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प्रेस कार्ड, यूट्यूब मोनोलॉग और पत्रकारिता की परिभाषा


संपादकीय | रांची दस्तक

प्रधान संपादक : अशोक कुमार झा

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह केवल एक सम्मानजनक संबोधन नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी का संकेत है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता की चकाचौंध में दबे सवालों को सामने लाना, आम नागरिक की आवाज को व्यवस्था तक पहुंचाना, समाज में घट रही घटनाओं की वास्तविक तस्वीर जनता के सामने रखना और आवश्यकता पड़ने पर सत्ता, प्रशासन, राजनीतिक दलों तथा प्रभावशाली व्यक्तियों से जवाब मांगना रहा है। लेकिन बदलते डिजिटल युग में पत्रकारिता की परंपरागत सीमाएं तेजी से बदल रही हैं। आज एक मोबाइल फोन, एक कैमरा और इंटरनेट कनेक्शन किसी भी व्यक्ति को लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचाने की क्षमता देता है। सोशल मीडिया ने सूचना के प्रसार को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन इसी के साथ एक गंभीर सवाल भी खड़ा हुआ है कि आखिर पत्रकार किसे माना जाए और पत्रकारिता की न्यूनतम कसौटी क्या हो।

आज देश के अनेक सार्वजनिक स्थलों, राजनीतिक प्रदर्शनों, सरकारी कार्यक्रमों और आंदोलन के केंद्रों पर ऐसे लोग दिखाई देते हैं जो गले में कोई पहचान-पत्र लटकाए, हाथ में कैमरा या मोबाइल लिए स्वयं को पत्रकार बताते हैं। इनमें बड़े मीडिया संस्थानों से जुड़े पत्रकार भी होते हैं, छोटे समाचार संगठनों के संवाददाता भी होते हैं, स्वतंत्र डिजिटल पत्रकार भी होते हैं और ऐसे कंटेंट क्रिएटर भी होते हैं जो मुख्य रूप से अपने यूट्यूब चैनल, सोशल मीडिया पेज या डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए सामग्री तैयार करते हैं। इसके अलावा राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न अभियानों से जुड़े कार्यकर्ता भी कई बार कैमरा लेकर घटनास्थल पर सक्रिय दिखाई देते हैं। समस्या यह नहीं है कि कोई व्यक्ति कैमरा लेकर किसी घटना को रिकॉर्ड कर रहा है या अपनी बात जनता तक पहुंचा रहा है। लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब अलग-अलग भूमिकाओं के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है और एक्टिविस्ट, कंटेंट क्रिएटर, राजनीतिक प्रचारक और समाचार पत्रकार—सभी को एक ही पहचान के अंतर्गत प्रस्तुत किया जाने लगता है।

हाल के दिनों में प्रदर्शन स्थलों से जुड़ी कुछ घटनाओं ने इस बहस को फिर से तेज किया है। किसी व्यक्ति के स्वयं को पत्रकार बताने, उसके किसी सामाजिक या राजनीतिक संगठन से जुड़े होने के दावों और उस पहचान को लेकर उठे सवालों ने यह सोचने पर मजबूर किया है कि पत्रकारिता की पहचान आखिर किस आधार पर तय होगी। यहां किसी एक व्यक्ति के संबंध में किए गए दावे को अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं होगा, लेकिन उससे पैदा होने वाला व्यापक प्रश्न निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। यदि कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक अभियान, सामाजिक संगठन या आंदोलन का सक्रिय हिस्सा है और उसी समय स्वयं को निष्पक्ष पत्रकार के रूप में प्रस्तुत करता है, तो जनता को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि वह वहां समाचार संकलित करने आया है, अपने संगठन का संदेश पहुंचाने आया है या किसी विशेष अभियान के समर्थन में सामग्री तैयार कर रहा है। यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पत्रकारिता और एक्टिविज्म दोनों लोकतंत्र के वैध हिस्से हैं, लेकिन दोनों की भूमिका एक जैसी नहीं है।

एक्टिविस्ट होना कोई अपराध नहीं है। किसी सामाजिक मुद्दे के लिए आवाज उठाना, किसी अन्याय के खिलाफ अभियान चलाना या किसी राजनीतिक विचारधारा का समर्थन करना भी लोकतांत्रिक अधिकारों के भीतर आता है। इसी तरह किसी व्यक्ति का यूट्यूब चैनल चलाना, राजनीतिक टिप्पणी करना या सरकार की आलोचना करना भी अपने आप में गलत नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ ही यही है कि नागरिक अपने विचारों को सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर सकें। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारिता की पेशेवर जिम्मेदारी दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं। जब कोई व्यक्ति स्वयं को पत्रकार कहता है और पत्रकारिता की सामाजिक विश्वसनीयता का लाभ उठाता है, तब उसके ऊपर तथ्यात्मक सत्यापन, स्रोतों की जांच, संदर्भ देने, आरोप और तथ्य में अंतर करने तथा जहां संभव हो वहां संबंधित पक्ष को अपनी बात रखने का अवसर देने की जिम्मेदारी भी आती है।

आज सबसे आसान काम है सोशल मीडिया पर अपना पेज बनाना और उसके नाम के साथ "मीडिया", "न्यूज", "जर्नलिस्ट" या "इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट" जोड़ देना। कुछ लोग अपने निजी यूट्यूब चैनल को मीडिया संस्थान की तरह प्रस्तुत करते हैं, कुछ निजी संस्थाओं के पहचान-पत्र लेकर घूमते हैं और कुछ ऐसे कार्ड भी इस्तेमाल करते हैं जिनकी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं होती। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझना आवश्यक है कि किसी निजी संस्था द्वारा जारी किया गया पहचान-पत्र अपने आप सरकारी मान्यता प्राप्त प्रेस कार्ड नहीं बन जाता। किसी निजी संगठन का आईडी कार्ड उस संगठन से संबद्धता का प्रमाण हो सकता है, लेकिन उसे सरकारी प्रेस मान्यता के समान नहीं माना जा सकता। प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो अथवा राज्य सरकारों की मान्यता संबंधी प्रक्रियाएं अलग-अलग नियमों और पात्रता के आधार पर चलती हैं। इसलिए निजी पहचान-पत्र, मीडिया संस्थान का कर्मचारी कार्ड, स्वतंत्र पत्रकार की पहचान और सरकारी मान्यता—इन सभी को एक ही श्रेणी में रखना भ्रम पैदा करता है।

यहीं पर सरकार और मीडिया संस्थानों दोनों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा राज्य सरकारों को इस विषय में अधिक स्पष्टता लाने की आवश्यकता है। यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि आधिकारिक प्रेस मान्यता क्या है, निजी मीडिया संस्थान द्वारा जारी पहचान-पत्र की स्थिति क्या है, स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारों के लिए कौन-से मानदंड लागू हो सकते हैं और कंटेंट क्रिएटर की भूमिका किस प्रकार अलग है। सरकारी कार्यक्रमों, प्रेस कॉन्फ्रेंस, प्रदर्शन स्थलों और अन्य आधिकारिक स्थानों पर मिलने वाली प्रेस सुविधाओं के लिए पारदर्शी नियम होने चाहिए। इससे वास्तविक पत्रकारों की सुविधा भी सुरक्षित होगी और ऐसे लोगों के लिए भी स्पष्ट सीमा तय होगी जो केवल किसी पहचान-पत्र के आधार पर पत्रकारिता का आधिकारिक दर्जा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

लेकिन इस समस्या का समाधान केवल सरकारी मान्यता तक सीमित नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता को केवल इसलिए पत्रकारिता नहीं माना जा सकता कि उसके पास कोई कार्ड है और न ही केवल इसलिए खारिज किया जा सकता है कि उसके पास कार्ड नहीं है। डिजिटल युग में अनेक स्वतंत्र पत्रकार बिना किसी बड़े मीडिया संस्थान के काम कर रहे हैं। वे दस्तावेजों की जांच करते हैं, आरटीआई के माध्यम से जानकारी जुटाते हैं, ग्राउंड रिपोर्ट करते हैं, लोगों के बयान लेते हैं और स्वतंत्र रूप से समाचार प्रकाशित करते हैं। ऐसे पत्रकारों को केवल इसलिए पत्रकारिता से बाहर करना कि वे किसी बड़े संस्थान के कर्मचारी नहीं हैं, स्वयं पत्रकारिता की स्वतंत्रता को कमजोर करेगा। इसलिए पत्रकार की पहचान का आधार केवल कार्ड नहीं बल्कि उसके कार्य की प्रकृति, उसकी पेशेवर पारदर्शिता और उसके पत्रकारिता संबंधी आचरण को भी बनाया जाना चाहिए।

इसी संदर्भ में कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के बीच अंतर समझना बेहद जरूरी है। आज यूट्यूब पर लाखों लोग राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर वीडियो बनाते हैं। कुछ लोग कैमरे के सामने बैठकर घटनाओं का विश्लेषण करते हैं, कुछ अपनी राय देते हैं, कुछ किसी विचारधारा का समर्थन करते हैं और कुछ सरकार तथा राजनीतिक दलों पर तीखी टिप्पणी करते हैं। यह सब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत हो सकता है। लेकिन हर राजनीतिक टिप्पणी को पत्रकारिता कहना आवश्यक नहीं है। यदि कोई व्यक्ति कहता है कि "मेरी राय में सरकार का यह निर्णय गलत है", तो यह उसकी राजनीतिक या सामाजिक राय है। यदि कोई व्यक्ति किसी विषय के उपलब्ध दस्तावेजों, आधिकारिक आंकड़ों और विभिन्न पक्षों के बयानों का परीक्षण करके तथ्य सामने रखता है, तो वह पत्रकारिता या तथ्य आधारित विश्लेषण के करीब जाता है। दोनों को एक ही नाम देना दर्शक के साथ न्याय नहीं होगा।

यूट्यूब के बढ़ते प्रभाव ने पत्रकारिता की इस सीमा को और जटिल बना दिया है। आज ऐसे अनेक चैनल हैं जिनके संचालक स्वयं को पत्रकार या स्वतंत्र मीडिया बताते हैं, जबकि उनकी अधिकांश सामग्री टिप्पणी, राजनीतिक विश्लेषण अथवा एकतरफा मोनोलॉग के रूप में सामने आती है। किसी व्यक्ति का लगातार कैमरे के सामने बैठकर बोलना अपने आप में पत्रकारिता का प्रमाण नहीं है। पत्रकारिता में केवल बोलना पर्याप्त नहीं है; सुनना भी जरूरी है। सवाल पूछना जरूरी है। जवाब खोजना जरूरी है। दस्तावेज देखना जरूरी है। स्रोतों की पुष्टि करना जरूरी है। अपने निष्कर्ष के विपरीत तथ्य सामने आने पर उसे स्वीकार करना भी जरूरी है। यदि कोई व्यक्ति केवल अपने विचारों को विस्तार देता है और दूसरे पक्ष को लगातार अनुपस्थित रखता है, तो उसकी सामग्री को राय, टिप्पणी या राजनीतिक विश्लेषण कहना अधिक ईमानदार होगा।

यहां किसी एक व्यक्ति या एक राजनीतिक विचारधारा को निशाना बनाने का प्रश्न नहीं है। यही कसौटी सभी पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। यदि कोई मीडिया संस्थान सरकार के हर निर्णय की प्रशंसा करता है और सरकार की कमियों को लगातार नजरअंदाज करता है, तो उसकी पत्रकारिता पर सवाल उठना चाहिए। यदि कोई डिजिटल चैनल सरकार के हर निर्णय को षड्यंत्र बताता है और हर घटना को एक ही राजनीतिक दृष्टिकोण से देखता है, तो उसकी निष्पक्षता पर भी सवाल उठना चाहिए। पत्रकारिता का मूल्य इस बात से निर्धारित नहीं होना चाहिए कि पत्रकार सरकार के पक्ष में है या विपक्ष में। उसका मूल्य इस बात से निर्धारित होना चाहिए कि वह तथ्य के पक्ष में कितना खड़ा है।

लोकतंत्र में पत्रकार का काम विपक्ष की भूमिका निभाना नहीं है। विपक्ष की भूमिका राजनीतिक दलों की है। पत्रकार का काम सरकार का प्रचार करना भी नहीं है। सरकार के पास अपने प्रचार और सूचना तंत्र होते हैं। पत्रकार का दायित्व जनता के सामने तथ्य रखना है। यदि सरकार अच्छा काम करती है तो उसकी खबर प्रकाशित करना पत्रकारिता है। यदि सरकार की नीति से जनता को नुकसान होता है तो उस पर सवाल उठाना भी पत्रकारिता है। यदि विपक्ष किसी गंभीर मुद्दे को उठाता है तो उसकी खबर करना भी पत्रकारिता है। लेकिन विपक्ष का आरोप केवल इसलिए सत्य नहीं हो जाता कि वह विपक्ष ने लगाया है। उसी तरह सरकार का बयान केवल इसलिए सत्य नहीं हो जाता कि वह सरकारी मंच से जारी हुआ है। दोनों का परीक्षण आवश्यक है।

पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्वतंत्रता है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी पूंजी विश्वसनीयता है। स्वतंत्रता बिना विश्वसनीयता के शोर बन सकती है और विश्वसनीयता बिना स्वतंत्रता के सरकारी सूचना तंत्र में बदल सकती है। इसलिए पत्रकारिता को दोनों की आवश्यकता है। पत्रकार को सत्ता से सवाल करने की स्वतंत्रता चाहिए, लेकिन अपने सवालों के पीछे तथ्य भी चाहिए। उसे विपक्ष के आरोपों को प्रकाशित करने की स्वतंत्रता चाहिए, लेकिन आरोप और प्रमाण के बीच अंतर भी स्पष्ट करना चाहिए। उसे किसी विचारधारा से असहमति का अधिकार चाहिए, लेकिन असहमति को तथ्य का स्थान नहीं देना चाहिए।

आज "गोदी मीडिया" और "एजेंडा मीडिया" जैसे शब्दों का इस्तेमाल बहुत सामान्य हो गया है। सत्ता समर्थक मीडिया को एक वर्ग गोदी मीडिया कहता है और सरकार की आलोचना करने वाले मीडिया को दूसरा वर्ग एजेंडा मीडिया कहता है। इन शब्दों की राजनीतिक उपयोगिता हो सकती है, लेकिन पत्रकारिता के मूल्यांकन के लिए ये पर्याप्त कसौटी नहीं हैं। हमें इससे आगे जाना होगा। सवाल यह होना चाहिए कि खबर में तथ्य कितने हैं, स्रोत कितने विश्वसनीय हैं, संबंधित पक्ष को कितना स्थान मिला है और क्या पत्रकार ने अपने पूर्वाग्रह को खबर के ऊपर हावी होने दिया है।

आज कई डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर दर्शक को वही सामग्री बार-बार दिखाई जाती है जो उसकी राजनीतिक पसंद से मेल खाती है। इससे एक प्रकार का वैचारिक बुलबुला बनता है। दर्शक वही सुनना चाहता है जिस पर वह पहले से विश्वास करता है और कंटेंट निर्माता भी वही सामग्री बनाता है जिससे उसके दर्शक जुड़े रहें। परिणाम यह होता है कि पत्रकारिता का उद्देश्य सूचना देने से धीरे-धीरे दर्शक को संतुष्ट करने की दिशा में बदलने लगता है। ऐसी स्थिति में पत्रकार और राजनीतिक प्रचारक के बीच अंतर कम होता जाता है।

सच्चा पत्रकार कई बार अपने पाठक या दर्शक को असहज करता है। वह वह तथ्य सामने रख सकता है जिसे दर्शक सुनना नहीं चाहता। वह अपने समर्थक नेता के खिलाफ भी खबर कर सकता है और विरोधी नेता के पक्ष में उपलब्ध सही तथ्य भी प्रकाशित कर सकता है। यही पत्रकारिता की कठिन परीक्षा है। पत्रकारिता का अर्थ दर्शक की राजनीतिक भावना को सहलाना नहीं, बल्कि उसे वास्तविकता से परिचित कराना है।

इसीलिए दूसरे पक्ष को जगह देना पत्रकारिता की महत्वपूर्ण कसौटी है। हर छोटी खबर में दो पक्ष उपलब्ध हों, यह आवश्यक नहीं। लेकिन किसी व्यक्ति, संस्था या संगठन पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हों तो उसका पक्ष जानने का प्रयास होना चाहिए। यदि संबंधित व्यक्ति प्रतिक्रिया देने से इनकार करता है तो यह भी स्पष्ट किया जा सकता है। यदि प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है तो उसे तथ्य की तरह प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। इससे खबर की विश्वसनीयता बढ़ती है।

पत्रकारिता और एक्टिविज्म के बीच भी इसी पारदर्शिता की आवश्यकता है। किसी एक्टिविस्ट को पत्रकार बनने से रोकना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। पत्रकार भी एक नागरिक है और उसके व्यक्तिगत विचार हो सकते हैं। लेकिन यदि कोई व्यक्ति किसी संगठन का सक्रिय पदाधिकारी या अभियानकर्ता है और उसी संगठन से संबंधित मुद्दे पर रिपोर्ट कर रहा है, तो उसकी संबद्धता सार्वजनिक होना पारदर्शिता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इससे दर्शक स्वयं तय कर सकता है कि वह सामग्री किस संदर्भ में प्रस्तुत की जा रही है।

यही कारण है कि किसी प्रदर्शन स्थल पर मौजूद व्यक्ति के गले में प्रेस कार्ड देखकर उसे तुरंत निष्पक्ष पत्रकार मान लेना भी उचित नहीं है। पहचान-पत्र केवल पहचान का एक माध्यम हो सकता है। पत्रकारिता की गुणवत्ता का प्रमाण नहीं। जिस प्रकार डॉक्टर की पहचान केवल उसका कोट नहीं है, उसी प्रकार पत्रकार की पहचान केवल उसका प्रेस कार्ड नहीं है। पत्रकारिता का असली परिचय उसकी रिपोर्टिंग से होता है।

यहां एक और गंभीर प्रश्न है—क्या कोई भी व्यक्ति कुछ पैसे देकर कार्ड छपवा सकता है और उसे प्रेस कार्ड बताकर सरकारी अथवा सार्वजनिक संस्थानों में पत्रकार के रूप में प्रस्तुत कर सकता है? यदि ऐसा होता है तो यह केवल पत्रकारिता की समस्या नहीं है, बल्कि वास्तविक पत्रकारों की प्रतिष्ठा से जुड़ा प्रश्न है। निजी पहचान-पत्र जारी करने वाली संस्थाओं को भी अपने कार्ड पर स्पष्ट रूप से यह उल्लेख करना चाहिए कि वह कार्ड केवल संस्थागत पहचान है और किसी सरकारी मान्यता का प्रमाण नहीं है। इस तरह की पारदर्शिता विवाद को काफी हद तक कम कर सकती है।

सरकार को भी प्रेस सुविधा और पत्रकारिता की स्वतंत्रता के बीच संतुलन रखना होगा। किसी सरकार को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह अपनी आलोचना करने वाले व्यक्ति को पत्रकार मानने से इनकार कर दे और अपने समर्थक को पत्रकार का दर्जा दे। पत्रकारिता की स्वतंत्रता का अर्थ यही है कि पत्रकार सरकार के निर्णयों से स्वतंत्र रह सके। लेकिन सरकारी सुविधाओं और आधिकारिक मान्यता के लिए वस्तुनिष्ठ पात्रता मानदंड होना भी उतना ही जरूरी है। यही लोकतांत्रिक संतुलन है।

डिजिटल पत्रकारिता के आने के बाद पत्रकारिता की दुनिया में एक बड़ा परिवर्तन हुआ है। पहले समाचार प्रकाशित करने के लिए प्रेस, प्रिंटिंग मशीन, संपादकीय विभाग और वितरण तंत्र की आवश्यकता होती थी। अब एक मोबाइल फोन से लाइव रिपोर्टिंग की जा सकती है। एक वीडियो कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। कोई ग्रामीण क्षेत्र का व्यक्ति भी किसी स्थानीय समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर ला सकता है। यह परिवर्तन लोकतंत्र के लिए अत्यंत सकारात्मक है। लेकिन इसके साथ फर्जी खबर, अधूरी जानकारी, भ्रामक शीर्षक, कटे-छंटे वीडियो और एकतरफा राजनीतिक सामग्री का खतरा भी बढ़ा है।

इसलिए डिजिटल पत्रकारिता को रोकना समाधान नहीं है। समाधान है डिजिटल पत्रकारिता को अधिक जिम्मेदार बनाना।

आज जनता के पास पहले से कहीं अधिक सूचना है, लेकिन सत्य की पहचान पहले से कहीं अधिक कठिन हो गई है। एक ही घटना के दस वीडियो मिलते हैं और हर वीडियो अलग निष्कर्ष देता है। एक ही घटना पर अलग-अलग राजनीतिक खेमों की अलग-अलग व्याख्या सामने आती है। ऐसे वातावरण में पत्रकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उसे केवल सूचना पहुंचाने वाला नहीं बल्कि सूचना को सत्यापित करने वाला माध्यम भी बनना होगा।

पत्रकारिता का अर्थ केवल यह बताना नहीं कि "क्या हुआ", बल्कि जहां संभव हो यह भी बताना है कि "क्यों हुआ", "इसके प्रमाण क्या हैं", "किसका क्या पक्ष है" और "इसका जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा।" यही संदर्भ पत्रकारिता को सोशल मीडिया पोस्ट से अलग करता है।

एक वायरल वीडियो और एक सत्यापित रिपोर्ट में यही अंतर है।

एक सोशल मीडिया पोस्ट किसी घटना का दावा कर सकती है। पत्रकारिता उस दावे की जांच करती है।

एक कंटेंट क्रिएटर अपनी राय रख सकता है। पत्रकार संबंधित तथ्यों को सामने रखकर पाठक को स्वयं निर्णय लेने का अवसर देता है।

एक एक्टिविस्ट किसी आंदोलन का समर्थन कर सकता है। पत्रकार उस आंदोलन की खबर करते समय उसके समर्थकों के साथ-साथ प्रशासन और विरोधी पक्ष की स्थिति भी सामने रख सकता है।

यही लोकतांत्रिक पत्रकारिता है।

आज यह बहस केवल प्रेस कार्ड की नहीं है। यह पत्रकारिता की विश्वसनीयता की बहस है। यह तय करने की बहस है कि आने वाली पीढ़ी पत्रकारिता को किस रूप में देखेगी। यदि हर कैमरा पत्रकार है, हर यूट्यूब चैनल समाचार संस्थान है और हर राजनीतिक भाषण पत्रकारिता है, तो धीरे-धीरे पत्रकार शब्द की विश्वसनीयता कमजोर होगी। दूसरी तरफ यदि पत्रकारिता को केवल बड़े कॉरपोरेट मीडिया संस्थानों तक सीमित कर दिया गया तो स्वतंत्र और वैकल्पिक पत्रकारिता के लिए जगह कम हो जाएगी।

इसलिए बीच का रास्ता ही लोकतांत्रिक रास्ता है। पत्रकारिता का दरवाजा खुला रहे, लेकिन उसके भीतर प्रवेश करने वाले प्रत्येक व्यक्ति से न्यूनतम पेशेवर ईमानदारी की अपेक्षा भी हो।

जो व्यक्ति समाचार करता है, उसे समाचार कहने दीजिए। जो व्यक्ति टिप्पणी करता है, उसे टिप्पणी कहने दीजिए। जो व्यक्ति राजनीतिक अभियान चलाता है, उसे एक्टिविस्ट कहने में संकोच नहीं होना चाहिए। जो व्यक्ति मनोरंजन या राजनीतिक कंटेंट बनाता है, उसे कंटेंट क्रिएटर कहलाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। समस्या तब पैदा होती है जब एक भूमिका की विश्वसनीयता का लाभ उठाकर दूसरी भूमिका को छिपाया जाता है।

जनता को भ्रमित करने की जगह जनता को जानकारी देना ही पत्रकारिता का उद्देश्य होना चाहिए।

पत्रकारिता को किसी पार्टी का विरोधी या समर्थक बनाने की बजाय जनता का माध्यम बनाए रखना होगा। पत्रकार को यह समझना होगा कि उसका कैमरा केवल वीडियो रिकॉर्ड करने का उपकरण नहीं है, वह सार्वजनिक विश्वास का माध्यम है। उसका माइक्रोफोन केवल आवाज रिकॉर्ड नहीं करता, वह किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकता है। उसकी खबर केवल कुछ पंक्तियां नहीं होती, वह किसी परिवार, संस्था या समाज पर प्रभाव डाल सकती है। इसलिए पत्रकारिता में जिम्मेदारी की मात्रा अभिव्यक्ति की सामान्य स्वतंत्रता से कहीं अधिक है।

पत्रकारिता की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि पत्रकार जो चाहे तथ्य के रूप में प्रस्तुत कर दे। स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व जुड़ा है। इसी प्रकार पत्रकारिता की आलोचना का अर्थ पत्रकारों को डराना या दबाना नहीं होना चाहिए। स्वस्थ लोकतंत्र में पत्रकार सरकार से सवाल करेगा और जनता पत्रकार से भी सवाल करेगी। यही लोकतांत्रिक संवाद है।

आज आवश्यकता है कि मीडिया संस्थान अपने पत्रकारों की पहचान और संपादकीय नीतियों को सार्वजनिक करें। स्वतंत्र डिजिटल पत्रकार अपने कार्यक्षेत्र, संपर्क और संपादकीय नीति को स्पष्ट कर सकते हैं। कंटेंट क्रिएटर अपनी सामग्री को न्यूज, ओपिनियन, विश्लेषण या कमेंट्री के रूप में स्पष्ट कर सकते हैं। राजनीतिक एक्टिविस्ट अपनी राजनीतिक या संगठनात्मक संबद्धता सार्वजनिक कर सकते हैं। सरकारी संस्थान प्रेस सुविधाओं के लिए पारदर्शी और गैर-भेदभावपूर्ण नियम बना सकते हैं। और जनता को भी यह समझना होगा कि प्रेस कार्ड देखकर किसी व्यक्ति को तुरंत निष्पक्ष पत्रकार मान लेना उचित नहीं है।

अंततः पत्रकारिता किसी कार्ड का नाम नहीं है। पत्रकारिता किसी चैनल के लोगो का नाम नहीं है। पत्रकारिता कैमरे का नाम नहीं है। पत्रकारिता यूट्यूब के सब्सक्राइबरों की संख्या का नाम नहीं है। पत्रकारिता किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का नाम भी नहीं है।

पत्रकारिता एक जिम्मेदारी है।

यह जिम्मेदारी है सत्य के करीब पहुंचने की। यह जिम्मेदारी है तथ्य को राय से अलग रखने की। यह जिम्मेदारी है आरोप और प्रमाण के बीच अंतर स्पष्ट करने की। यह जिम्मेदारी है दूसरे पक्ष को सुनने की। यह जिम्मेदारी है सत्ता से सवाल करने की और जरूरत पड़ने पर अपने पसंदीदा विचार या व्यक्ति से भी सवाल करने की। यह जिम्मेदारी है जनता के विश्वास को किसी राजनीतिक या व्यावसायिक हित के लिए बेचने से बचने की।

आज यदि कोई व्यक्ति पत्रकार नहीं बल्कि कंटेंट क्रिएटर है, तो उसे कंटेंट क्रिएटर कहने में कोई कमी नहीं। यदि कोई एक्टिविस्ट है, तो एक्टिविस्ट होना भी सम्मानजनक भूमिका है। यदि कोई राजनीतिक विश्लेषक है, तो विश्लेषक के रूप में उसकी अपनी जगह है। यदि कोई स्वतंत्र पत्रकार है और ईमानदारी से तथ्य जुटाकर रिपोर्ट करता है, तो उसके लिए बड़े मीडिया संस्थान का कार्ड अनिवार्य नहीं होना चाहिए। लेकिन इन सभी पहचानों को एक-दूसरे में मिलाकर जनता के सामने प्रस्तुत करना निश्चित रूप से भ्रम पैदा करता है।

इसलिए अब समय आ गया है कि भारत में पत्रकारिता की बहस को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठाया जाए। यह तय किया जाए कि प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा कैसे हो, स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता को स्थान कैसे मिले, निजी प्रेस कार्ड और सरकारी मान्यता के बीच अंतर कैसे स्पष्ट हो, कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार की भूमिका कैसे अलग पहचानी जाए और आधिकारिक प्रेस सुविधाओं का उपयोग किस पारदर्शी आधार पर हो।

यह व्यवस्था किसी एक राजनीतिक पक्ष के लिए नहीं, बल्कि सभी के लिए होनी चाहिए। आज सत्ता में एक दल है, कल दूसरा दल हो सकता है। आज किसी पत्रकार को सरकार की नीति अच्छी लग सकती है, कल वही पत्रकार उसकी आलोचना कर सकता है। इसलिए नियम व्यक्ति या विचारधारा के आधार पर नहीं, सिद्धांत के आधार पर बनने चाहिए।

पत्रकारिता को बचाने का अर्थ पत्रकारों को सरकारी नियंत्रण में लाना नहीं है। पत्रकारिता को बचाने का अर्थ यह भी नहीं है कि हर व्यक्ति को बिना किसी पारदर्शिता के आधिकारिक प्रेस सुविधा दे दी जाए। वास्तविक रास्ता इन दोनों अतियों के बीच है—स्वतंत्रता भी और जवाबदेही भी। अधिकार भी और जिम्मेदारी भी। अभिव्यक्ति भी और सत्यापन भी।

आज देश को ऐसे पत्रकारों की जरूरत है जो सत्ता के सामने झुकें नहीं, लेकिन तथ्यों से भी न भागें। ऐसे पत्रकारों की जरूरत है जो विपक्ष की आवाज को दबाएं नहीं, लेकिन विपक्ष के आरोपों को बिना जांचे सत्य भी न मानें। ऐसे पत्रकारों की जरूरत है जो जनता के बीच जाएं, उसकी समस्याएं सुनें और उसकी आवाज को जिम्मेदारी से सामने रखें। ऐसे डिजिटल पत्रकारों की जरूरत है जो तकनीक का इस्तेमाल सनसनी फैलाने के लिए नहीं, बल्कि तथ्य तक पहुंचने के लिए करें।

और सबसे अधिक आवश्यकता ऐसी पत्रकारिता की है जो यह समझे कि जनता किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है और पत्रकारिता भी किसी दल की संपत्ति नहीं है।

जनता को सच जानने का अधिकार है।

उसे यह जानने का भी अधिकार है कि उसके सामने बोलने वाला व्यक्ति कौन है—पत्रकार, एक्टिविस्ट, राजनीतिक कार्यकर्ता, कंटेंट क्रिएटर या विश्लेषक। हर भूमिका लोकतंत्र में अपनी जगह रखती है। किसी को भी अपनी भूमिका छिपाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। लेकिन एक भूमिका का पहचान-पत्र लेकर दूसरी भूमिका का लाभ उठाना पत्रकारिता की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकता है।

इसलिए प्रेस कार्ड की बहस अंततः कार्ड की बहस नहीं है। यह भरोसे की बहस है। यह इस सवाल की बहस है कि जनता किस पर विश्वास करे। यह उस व्यवस्था की बहस है जिसमें एक तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे और दूसरी तरफ समाचार तथा प्रचार के बीच अंतर भी साफ दिखाई दे।

पत्रकारिता को किसी एक राजनीतिक खेमे से मुक्त करना होगा। उसे सत्ता की गोद से भी बाहर रखना होगा और राजनीतिक प्रचार के मंच से भी। पत्रकारिता का अंतिम केंद्र न सरकार होनी चाहिए, न विपक्ष, न मालिक, न विज्ञापनदाता और न ही सोशल मीडिया का एल्गोरिद्म।

पत्रकारिता का अंतिम केंद्र जनता होनी चाहिए।

क्योंकि जब पत्रकारिता जनता के प्रति जवाबदेह रहती है, तब वह लोकतंत्र को मजबूत करती है। जब पत्रकारिता किसी सत्ता, दल, विचारधारा या आर्थिक हित की स्थायी प्रवक्ता बन जाती है, तब उसकी स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ समाप्त होने लगता है।

इसलिए आज आवश्यकता किसी व्यक्ति को पत्रकार घोषित करने या किसी दूसरे को पत्रकार कहने से रोकने की नहीं, बल्कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता को फिर से केंद्र में लाने की है। प्रेस कार्ड रहे, डिजिटल मीडिया रहे, यूट्यूब रहे, सोशल मीडिया रहे, एक्टिविज्म रहे, राजनीतिक बहस रहे—लोकतंत्र में इन सभी के लिए जगह होनी चाहिए। लेकिन हर भूमिका की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए।

जो समाचार दे, वह तथ्य के साथ खड़ा हो।
जो राय दे, वह अपनी राय को राय कहे।
जो अभियान चलाए, अपनी संबद्धता स्पष्ट करे।
जो पत्रकारिता करे, वह जवाबदेही स्वीकार करे।

यही पारदर्शिता लोकतंत्र की ताकत बनेगी।

और यही वह बुनियादी अंतर है जो एक प्रेस कार्डधारी व्यक्ति को वास्तविक पत्रकार से अलग करता है।

अंततः पत्रकार की पहचान उसके गले में लटके कार्ड से नहीं, बल्कि उसके द्वारा जनता के सामने रखे गए सत्य की गुणवत्ता से होनी चाहिए। कैमरा किसी के हाथ में हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता उसके चरित्र, उसकी जांच-पड़ताल, उसकी निष्पक्षता और उसकी सार्वजनिक जवाबदेही में दिखाई देती है। इसलिए हमें पत्रकार शब्द को छोटा नहीं करना है, बल्कि पत्रकारिता के मानकों को इतना मजबूत करना है कि जनता जब किसी को पत्रकार कहे तो उसके मन में सबसे पहले कार्ड नहीं, विश्वसनीयता का विचार आए।

यही पत्रकारिता की असली पहचान है। यही लोकतंत्र की जरूरत है। और यही समय की सबसे बड़ी मांग भी।

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