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झारखंड में अत्यधिक गर्मी से थर्रा रही अर्थव्यवस्था: 1.76 लाख करोड़ के नुकसान के बाद अब 2048 तक 9.35 लाख करोड़ की चपत का मंडराया खतरा




रांची (13 अक्टूबर 2026):
झारखंड में तेजी से बढ़ता तापमान और अत्यधिक गर्मी (हीट एक्सपोजर) अब महज एक मौसमी आपदा या जनस्वास्थ्य की चुनौती तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह राज्य की आर्थिक रीढ़ पर सीधा प्रहार कर रही है। सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड Energy डेवलपमेंट (सीड) द्वारा आज जारी एक विस्तृत रिपोर्ट ने राज्य के आर्थिक भविष्य को लेकर बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश की है। ‘राइजिंग हीट एंड इकोनॉमिक इम्पैक्ट: टुवर्ड्स हीट रेसिलिएंट झारखंड’ शीर्षक से जारी इस व्यापक रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि अत्यधिक गर्मी के कारण काम करने की क्षमता और श्रम उत्पादकता (लेबर प्रोडक्टिविटी) में आ रही भारी गिरावट झारखंड की विकास दर को सीधे तौर पर प्रभावित कर रही है।

बीते दशक का दर्दनाक हिसाब: GSVA का 8 फीसदी हिस्सा गर्मी में स्वाहा

सीड की रिपोर्ट के आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011-12 से 2022-23 के बीच अत्यधिक गर्मी के चलते श्रम उत्पादकता घटने से राज्य को करीब ₹1.76 लाख करोड़ का कुल अनुमानित आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। यह क्षति इस अवधि के दौरान राज्य के कुल सकल राज्य मूल्य वर्धित (GSVA) का 8 प्रतिशत हिस्सा है। इस कुल क्षति में ₹0.87 लाख करोड़ का प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान (GSVA का 3.97%) शामिल है, जबकि शेष नुकसान अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों पर पड़े अप्रत्यक्ष प्रभावों का परिणाम है। रिपोर्ट दर्शाती है कि खुले आसमान के नीचे या भारी शारीरिक श्रम वाले क्षेत्रों पर गर्मी की सबसे बुरी मार पड़ी है। इनमें अकेले निर्माण (कंस्ट्रक्शन) क्षेत्र को सर्वाधिक 25 प्रतिशत का नुकसान हुआ, जबकि कृषि, वानिकी एवं मत्स्यपालन क्षेत्र में 11%, परिवहन, भंडारण व संचार क्षेत्र में 10%, विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) में 8% और खनन क्षेत्र में 7% का आर्थिक नुकसान दर्ज किया गया।

भविष्य की चेतावनी: 2047-48 तक ₹9.35 लाख करोड़ का अनुमानित झटका

यदि समय रहते बचाव के कड़े उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले दशकों में स्थिति बेहद भयावह हो सकती है। रिपोर्ट के प्रक्षेपण के मुताबिक, वर्ष 2023-24 से 2047-48 के दौरान गर्मी के कारण श्रम उत्पादकता-जनित नुकसान ₹9.35 लाख करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है, जो राज्य के अनुमानित GSVA का भारी-भरकम 10.31 प्रतिशत होगा। इसमें केवल प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान ही ₹4.70 लाख करोड़ (GSVA का 5.18%) का होगा। निर्माण, कृषि, विनिर्माण और खनन—ये चारों ऐसे मुख्य क्षेत्र हैं जो पूरी तरह से श्रमिकों की मेहनत पर टिके हैं, और भविष्य में होने वाले कुल आर्थिक नुकसान में इनकी हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत रहने की आशंका है।

अदृश्य तबाही: बुनियादी ढांचे को नहीं, इंसान को तोड़ती है गर्मी

कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया कि बाढ़, चक्रवात या भूकंप जैसी पारंपरिक प्राकृतिक आपदाओं के विपरीत, अत्यधिक गर्मी से सड़कों, इमारतों या मशीनों को कोई प्रत्यक्ष भौतिक क्षति नहीं पहुँचती। यही कारण है कि इसका प्रभाव अक्सर सामान्य आर्थिक आकलनों में दर्ज होने से छूट जाता है। गर्मी का असली प्रहार इंसानी शरीर और उसकी कार्यक्षमता पर होता है। बाहर काम करने के घंटों में कमी आना, दोपहर की तपिश में काम रुकना, श्रमिकों की क्षमता घटना, निर्माण परियोजनाओं में देरी होना और फसल उपज गिरना—ये सब ऐसे अदृश्य प्रभाव हैं जो राज्य के सकल घरेलू उत्पाद को धीरे-धीरे अंदर से खोखला कर रहे हैं।

उच्चस्तरीय मंथन और विशेषज्ञों की पुकार

रांची में आयोजित इस परिचर्चा में झारखंड सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों, उद्योग-व्यापार जगत, एमएसएमई प्रतिनिधियों, श्रमिक संघों और नागरिक समाज संगठनों ने हिस्सा लिया।

  • श्री रवि रंजन (आइएफएस), प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं नोडल ऑफिसर-क्लाइमेट चेंज: रिपोर्ट के निष्कर्षों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि श्रमिकों की सुरक्षा के लिए दूरदर्शी नीति बनाना अब अनिवार्य है। राज्य क्लाइमेट एक्शन प्लान के तहत संवेदनशील क्षेत्रों में प्रभाव कम करने के कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन स्थानीय समुदायों को जोड़कर तात्कालिक व दीर्घकालिक प्रयास करने होंगे।
  • श्री रमापति कुमार, सीईओ (सीड): उन्होंने जोर दिया कि राज्य के सेक्टोरल प्लानिंग और बजट आवंटन में हीट फैक्टर को प्रमुखता मिलनी चाहिए। राज्य से लेकर जिला स्तर तक मजबूत ‘हीट एक्शन प्लान’ लागू करने की तत्काल आवश्यकता है, जिसमें विभागीय तालमेल और श्रमिक कल्याण को केंद्र में रखा जाए।
  • डॉ. हरीश्वर दयाल (अर्थशास्त्री): उन्होंने बताया कि बुनियादी सुविधाओं, छायादार स्थलों और फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स के अभाव का सीधा असर असंगठित क्षेत्र के गरीब मजदूरों की पारिवारिक आय पर पड़ रहा है, जिससे सामाजिक-आर्थिक विषमता बढ़ रही है।

नीतिगत बदलाव और भावी रणनीति: क्या हों मुख्य कदम?

सृष्टि पल्लव (डायरेक्टर-पॉलिसी एवं पार्टनरशिप, सीड) द्वारा संचालित इस परामर्श सत्र में रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए शिखर सिंह और अन्य प्रतिभागियों ने ठोस समाधानों की रूपरेखा रखी। राज्य को इस भीषण संकट से उबारने के लिए निम्नलिखित प्रमुख सुझाव सामने आए:

  • जिलास्तरीय हीट एक्शन प्लान: राज्य के हर जिले की भौगोलिक स्थिति के अनुसार अलग हीट एक्शन प्लान तैयार कर उसे तुरंत लागू किया जाए।
  • विकास योजनाओं व बिल्डिंग बाय-लॉज में बदलाव: शहरी व ग्रामीण विकास, औद्योगिक पार्कों और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की डिजाइन में गर्मी से सुरक्षा के मानक जोड़े जाएं। भवन निर्माण नियमों और औद्योगिक स्वीकृतियों (इंडस्ट्रियल क्लीयरेंस) में श्रमिकों के बचाव के प्रावधान अनिवार्य किए जाएं।
  • कार्य कैलेंडर में संशोधन: मनरेगा व वीबी-जीराम-जी जैसी प्रमुख सार्वजनिक योजनाओं में गर्मी के महीनों के दौरान काम के समय (शिफ्ट) में बदलाव किया जाए, ताकि दोपहर की भीषण धूप से श्रमिकों को बचाया जा सके।
  • कार्यस्थलों पर मूलभूत सुविधाएं: सभी सार्वजनिक और निजी निर्माण स्थलों तथा कार्यक्षेत्रों पर पेयजल, पर्याप्त छायादार विश्राम स्थल और काम के बीच में आराम का समय (रेस्ट ब्रेक्स) देना कानूनी रूप से सुनिश्चित किया जाए।
  • जलवायु-अनुकूल कृषि: कृषि क्षेत्र को गर्मी के प्रकोप से बचाने के लिए नई तकनीक और जलवायु-अनुकूल फसलों की खेती को बढ़ावा दिया जाए।
झारखंड में अत्यधिक गर्मी से थर्रा रही अर्थव्यवस्था: 1.76 लाख करोड़ के नुकसान के बाद अब 2048 तक 9.35 लाख करोड़ की चपत का मंडराया खतरा झारखंड में अत्यधिक गर्मी से थर्रा रही अर्थव्यवस्था: 1.76 लाख करोड़ के नुकसान के बाद अब 2048 तक 9.35 लाख करोड़ की चपत का मंडराया खतरा Reviewed by PSA Live News on 7:06:00 pm Rating: 5

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