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सूचना क्रांति का दौर: पत्रकारिता की साख और ‘कंटेंट क्रिएशन’ के उभार के बीच रेखांकन


अशोक कुमार झा 

प्रधान संपादक: PSA लाइव न्यूज एवं राँची दस्तक।

डिजिटल तकनीक के अभूतपूर्व विस्तार ने सूचना के सम्प्रेषण और उपभोग की पारंपरिक अवधारणाओं को पूरी तरह बदल दिया है। एक समय था जब सूचना का अधिकार और उसका वितरण केवल मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों और प्रशिक्षित पत्रकारों तक सीमित था। आज स्मार्टफोन और इंटरनेट की सुलभता ने हर हाथ में कैमरा और हर व्यक्ति को एक मंच दे दिया है। इसी डिजिटल क्रांति की कोख से 'कंटेंट क्रिएटर' नामक एक नई श्रेणी का जन्म हुआ है। आज स्थिति यह है कि आम पाठक या दर्शक के लिए एक पेशेवर पत्रकार और एक डिजिटल कंटेंट क्रिएटर के बीच का अंतर पहचानना धुंधला होता जा रहा है। यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर सूचनाओं की जो बाढ़ आई है, उसमें सत्य, राय, मनोरंजन और रिपोर्टिंग आपस में उलझ गए हैं। ऐसे में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक और गंभीर हो जाता है कि आखिर एक कंटेंट क्रिएटर और एक पत्रकार के बीच बुनियादी अंतर क्या है, और लोकतंत्र में इस अंतर को बनाए रखना क्यों अनिवार्य है?

1. सत्य की खोज बनाम एल्गोरिदम का आकर्षण

पत्रकारिता का मूल आधार केवल सूचना देना नहीं, बल्कि 'सत्यापित सूचना' देना है। एक पत्रकार जब किसी घटना को कवर करता है, तो उसका पहला और अंतिम कर्तव्य निष्पक्षता, तथ्यात्मकता और जनहित होता है। पत्रकारिता की प्रक्रिया में प्राथमिक स्रोतों तक पहुँचना, ऑन-ग्राउंड रिपोर्टिंग करना, चश्मदीदों के बयानों की पुष्टि करना, आधिकारिक दस्तावेजों को खंगालना और आरोपी या प्रभावित पक्ष का दृष्टिकोण शामिल होता है। पत्रकारिता का नियम कहता है कि बिना पुष्टि के दी गई सूचना केवल एक दावा है, समाचार नहीं।

इसके विपरीत, एक कंटेंट क्रिएटर का प्राथमिक उद्देश्य 'अटेंशन' यानी दर्शकों का ध्यान आकर्षित करना होता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का एल्गोरिदम इस तरह डिजाइन किया गया है जो उस सामग्री को बढ़ावा देता है जो अधिक जुड़ाव (Engagement), शेयर और प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करती है। कंटेंट क्रिएशन में अक्सर 'क्या सत्य है' से ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि 'क्या वायरल हो सकता है'। क्रिएटर किसी विषय पर अपनी त्वरित प्रतिक्रिया, व्यक्तिगत राय, या मनोरंजन का तड़का लगाकर सामग्री प्रस्तुत करता है। यहाँ तथ्य-जाँच (Fact-Checking) कोई अनिवार्य शर्त नहीं होती, बल्कि प्रस्तुतीकरण की रोचकता मुख्य चालक होती है।

2. संस्थागत उत्तरदायित्व बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता

पत्रकारिता केवल एक व्यक्ति का प्रयास नहीं, बल्कि एक संस्थागत व्यवस्था (Institutional Framework) है। एक निष्पक्ष समाचार के पीछे संपादकीय मंडल, गेटकीपिंग, कानूनी समझ और प्रेस काउंसिल जैसे वैधानिक निकायों का दबाव होता है। यदि कोई पत्रकार गलत, भ्रामक या मानहानिकारक खबर प्रकाशित करता है, तो उसे संपादकीय स्तर पर जवाब देना होता है, खंडन जारी करना पड़ता है और कानूनी नतीजों का सामना करना पड़ता है। पत्रकारिता की एक स्थापित आचार संहिता (Editorial Code of Ethics) है, जो उसे निजी पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर सोचने के लिए बाध्य करती है।

दूसरी ओर, कंटेंट क्रिएटर मुख्य रूप से एक स्वतंत्र संस्था की तरह काम करता है। वह स्वयं ही संपादक, निर्माता और प्रस्तुतकर्ता होता है। उस पर किसी संपादकीय बोर्ड की निगरानी नहीं होती। उसकी जवाबदेही मुख्य रूप से प्लेटफॉर्म की कम्युनिटी गाइडलाइन्स और उसके फॉलोअर्स तक सीमित होती है। उसे विषय चयन, प्रस्तुति की शैली और राय व्यक्त करने की पूरी व्यक्तिगत स्वतंत्रता होती है। लेकिन यही स्वतंत्रता कई बार गैर-जिम्मेदाराना बयानों, भ्रामक दावों और सनसनीखेज सामग्री के रूप में भी सामने आती है, क्योंकि वहाँ कोई 'गेटकीपर्स' या 'फ़िल्टर' मौजूद नहीं होते जो तथ्यों की समीक्षा कर सकें।

3. अर्थशास्त्र और स्वतंत्रता का द्वंद्व

पत्रकारिता और कंटेंट क्रिएशन के बीच सबसे बड़ा और सूक्ष्म अंतर उनके वित्तीय मॉडल में छिपा है। पारंपरिक पत्रकारिता में विज्ञापन और सब्सक्रिप्शन राजस्व का मुख्य स्रोत होते हैं, लेकिन पत्रकारिता का सिद्धांत यह मांग करता है कि विज्ञापनदाता का संपादकीय नीति पर कोई प्रभाव न हो—अर्थात 'चर्च और स्टेट' के बीच की दूरी बनी रहे। हालाँकि वर्तमान समय में व्यावसायिक दबावों के कारण यह दूरी प्रभावित हुई है, फिर भी जनहित को व्यावसायिक हितों से ऊपर रखना ही पत्रकारिता की कसौटी है।

कंटेंट क्रिएटर का अर्थशास्त्र पूरी तरह से 'पर्सनल ब्रांडिंग' और स्पॉन्सरशिप पर टिका होता है। ब्रांड्स सीधे क्रिएटर के पास आते हैं और अपनी बात दर्शकों तक पहुँचाने के लिए उन्हें भुगतान करते हैं। ऐसे में 'कंटेंट' और 'विज्ञापन' (Influencer Marketing) के बीच की रेखा अक्सर मिट जाती है। जब कोई क्रिएटर किसी उत्पाद या सेवा की समीक्षा करता है, तो यह पहचानना कठिन होता है कि वह उसका निष्पक्ष मूल्यांकन कर रहा है या फिर यह एक प्रायोजित (Paid) सामग्री है। पत्रकारिता जहाँ हितों के टकराव (Conflict of Interest) को उजागर करने की मांग करती है, वहीं कंटेंट क्रिएशन में यह टकराव व्यावसायिक मॉडल का ही हिस्सा बन जाता है।

4. लोकतंत्र में भूमिका: प्रहरी बनाम मनोरंजक

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाली पत्रकारिता का सबसे मुख्य काम सत्ता से कठिन सवाल पूछना, नीतिगत फैसलों की समीक्षा करना, प्रशासनिक भ्रष्टाचार को उजागर करना और समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज बनना है। खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) और जनहित की रिपोर्टिंग जोखिम भरी होती है, जिसमें न तो तुरंत रीच मिलती है और ना ही भारी व्यूज। लेकिन यह समाज को जागरूक और सशक्त बनाने के लिए आवश्यक होती है।

कंटेंट क्रिएटर मुख्य रूप से उपभोक्ता केंद्रित (Consumer-Centric) विषयों पर ध्यान केंद्रित करते हैं—जैसे लाइफस्टाइल, तकनीक, यात्रा, गेमिंग या हास्य। निसंदेह, कई क्रिएटर सामाजिक मुद्दों पर भी उत्कृष्ट काम कर रहे हैं, लेकिन उनकी भूमिका मुख्य रूप से सूचनात्मक विश्लेषक या मनोरंजक की होती है, न कि सत्ता के प्रहरी की। वे समाज की रुचियों को परोसते हैं, जबकि पत्रकारिता कई बार समाज को उन कड़वे सचों से रूबरू कराती है जिन्हें समाज या सत्ता देखना नहीं चाहती।

5. भविष्य की राह और मीडिया साक्षरता

वर्तमान डिजिटल परिदृश्य में दोनों ही माध्यमों के अपने-अपने मायने हैं। कंटेंट क्रिएटर्स ने सूचना और ज्ञान का लोकतांत्रीकरण किया है, जिससे विशेषज्ञता अब केवल टीवी स्टूडियो या अखबारों तक सीमित नहीं रही। दूसरी ओर, जब कोई पत्रकार स्वतंत्र होकर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर आता है, तो वह दोनों दुनिया के सकारात्मक पहलुओं को जोड़ सकता है।

हालाँकि, सबसे बड़ी चुनौती आम नागरिक की है। आज के दर्शक को 'मीडिया साक्षरता' (Media Literacy) की सबसे ज्यादा जरूरत है। पाठकों और दर्शकों को यह समझना होगा कि हर वह व्यक्ति जो माइक लेकर बोल रहा है या कैमरे के सामने वीडियो बना रहा है, वह पत्रकार नहीं है। राय (Opinion) और समाचार (News) के बीच का अंतर, विश्लेषण और स्पॉन्सर्ड कंटेंट के बीच की भिन्नता को पहचानना ही एक जागरूक नागरिक की पहचान है।

कंटेंट क्रिएशन जहाँ रचनात्मकता और मनोरंजन का उत्सव है, वहीं पत्रकारिता निष्पक्षता, साख और सामाजिक जिम्मेदारी की एक कठिन साधना है। कंटेंट क्रिएटर दर्शकों को लुभा सकता है, लेकिन समाज को दिशा देने और लोकतंत्र की रक्षा करने का दायित्व आज भी निष्पक्ष और नैतिक पत्रकारिता के मजबूत कांधों पर ही टिका है।

सूचना क्रांति का दौर: पत्रकारिता की साख और ‘कंटेंट क्रिएशन’ के उभार के बीच रेखांकन सूचना क्रांति का दौर: पत्रकारिता की साख और ‘कंटेंट क्रिएशन’ के उभार के बीच रेखांकन Reviewed by PSA Live News on 9:17:00 pm Rating: 5

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