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संपादकीय लेख : विरोध-प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग और पत्रकारिता का धर्म: सुरक्षा, स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन की आवश्यकता


— अशोक कुमार झा (प्रधान संपादक: PSA लाइव न्यूज एवं रांची दस्तक)

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकारिता का मूल कार्य सत्ता से सवाल पूछना, जन-आंदोलनों की सही तस्वीर सामने लाना और समाज को निष्पक्ष जानकारी उपलब्ध कराना है। हालांकि, बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में जब विरोध-प्रदर्शन और जन-आंदोलन उग्र या जटिल रूप ले लेते हैं, तब धरातल (Ground Zero) पर तैनात पत्रकारों के सामने सुरक्षा और पेशेवर धर्म को बनाए रखने की एक गंभीर चुनौती खड़ी हो जाती है। इसी पृष्ठभूमि में, भारतीय प्रेस परिषद (Press Council of India - PCI) द्वारा 15 अक्टूबर 2026 को जारी किए गए "Guidelines for Journalists Covering Protests and Demonstrations" केवल एक आधिकारिक नियमावली नहीं हैं, बल्कि यह भारत में निष्पक्ष और सुरक्षित पत्रकारिता की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सामयिक कदम है। 14 अक्टूबर 2026 की अपनी ऐतिहासिक बैठक के बाद प्रेस परिषद ने जिस प्रकार से ग्राउंड रिपोर्टिंग के हर पहलू को बारीकी से समेटते हुए दिशानिर्देश तैयार किए हैं, वह मीडियाकर्मियों के अधिकार, सुरक्षा और नैतिक दायित्वों के बीच एक सूक्ष्म संतुलन स्थापित करता है।

पहचान और पेशेवर आचरण इस पूरे दिशानिर्देश का पहला और सबसे अहम पड़ाव है। ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान अक्सर यह देखा जाता है कि भीड़भाड़ या पुलिस कार्रवाई के दौरान पत्रकारों और आम प्रदर्शनकारियों के बीच अंतर कर पाना कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए कठिन हो जाता है। प्रेस परिषद ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि प्रत्येक पत्रकार के पास उनके संस्थान या PIB/DIP द्वारा जारी मान्य पहचान पत्र होना अनिवार्य है। इसके साथ ही, प्रेस आईडी को हमेशा दिखाई देने योग्य तरीके से पहनने और आवश्यकता पड़ने पर संयमपूर्वक अपनी पहचान प्रस्तुत करने पर बल दिया गया है। लेकिन पहचान पत्र से भी अधिक महत्वपूर्ण है रिपोर्टर का पेशेवर आचरण। दिशानिर्देशों में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है कि पत्रकारों को हर हाल में अपनी पूर्ण तटस्थता (neutrality) बनाए रखनी होगी। किसी प्रदर्शन का हिस्सा बनना, किसी एक पक्ष की ओर झुकाव दिखाना, उत्तेजक भाषणों या झड़पों को बढ़ावा देना अथवा पुलिस प्रशासन के काम में अनावश्यक बाधा डालना सीधे तौर पर पत्रकारिता के सिद्धांतों के विपरीत माना गया है। लोकतंत्र में पत्रकार की भूमिका एक तटस्थ दर्शक और निष्पक्ष समीक्षक की होती है, न कि किसी आंदोलन के प्रतिभागी की।

मैदानी सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन की दृष्टि से प्रेस परिषद ने भौतिक स्थिति निर्धारण (Positioning) को सुरक्षा का पहला नियम माना है। जब विरोध-प्रदर्शन उग्र रूप लेते हैं या पुलिस द्वारा बल प्रयोग अथवा वॉटर कैनन/आंसू गैस का उपयोग किया जाता है, तब पत्रकारों द्वारा अपनाई गई दूरी ही उनकी जान बचाती है। रिपोर्टरों को हिंसक टकराव वाले स्थलों से safe distance बनाए रखने और कैमरों या उपकरणों को पुलिस बैरिकेड्स व सरकारी गाड़ियों पर इस तरह न लगाने का निर्देश दिया गया है, जिससे सार्वजनिक सुरक्षा या आवाजाही में रुकावट आए। भीड़ के बीच से गुजरते समय छोटे कदम उठाने, भगदड़ से बचने और अपने आसपास के माहौल का लगातार पुनर्मूल्यांकन करने जैसी व्यावहारिक बातें यह दर्शाती हैं कि यह दिशानिर्देश वास्तविक मैदानी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं।

इसी क्रम में, 'सिचुएशनल अवेयरनेस' यानी स्थिति की सजगता और आपातकालीन निकास योजना (Escape Planning) को पत्रकार की प्राथमिक रणनीति के रूप में रेखांकित किया गया है। भीड़ के बदलते रुख, शोरगुल में बदलाव, सुरक्षा बलों की हलचल और संभावित खतरों को भांपना हर मैदानी रिपोर्टर के लिए अनिवार्य है। किसी भी संवेदनशील स्थल पर प्रवेश करते ही निकास मार्ग (Exit Route) को पहले से चिह्नित कर लेना और तनाव बढ़ने की स्थिति में भीड़ के और अंदर जाने के बजाय सुरक्षित दिशा में बाहर निकलना एक ऐसा जीवन-रक्षक जीवन-मूल्य है, जिसकी उपेक्षा कोई भी पत्रकार नहीं कर सकता। धुएं या आंसू गैस के माहौल में दृश्यमान लैंडमार्क के जरिए बाहर निकलने का सुझाव रिपोर्टरों को गंभीर शारीरिक क्षति से बचाने में सहायक सिद्ध होगा।

शारीरिक सुरक्षा के साथ-साथ व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण और फर्स्ट-एड की उपलब्धता को इस नियमावली में विशेष स्थान दिया गया है। प्रेस परिषद ने प्रत्येक फील्ड रिपोर्टर के लिए एक compact emergency kit साथ रखना अनिवार्य माना है, जिसमें फर्स्ट-एड किट, आवश्यक दवाएं, पीने का पानी, उच्च-प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ, टॉर्च, तौलिया और आंखों के बचाव के लिए गॉगल्स (goggles) शामिल हों। इसके अतिरिक्त, गंभीर जोखिम वाले क्षेत्रों में सुरक्षात्मक हेलमेट और बॉडी आर्मर (जैकेट) का उपयोग करने की सलाह दी गई है। हालांकि, परिषद ने एक बहुत ही गंभीर चेतावनी भी दी है कि सुरक्षा उपकरण पहनने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि रिपोर्टर अनावश्यक जोखिम उठाए। इसके साथ ही, दागे गए आंसू गैस के गोलों या विस्फोटक अवशेषों को छूने या उठाने से सख्त परहेज करने को कहा गया है, क्योंकि ये अत्यधिक गर्म या जानलेवा साबित हो सकते हैं।

संस्थानिक स्तर पर देखें तो यह दिशानिर्देश केवल व्यक्तिगत पत्रकारों पर ही जिम्मेदारी नहीं डालते, बल्कि न्यूज़रूम और मीडिया घरानों की जवाबदेही को भी तय करते हैं। अक्सर देखा गया है कि मीडिया संस्थान अपने रिपोर्टरों को ग्राउंड पर भेजकर निश्चिंत हो जाते हैं। प्रेस परिषद ने निर्देश दिया है कि प्रत्येक न्यूज़रूम को एक समर्पित नोडल अधिकारी तैनात करना चाहिए जो मैदान में मौजूद रिपोर्टरों की लोकेशन ट्रैक करे और आपात स्थिति में तत्काल सहायता पहुंचाए। विशेष रूप से फ्रीलांस पत्रकारों (Freelancers) के लिए यह नियम बनाया गया है कि वे अपने किसी विश्वसनीय संपादक या संपर्क सूत्र को अपनी लोकेशन और वापसी के समय से अवगत कराएं। इसके अलावा, पहले से तय प्रदर्शनों की कवरेज के लिए मीडिया संगठनों को स्थानीय पुलिस प्रशासन और प्रेस पीआरओ से पूर्व-समन्वय स्थापित करने और सुरक्षित मीडिया ज़ोन (Staging Areas) की पहचान करने की सलाह दी गई है, जो कि स्वस्थ समन्वय का प्रतीक है।

अंततः, पत्रकारिता का सबसे अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण आधार 'नैतिक और जिम्मेदार रिपोर्टिंग' (Ethical and Responsible Reporting) है। सनसनीखेज फुटेज, ब्रेकिंग न्यूज की अंधी दौड़ और टीआरपी/व्यूज के चक्कर में अक्सर रिपोर्टिंग के स्थापित मानकों की अनदेखी कर दी जाती है। प्रेस परिषद ने साफ कर दिया है कि अफवाहों, असत्यापित दावों और केवल बयानों को सत्यापित तथ्यों से अलग रखना होगा। प्रत्यक्षदर्शियों, पुलिस और प्रदर्शनकारियों—सभी के दावों को समान पत्रकारिता कसौटी पर कसना और एक से अधिक स्वतंत्र स्रोतों से पुष्टि करना अनिवार्य है। लाइव प्रसारण के दौरान पुलिस की रणनीतिक आवाजाही, ऑपरेशनल मूवमेंट्स या निकास मार्गों का रियल-टाइम प्रदर्शन सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है, अतः इस पर रोक लगाई गई है। इसके अतिरिक्त, घायलों, नाबालिगों और पीड़ित नागरिकों की तस्वीरें या पहचान उजागर करते समय मानवीय संवेदनाओं और उनकी निजता (Privacy) का सम्मान करने की सख्त ताकीद की गई है।

निष्कर्षतः, भारतीय प्रेस परिषद द्वारा जारी यह विस्तृत नियमावली भारतीय मीडिया परिदृश्य के लिए एक पथ-प्रदर्शक का कार्य करेगी। यह पत्रकारों को यह याद दिलाती है कि आपकी पहली प्राथमिकता आपकी अपनी जान और सुरक्षा है, क्योंकि "कोई भी खबर किसी पत्रकार की जान से बढ़कर नहीं हो सकती"। यदि मीडिया संस्थान, पत्रकार और कानून प्रवर्तन एजेंसियां इन दिशानिर्देशों का अक्षरशः पालन करती हैं, तो न केवल पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि देश की जनता तक भी अधिक सटीक, निष्पक्ष और जिम्मेदार खबरें पहुंच सकेंगी। लोकतंत्र की मजबूती के लिए इस प्रकार का जिम्मेदार दृष्टिकोण समय की सबसे बड़ी मांग है।

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