड़े मुद्दों पर स्वतंत्र विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार। समाज के वंचित, पीड़ित और उपेक्षित वर्गों की आवाज़ को मुख्यधारा तक पहुंचाने के लिए निरंतर सक्रिय।
Reviewed by PSA Live News
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10:48:00 pm
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