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अंधे प्रेम की सज़ा: जब मोह सत्य को निगल जाता है


मानव जीवन में प्रेम सबसे पवित्र और सबसे शक्तिशाली भावनाओं में से एक माना जाता है। माता-पिता का अपने बच्चों के प्रति प्रेम, पति-पत्नी का समर्पण, भाई-बहनों का स्नेह और परिवार के प्रति त्याग ही समाज की बुनियाद बनाते हैं। लेकिन इतिहास और धर्मग्रंथ हमें यह भी सिखाते हैं कि हर भावना की एक मर्यादा होती है। जब प्रेम विवेक खो देता है, जब स्नेह न्याय से बड़ा हो जाता है और जब अपनेपन के कारण व्यक्ति सत्य से आंखें मूंद लेता है, तब वही प्रेम विनाश का कारण बन जाता है। महाभारत की गांधारी की कथा इसी शाश्वत सत्य को उजागर करती है।

महाभारत केवल राजसिंहासन के लिए लड़ा गया युद्ध नहीं था। वह मनुष्य की महत्वाकांक्षाओं, कमजोरियों, नैतिक संघर्षों और निर्णयों के परिणामों का महाग्रंथ है। इस महागाथा में गांधारी का चरित्र त्याग, समर्पण और मातृत्व का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने अपने नेत्रहीन पति धृतराष्ट्र के प्रति समर्पण व्यक्त करने के लिए स्वयं अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी। सदियों से इस निर्णय को आदर्श पत्नी के त्याग के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन यदि इस घटना का गहराई से विश्लेषण किया जाए तो एक दूसरा पक्ष भी सामने आता है।

प्रश्न यह है कि क्या गांधारी ने केवल अपनी आंखों पर पट्टी बांधी थी, या उन्होंने अपने पुत्रों के दोषों और अपराधों को भी देखने से इंकार कर दिया था?

महाभारत में दुर्योधन के अन्याय, अहंकार और अधर्म के अनेक प्रसंग हैं। वह अपने भाइयों के अधिकार छीनना चाहता था, छल-कपट का सहारा लेता था और यहां तक कि द्रौपदी के अपमान जैसी घृणित घटना का भी समर्थक बना। इन सबके बावजूद उसे परिवार के भीतर से वैसा विरोध नहीं मिला जैसा मिलना चाहिए था। यही वह चुप्पी थी जिसने एक व्यक्ति की गलती को पूरे राष्ट्र के विनाश में बदल दिया।

युद्ध समाप्त हुआ। कुरुक्षेत्र की धरती लाखों शवों से पट गई। हस्तिनापुर के राजमहल में मातम पसरा था। गांधारी के सौ पुत्र मारे जा चुके थे। एक मां के लिए इससे बड़ा दुःख क्या हो सकता है? किंतु इतिहास का सबसे कठोर सत्य यही है कि केवल दुःख किसी को निर्दोष नहीं बना देता। पुत्रों की मृत्यु पर शोक स्वाभाविक था, लेकिन यह भी उतना ही सत्य था कि उनके अपराधों को समय रहते न रोक पाने की जिम्मेदारी भी कहीं न कहीं परिवार और अभिभावकों की थी।

आज के समाज में भी यही स्थिति दिखाई देती है। जब कोई बच्चा स्कूल में अनुशासनहीनता करता है तो कई माता-पिता शिक्षक को ही दोषी ठहराते हैं। जब कोई युवा अपराध करता है तो परिवार उसकी गलती स्वीकार करने के बजाय उसे बचाने में जुट जाता है। जब कोई प्रभावशाली व्यक्ति कानून तोड़ता है तो उसके समर्थक उसके अपराध को उचित ठहराने लगते हैं। यह अंधा समर्थन उस व्यक्ति को नहीं बचाता, बल्कि उसे और अधिक गलत रास्ते पर धकेल देता है।

अक्सर माता-पिता यह समझ बैठते हैं कि अपने बच्चों की हर गलती को छिपाना ही प्रेम है। वे यह नहीं समझते कि गलतियों पर पर्दा डालना वास्तव में प्रेम नहीं, बल्कि भविष्य के विनाश की तैयारी है। जिस बच्चे को कभी अपनी गलती का परिणाम नहीं भुगतना पड़ता, वह धीरे-धीरे यह मानने लगता है कि उसके लिए नियम अलग हैं। वह यह सोचने लगता है कि परिवार हर परिस्थिति में उसे बचा लेगा। यही सोच आगे चलकर अहंकार, गैर-जिम्मेदारी और अपराध को जन्म देती है।

महाभारत का संदेश केवल परिवारों तक सीमित नहीं है। यह राजनीति, प्रशासन और समाज पर भी उतना ही लागू होता है। जब राजनीतिक दल अपने नेताओं के भ्रष्टाचार पर पर्दा डालते हैं, जब अधिकारी अपने अधीनस्थों की गलतियों को छिपाते हैं, जब संस्थाएं अपने लोगों को बचाने के लिए सत्य को दबा देती हैं, तब परिणाम वही होता है जो हस्तिनापुर में हुआ था। धीरे-धीरे व्यवस्था कमजोर होती है, न्याय का विश्वास टूटता है और अंततः पूरा समाज इसकी कीमत चुकाता है।

आज दुनिया में परिवारवाद, भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और अंधभक्ति जैसी समस्याओं की जड़ भी यही मानसिकता है। लोग व्यक्ति के प्रति इतने वफादार हो जाते हैं कि सिद्धांतों को भूल जाते हैं। रिश्ते इतने बड़े हो जाते हैं कि सत्य छोटा पड़ जाता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जहां सत्य हारता है, वहां अंततः समाज भी हारता है।

गांधारी की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि त्याग और जिम्मेदारी एक जैसी चीजें नहीं हैं। आंखों पर पट्टी बांध लेना त्याग हो सकता है, लेकिन आंखें खोलकर सत्य को स्वीकार करना जिम्मेदारी है। समाज को केवल त्याग की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने वाले लोगों की आवश्यकता होती है। माता-पिता का कर्तव्य केवल बच्चों को प्यार देना नहीं है, बल्कि उन्हें सही और गलत का अंतर सिखाना भी है। यदि आवश्यक हो तो उन्हें रोकना, टोकना और अनुशासित करना भी प्रेम का ही एक रूप है।

वास्तविक प्रेम वह नहीं है जो हर परिस्थिति में समर्थन करे। वास्तविक प्रेम वह है जो गलत रास्ते पर जाने से रोके। जो प्रिय व्यक्ति को सच बताने का साहस रखे। जो रिश्तों की रक्षा के लिए सत्य का बलिदान न करे। जिस प्रेम में अनुशासन नहीं, वह मोह है। जिस स्नेह में न्याय नहीं, वह कमजोरी है। और जिस अपनत्व में सत्य नहीं, वह अंततः विनाश का कारण बनता है।

आज प्रत्येक माता-पिता, शिक्षक, नेता और नागरिक को गांधारी की कथा से सीख लेने की आवश्यकता है। हमें यह समझना होगा कि किसी की गलती को छिपाकर हम उसका भला नहीं करते, बल्कि उसके भविष्य को खतरे में डालते हैं। गलतियों को स्वीकार करना, सुधारना और समय रहते रोकना ही सच्चा प्रेम है।

महाभारत का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अधर्म का साथ देने वाला व्यक्ति भी उतना ही दोषी होता है जितना अधर्म करने वाला। इसलिए यदि हम अपने परिवार, समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाना चाहते हैं तो हमें अंधे प्रेम से ऊपर उठकर सत्य और न्याय का साथ देना होगा।

क्योंकि इतिहास बार-बार यह साबित करता है कि अपराधी से अधिक खतरनाक वह व्यक्ति होता है जो अपराध को देखकर भी चुप रहता है।

गांधारी की त्रासदी केवल सौ पुत्रों को खोने की कहानी नहीं है। वह उस अंधे प्रेम की कहानी है जिसने सत्य को देखने से इंकार कर दिया। और जब सत्य को देखने से इंकार किया जाता है, तब विनाश केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का होता है।


लेखक का परिचय

अशोक कुमार झा देश के वरिष्ठ पत्रकारों, चिंतकों और सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषकों में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। वे "रांची दस्तक" एवं "PSA Live News" के प्रधान संपादक हैं। तीन दशकों से अधिक समय से सक्रिय पत्रकारिता जीवन में उन्होंने राजनीति, समाज, संस्कृति, लोकतंत्र, प्रशासनिक जवाबदेही, राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर गहन अध्ययनपरक लेखन किया है। उनकी लेखनी तथ्यों की दृढ़ता, सामाजिक संवेदनशीलता और निष्पक्ष विश्लेषण के लिए जानी जाती है।

वे मानते हैं कि "पत्रकारिता केवल समाचार देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा दिखाने और लोकतंत्र को मजबूत बनाने का नैतिक दायित्व भी है।" उनके लेखों का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठकों को सोचने, समझने और आत्ममंथन के लिए प्रेरित करना है।

अंधे प्रेम की सज़ा: जब मोह सत्य को निगल जाता है अंधे प्रेम की सज़ा: जब मोह सत्य को निगल जाता है Reviewed by PSA Live News on 10:35:00 pm Rating: 5

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