देश के इतिहास में अनेक ऐसे प्रसंग दर्ज हैं जिन्होंने समाज को झकझोर कर रख दिया। कुछ घटनाएँ इसलिए याद रखी जाती हैं क्योंकि उन्होंने व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया, तो कुछ इसलिए कि उन्होंने लोगों को अपने समय, समाज और शासन व्यवस्था पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया। हाल के दिनों में भरत तिवारी से जुड़ा प्रकरण भी एक ऐसी ही घटना बनकर उभरा है, जिस पर अलग-अलग वर्गों के बीच तीखी बहस जारी है। किसी ने उन्हें व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाने वाला व्यक्ति माना, तो किसी ने कानून के दायरे से बाहर जाने वाला। सोशल मीडिया पर वायरल हुए उनके अंतिम वीडियो और उनमें व्यक्त विचारों ने लाखों लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। यही कारण है कि यह घटना केवल एक पुलिस कार्रवाई या एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि यह समाज, व्यवस्था, न्याय, लोकतंत्र और जनभावनाओं पर गंभीर चर्चा का विषय बन गई।
भरत तिवारी के वीडियो में कई ऐसे वाक्य सुनाई देते हैं जो लोगों को सोचने के लिए विवश करते हैं। वे व्यवस्था, समाज और देश की बात करते हुए स्वयं को एक बड़े संघर्ष का हिस्सा बताते हैं। यही कारण है कि अनेक लोग उनके शब्दों और उनके आत्मविश्वास पर चर्चा कर रहे हैं। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक समाज में केवल भावनाओं के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित नहीं माना जा सकता। विचारों का मूल्यांकन उनके तर्क, उनके उद्देश्य और समाज पर उनके प्रभाव के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल उस क्षण की भावनात्मक तीव्रता के आधार पर।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि किसी भी घटना के सामने आते ही समाज का एक वर्ग सबसे पहले व्यक्ति की जाति, समुदाय या पहचान तलाशने लगता है। यदि किसी के विचारों की स्वीकार्यता या अस्वीकृति उसकी जाति देखकर तय की जाएगी, तो यह लोकतांत्रिक चेतना के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी। विचार किसी जाति की बपौती नहीं होते और न ही देशभक्ति, साहस, ईमानदारी, त्याग या संघर्ष किसी एक समाज की निजी संपत्ति हो सकते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि देश के निर्माण में हर जाति, हर वर्ग, हर क्षेत्र और हर समुदाय के लोगों ने अपना योगदान दिया है। इसलिए किसी भी व्यक्ति के कथन या विचार को उसकी जातीय पहचान से जोड़कर देखना समाज को और अधिक विभाजित करने का काम करता है।
इसी प्रकार, किसी व्यक्ति को केवल उसकी जाति के आधार पर महान घोषित करना या केवल उसकी जाति के कारण अस्वीकार कर देना—दोनों ही दृष्टिकोण समान रूप से हानिकारक हैं। यदि हम वास्तव में एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें विचारों की कसौटी पर खरा उतरना सीखना होगा। लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति के विचारों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन विचारों का मूल्यांकन जातीय चश्मे से करना सामाजिक समरसता के लिए घातक है।
आज आवश्यकता इस बात की भी है कि युवाओं के सामने संघर्ष और परिवर्तन की सही दिशा प्रस्तुत की जाए। इतिहास में भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, खुदीराम बोस, अशफाक उल्ला खाँ, वीर कुंवर सिंह, बिरसा मुंडा और असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों ने अद्वितीय साहस और बलिदान का परिचय दिया। लेकिन उनके संघर्ष का संदर्भ विदेशी औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता का आंदोलन था। आज का भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहाँ परिवर्तन के लिए संविधान, न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया, चुनाव, जनआंदोलन और शांतिपूर्ण नागरिक भागीदारी जैसे वैधानिक माध्यम उपलब्ध हैं। इसलिए आज के समय में युवाओं को प्रेरित करने का अर्थ उन्हें कानून और संविधान के दायरे में रहकर समाज परिवर्तन का मार्ग दिखाना होना चाहिए।
यह भी सच है कि व्यवस्था की आलोचना लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है। यदि जनता को कहीं भ्रष्टाचार, अन्याय, भेदभाव, प्रशासनिक विफलता या सत्ता के दुरुपयोग का अनुभव होता है, तो उसके विरुद्ध आवाज़ उठाना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। किंतु लोकतंत्र की शक्ति इसी में है कि संघर्ष का रास्ता कानून, संवाद, जनमत और संवैधानिक संस्थाओं से होकर निकले। जब बहस विचारों से हटकर टकराव और हिंसा की ओर बढ़ती है, तो सबसे अधिक नुकसान आम नागरिक और समाज को ही उठाना पड़ता है।
सोशल मीडिया के इस दौर में किसी भी घटना का केवल एक पक्ष देखकर अंतिम निष्कर्ष निकाल लेना भी उचित नहीं है। एक वायरल वीडियो पूरी घटना का स्थानापन्न नहीं हो सकता। किसी भी प्रकरण का मूल्यांकन तथ्यों, निष्पक्ष जाँच, न्यायिक प्रक्रिया और प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए। भावनाएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन न्याय केवल भावनाओं के आधार पर नहीं चलता। इसलिए समाज का दायित्व है कि वह संयम बनाए रखे, अफवाहों से बचे और सत्य के सामने आने की प्रतीक्षा करे।
आज सबसे अधिक आवश्यकता समाज में वैचारिक परिपक्वता विकसित करने की है। यदि कोई व्यक्ति व्यवस्था की कमियों की ओर ध्यान आकर्षित करता है, तो उन मुद्दों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। यदि कहीं प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता है, तो उस पर विमर्श होना चाहिए। यदि युवाओं में असंतोष है, तो उसके कारणों को समझा जाना चाहिए। लेकिन किसी भी बहस का आधार तर्क, तथ्य और संविधान होना चाहिए, न कि जातीय पहचान, भावनात्मक ध्रुवीकरण या अंध समर्थन।
भरत तिवारी प्रकरण ने एक बार फिर यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा कर दिया है कि क्या हम विचारों पर बहस करने वाला समाज बन रहे हैं या व्यक्तियों की पूजा और विरोध में बँटता हुआ समाज? क्या हम किसी की बात सुनने से पहले उसका तर्क देखते हैं या उसकी जाति? क्या हम व्यवस्था में सुधार चाहते हैं या केवल अपने-अपने पक्ष के समर्थन में खड़े रहना चाहते हैं? इन प्रश्नों का उत्तर केवल इस एक घटना के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
यदि इस पूरे घटनाक्रम से कोई सबसे बड़ी सीख निकलती है, तो वह यही है कि देश और समाज का भविष्य विचारों की गुणवत्ता, संवैधानिक मूल्यों के सम्मान, सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक संवाद पर निर्भर करेगा। किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके विचारों, चरित्र और समाज के प्रति योगदान से होना चाहिए, न कि उसकी जातीय पहचान से। जिस दिन हम यह अंतर समझ लेंगे, उसी दिन हम एक अधिक परिपक्व, न्यायपूर्ण और समरस समाज की दिशा में वास्तविक कदम बढ़ा सकेंगे।
लेखक परिचय:
अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक, रांची दस्तक (हिंदी साप्ताहिक) एवं PSA Live News।
सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन करने वाले वरिष्ठ पत्रकार एवं स्वतंत्र विश्लेषक। लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक समरसता, सुशासन और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर उनकी विशेष रुचि है।
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