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गालियों से नहीं, संवाद से मजबूत होगा लोकतंत्र : युवा आक्रोश, राजनीतिक मर्यादा और राष्ट्र निर्माण की नई चुनौती


लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता, सहिष्णुता और संवाद की संस्कृति होती है। जहां विचारों में मतभेद होते हैं, वहीं लोकतंत्र जीवंत रहता है। लेकिन जब विचारों का स्थान कटुता, तर्क का स्थान गाली-गलौज और असहमति का स्थान व्यक्तिगत अपमान ले लेता है, तब लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है। पिछले दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन और उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इंस्टाग्राम लाइव के माध्यम से दिया गया संदेश केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र, सामाजिक संस्कृति और युवा पीढ़ी के सामने खड़े गंभीर प्रश्नों को उजागर करता है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में उन युवाओं को माफ करने की बात कही, जिन्होंने प्रदर्शन के दौरान उनके और उनकी दिवंगत माता के लिए कथित रूप से अभद्र भाषा का प्रयोग किया था। उन्होंने समाज से भी आग्रह किया कि ऐसे युवाओं को दंडित करने की मानसिकता के बजाय उन्हें सही दिशा दिखाने का प्रयास किया जाए। उनका यह संदेश देशभर में चर्चा का विषय बन गया। किसी ने इसे बड़े दिल का परिचय बताया, तो किसी ने इसे राजनीतिक संदेश माना। किंतु इन प्रतिक्रियाओं से इतर सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर हमारा लोकतांत्रिक विमर्श किस दिशा में जा रहा है?

लोकतंत्र में विरोध करना नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। सरकार की नीतियों का विरोध, निर्णयों पर सवाल और जनहित से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया हैं। इतिहास गवाह है कि भारत में अनेक बड़े परिवर्तन शांतिपूर्ण जनआंदोलनों के माध्यम से हुए हैं। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों तक जनता ने अपनी आवाज बुलंद की और सत्ता को जवाबदेह बनाया। लेकिन इन आंदोलनों की सबसे बड़ी ताकत उनका नैतिक आधार और अनुशासित व्यवहार था। जब आंदोलन अपनी मर्यादा खो देता है, तब उसका उद्देश्य भी कमजोर पड़ जाता है।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे अधिकांश छात्र और युवा अपने भविष्य, रोजगार और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरे थे। यह उनका अधिकार भी है। लेकिन यदि किसी आंदोलन में कुछ लोग व्यक्तिगत गालियों का सहारा लेते हैं, तो इससे पूरे आंदोलन की छवि प्रभावित होती है। लोकतंत्र में सत्ता से असहमति हो सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति या उसके परिवार के प्रति अपमानजनक भाषा का कोई नैतिक औचित्य नहीं हो सकता।

आज सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को एक मंच दिया है। एक मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से कोई भी व्यक्ति लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकता है। यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक अवसर भी है और बड़ी चुनौती भी। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को स्वतंत्र बनाया है, लेकिन कई बार इस स्वतंत्रता का प्रयोग जिम्मेदारी के साथ नहीं होता। वायरल होने की होड़, लाइक्स और फॉलोअर्स की चाह तथा तात्कालिक लोकप्रियता की मानसिकता ने संवाद की भाषा को प्रभावित किया है। कटाक्ष, व्यंग्य और आलोचना की जगह कई बार अपशब्द और व्यक्तिगत हमले ले लेते हैं।

यह केवल युवाओं की समस्या नहीं है। यदि हम ईमानदारी से आत्ममंथन करें तो पाएंगे कि राजनीतिक दलों के अनेक नेता भी सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे के खिलाफ अमर्यादित भाषा का प्रयोग करते हैं। चुनावी सभाओं से लेकर टेलीविजन बहसों तक और सोशल मीडिया पोस्ट से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस तक कई बार ऐसी भाषा सुनाई देती है जो लोकतांत्रिक संस्कृति के अनुरूप नहीं कही जा सकती। जब समाज के प्रभावशाली लोग संयम खो देते हैं, तो उसका असर नई पीढ़ी पर भी पड़ता है।

यह भी विचारणीय है कि आज का युवा आखिर इतना आक्रोशित क्यों दिखाई देता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी, बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई, मानसिक दबाव और भविष्य की अनिश्चितता ने युवाओं में निराशा और असंतोष पैदा किया है। यदि इन समस्याओं का समय पर समाधान नहीं होगा, तो आक्रोश स्वाभाविक रूप से सामने आएगा। इसलिए केवल युवाओं के व्यवहार की आलोचना करना पर्याप्त नहीं है; उन परिस्थितियों को भी समझना होगा जो इस असंतोष को जन्म देती हैं।

सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वह युवाओं के साथ नियमित संवाद बनाए रखे, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता सुनिश्चित करे, पारदर्शी भर्ती प्रणाली विकसित करे और रोजगार सृजन को सर्वोच्च प्राथमिकता दे। जब युवाओं को व्यवस्था पर विश्वास होगा, तब आंदोलनों की तीव्रता भी स्वतः कम होगी।

दूसरी ओर युवाओं को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र में अधिकारों के साथ कर्तव्य भी जुड़े होते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान का मौलिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार दूसरों की गरिमा और कानून की सीमाओं के भीतर ही प्रभावी होता है। किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की आलोचना की जा सकती है, उसकी नीतियों का विरोध किया जा सकता है, लेकिन व्यक्तिगत अपमान लोकतांत्रिक बहस को कमजोर करता है।

प्रधानमंत्री द्वारा युवाओं को "गुमराह बच्चे" कहकर उन्हें माफ करने की बात एक मानवीय दृष्टिकोण का संकेत है। किंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि कानून का शासन कायम रहे। यदि किसी मामले में शिकायत दर्ज होती है, तो उसकी जांच निष्पक्ष और संविधान के अनुरूप होनी चाहिए। न तो कानून का दुरुपयोग होना चाहिए और न ही कानून के भय को समाप्त होने देना चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती इसी संतुलन में निहित है।

परिवारों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। बच्चों का पहला विद्यालय उनका घर होता है। यदि परिवार में संवाद, सम्मान और संयम का वातावरण होगा, तो वही संस्कार समाज में दिखाई देंगे। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों को भी केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक तैयार करने वाले केंद्र बनना होगा। लोकतांत्रिक मूल्य, संवैधानिक कर्तव्य, असहमति की संस्कृति और सभ्य संवाद को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

भारत की सभ्यता हजारों वर्षों से संवाद की परंपरा पर आधारित रही है। उपनिषदों में प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता थी। भगवान बुद्ध ने तर्क और विवेक को महत्व दिया। महावीर ने अहिंसा और संयम का संदेश दिया। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा को राजनीतिक संघर्ष का आधार बनाया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान के माध्यम से असहमति को संस्थागत स्वरूप दिया। इन सभी महान व्यक्तित्वों ने सिखाया कि विचारों की लड़ाई शब्दों की मर्यादा के भीतर भी लड़ी जा सकती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति फिर से मुद्दों पर लौटे। बहस रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, पर्यावरण, विज्ञान और सामाजिक न्याय पर हो। यदि राजनीतिक विमर्श व्यक्तिगत आरोपों और अपमान तक सीमित रहेगा, तो लोकतंत्र का स्तर भी गिरता जाएगा। मीडिया की भी बड़ी जिम्मेदारी है कि वह सनसनी के बजाय सार्थक विमर्श को बढ़ावा दे और समाज को तथ्य आधारित जानकारी उपलब्ध कराए।

इस पूरे घटनाक्रम से सबसे बड़ा संदेश यही निकलता है कि लोकतंत्र में विरोध भी जरूरी है और मर्यादा भी। सरकार को आलोचना स्वीकार करनी चाहिए और नागरिकों को भी अपनी भाषा और व्यवहार की गरिमा बनाए रखनी चाहिए। किसी भी पक्ष द्वारा संयम खोना लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है।

भारत विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था है। आज जब देश वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका मजबूत करने का प्रयास कर रहा है, तब लोकतांत्रिक परिपक्वता भी उतनी ही आवश्यक है। आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और वैश्विक प्रतिष्ठा तभी सार्थक होगी जब समाज संवाद, सहिष्णुता और परस्पर सम्मान के मूल्यों को भी समान महत्व देगा।

अंततः यह घटना किसी एक व्यक्ति, एक वीडियो या एक भाषण तक सीमित नहीं है। यह हम सभी के लिए आत्मचिंतन का अवसर है। हमें तय करना होगा कि आने वाली पीढ़ी को हम कैसा लोकतंत्र देना चाहते हैं—ऐसा लोकतंत्र जहां असहमति का उत्तर गाली से दिया जाए, या ऐसा लोकतंत्र जहां मतभेदों का समाधान तर्क, संवेदना और संवाद से निकले।

यदि भारत को वास्तव में विश्वगुरु बनने का सपना साकार करना है, तो सबसे पहले संवाद की संस्कृति को मजबूत करना होगा। राजनीतिक मतभेद रहेंगे, विचारधाराएं अलग होंगी, विरोध प्रदर्शन भी होंगे, लेकिन यदि भाषा की मर्यादा और संवैधानिक मूल्यों का सम्मान बना रहेगा, तो लोकतंत्र और अधिक सशक्त होगा।

लोकतंत्र की वास्तविक विजय तब होगी जब विरोध करने वाला भी सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करेगा और सत्ता में बैठा व्यक्ति भी आलोचना को सुनने का धैर्य रखेगा। यही भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है, यही संविधान की भावना है और यही एक मजबूत, संवेदनशील तथा विकसित राष्ट्र की पहचान भी।

— अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक
रांची दस्तक हिन्दी साप्ताहिक एवं PSA Live News

गालियों से नहीं, संवाद से मजबूत होगा लोकतंत्र : युवा आक्रोश, राजनीतिक मर्यादा और राष्ट्र निर्माण की नई चुनौती गालियों से नहीं, संवाद से मजबूत होगा लोकतंत्र : युवा आक्रोश, राजनीतिक मर्यादा और राष्ट्र निर्माण की नई चुनौती Reviewed by PSA Live News on 8:59:00 am Rating: 5

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