ब्लॉग खोजें

IAS की कुर्सी छोड़ सियासत के मैदान में दिव्या मित्तल: एक पोस्टर, कई संकेत और उत्तर प्रदेश की राजनीति में उठते नए सवाल


लेखक
— अशोक कुमार झा
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक, प्रशासनिक एवं राजनीतिक विश्लेषक
प्रधान संपादक — रांची दस्तक एवं PSA लाइव न्यूज

उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले हलचल तेज होना स्वाभाविक है, लेकिन जब किसी चर्चित पूर्व आईएएस अधिकारी के राजनीतिक जीवन की शुरुआत के साथ ही उसकी तस्वीर एक प्रभावशाली क्षेत्रीय राजनीतिक नेता के साथ सामने आए, तो चर्चाओं का दायरा अचानक बड़ा हो जाता है। पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल के मामले में इन दिनों कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। करीब 13 वर्षों की प्रशासनिक सेवा के बाद राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने की घोषणा करने वाली दिव्या मित्तल ने साफ किया है कि फिलहाल वह किसी राजनीतिक दल के साथ नहीं जाएंगी और जनता के बीच स्वतंत्र रूप से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करेंगी। इसी बीच जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के प्रदेश प्रधान महासचिव डॉ. बृजेश सिंह राजावत ने पार्टी अध्यक्ष और कुंडा विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के साथ दिव्या मित्तल की तस्वीर वाला पोस्टर सोशल मीडिया पर साझा किया। पोस्टर में लिखा गया—“राजनीति के कुरुक्षेत्र में स्वागत है, दिव्या मित्तल जी! IAS का अनुभव + राजा भैया जी की जमीनी पकड़ = क्या UP में नई दिशा की शुरुआत?” इस पोस्ट ने उत्तर प्रदेश की सियासत में संभावनाओं और अटकलों का नया दौर शुरू कर दिया है।


इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए सबसे पहले यह अंतर समझना जरूरी है कि एक राजनीतिक दल के नेता द्वारा किसी नए राजनीतिक चेहरे का स्वागत करना और उस व्यक्ति का औपचारिक रूप से उस दल में शामिल होना दो अलग-अलग बातें हैं। अभी तक सामने आई सार्वजनिक जानकारी में दिव्या मित्तल ने किसी दल में शामिल होने की घोषणा नहीं की है। उलटे उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा को दलगत राजनीति से अलग रखने की बात कही है। ऐसे में राजा भैया के साथ सामने आए पोस्टर को फिलहाल एक राजनीतिक संकेत, स्वागत और संभावित संवाद के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसे औपचारिक गठबंधन या पार्टी में शामिल होने की घोषणा मानना जल्दबाजी होगी।

दिव्या मित्तल की राजनीति में एंट्री इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि वह कोई सामान्य राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने वाला चेहरा नहीं हैं। वह 2013 बैच की उत्तर प्रदेश कैडर की आईएएस अधिकारी रही हैं और प्रशासनिक सेवा में करीब 13 वर्ष बिताने के बाद राजनीति में आने का फैसला किया है। उन्होंने आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग और आईआईएम बेंगलुरु से प्रबंधन की पढ़ाई की तथा सिविल सेवा में आने से पहले वित्तीय क्षेत्र में काम किया था। उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक जिम्मेदारियों के दौरान उन्होंने कई जिलों में काम किया और मिर्जापुर में जिलाधिकारी रहते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कार्यों को लेकर उनकी चर्चा हुई। उनके प्रशासनिक कार्यकाल की वजह से उनकी एक सार्वजनिक पहचान पहले से बनी हुई है।

यही प्रशासनिक पृष्ठभूमि अब उनके राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी पहचान भी बन सकती है और सबसे बड़ी चुनौती भी। प्रशासनिक सेवा में किसी अधिकारी के पास सरकारी व्यवस्था, कानून, नियम, योजनाओं और नौकरशाही की कार्यप्रणाली को करीब से देखने का अवसर होता है। लेकिन राजनीति का मैदान बिल्कुल अलग है। यहां सिर्फ नीतियों की जानकारी पर्याप्त नहीं होती। जनता के बीच लगातार रहना, स्थानीय समस्याओं को समझना, कार्यकर्ताओं का संगठन तैयार करना, सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को समझना तथा चुनावी राजनीति की जटिलताओं के बीच अपना स्थान बनाना भी जरूरी होता है। इसलिए दिव्या मित्तल के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न यही होगा कि वह अपने प्रशासनिक अनुभव को किस तरह राजनीतिक जनसंपर्क और संगठन में बदलती हैं।

दिव्या मित्तल की राजनीतिक घोषणा का एक महत्वपूर्ण पहलू उनका किसी राजनीतिक दल में शामिल न होने का निर्णय है। उन्होंने अपने राजनीतिक संदेश में कहा है कि वह उन लोगों की आवाज बनना चाहती हैं जिनकी समस्याएं अक्सर सरकारी व्यवस्था तक पहुंच नहीं पातीं। उन्होंने शिक्षा, रोजगार, सरकारी योजनाओं के जमीन पर क्रियान्वयन, पेपर लीक, बुनियादी ढांचे और युवाओं से जुड़े सवालों को प्रमुखता से उठाया है। उनका कहना है कि राजनीति को केवल पद हासिल करने का माध्यम नहीं बल्कि जनता की समस्याओं को सामने लाने का रास्ता बनाया जाना चाहिए। उन्होंने उत्तर प्रदेश को अपनी कर्मभूमि बताते हुए यहीं से राजनीतिक यात्रा शुरू करने की बात कही है।

दिव्या मित्तल के इस रुख को उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में भी देखना होगा। राज्य में विधानसभा चुनाव की तैयारी का दौर चल रहा है और लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपने संगठन, उम्मीदवारों और चुनावी मुद्दों को लेकर सक्रिय हैं। ऐसे समय में किसी चर्चित पूर्व नौकरशाह का यह कहना कि वह किसी दल का झंडा नहीं उठाएंगी और सीधे जनता के बीच जाकर अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करेंगी, अपने आप में एक अलग तरह का राजनीतिक प्रयोग है। यह प्रयोग कितना बड़ा रूप लेगा, इसका अंदाजा अभी लगाना संभव नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि इस घोषणा ने राजनीतिक विमर्श में एक नया चेहरा जोड़ दिया है।

इसी पृष्ठभूमि में राजा भैया के साथ दिव्या मित्तल की तस्वीर सामने आना और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के वरिष्ठ नेता डॉ. बृजेश सिंह राजावत ने 29 सितंबर को सोशल मीडिया पर यह पोस्ट साझा की। पोस्ट में उन्होंने सवालिया अंदाज में पूछा कि क्या उत्तर प्रदेश में राजनीति का नया अध्याय शुरू होगा। उन्होंने दिव्या मित्तल के प्रशासनिक अनुभव को राजा भैया की जमीनी राजनीतिक पकड़ के साथ जोड़ते हुए नई राजनीतिक दिशा की संभावना व्यक्त की।

राजनीति में इस तरह के पोस्ट महज सोशल मीडिया गतिविधि नहीं होते, लेकिन उनके अर्थ निकालते समय सावधानी भी उतनी ही जरूरी होती है। किसी राजनीतिक दल के पदाधिकारी का किसी नए चेहरे का सार्वजनिक स्वागत करना उस चेहरे के प्रति राजनीतिक रुचि या सम्मान को जरूर दर्शा सकता है, लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि दोनों के बीच चुनावी समझौता हो चुका है। दिव्या मित्तल का स्वयं का सार्वजनिक रुख फिलहाल इससे अलग है। उन्होंने राजनीतिक दल में शामिल होने से इनकार किया है। इसलिए राजा भैया के साथ तस्वीर और दिव्या मित्तल के स्वतंत्र राजनीति करने के बयान—दोनों को साथ रखकर देखने की जरूरत है।

यही वह जगह है जहां यह पोस्टर कई राजनीतिक सवाल खड़े करता है। क्या यह सिर्फ एक स्वागत संदेश है? क्या जनसत्ता दल लोकतांत्रिक दिव्या मित्तल को अपने राजनीतिक दायरे में आने का संकेत दे रहा है? क्या भविष्य में दोनों के बीच कोई राजनीतिक सहयोग हो सकता है? या फिर यह केवल एक राजनीतिक नेता द्वारा प्रशासनिक पृष्ठभूमि से आई नई महिला नेता के प्रति समर्थन और उत्साहवर्धन का सार्वजनिक प्रदर्शन है? इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट नहीं हैं। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी में किसी औपचारिक राजनीतिक समझौते की घोषणा सामने नहीं आई है। इसलिए फिलहाल इन प्रश्नों को संभावनाओं और राजनीतिक अटकलों के रूप में ही देखना उचित होगा।

दिव्या मित्तल की राजनीतिक यात्रा का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू उनकी प्रशासनिक छवि है। किसी अधिकारी की लोकप्रियता और चुनावी राजनीति में स्वीकार्यता एक जैसी नहीं होती। प्रशासनिक अधिकारी के रूप में जब कोई व्यक्ति किसी जिले में काम करता है तो उसके निर्णय का प्रभाव सीधे जनता पर पड़ता है। लेकिन चुनावी राजनीति में जनता किसी अधिकारी को उसके प्रशासनिक पद के कारण नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में परखती है। यहां मुद्दों के साथ-साथ संगठन, नेतृत्व शैली, जनसंपर्क और स्थानीय राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण होते हैं। यही कारण है कि दिव्या मित्तल की आगे की राजनीतिक यात्रा को उनके प्रशासनिक रिकॉर्ड से अलग एक नए पैमाने पर देखना होगा।

उनके सामने एक और बड़ी चुनौती होगी—स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाना। किसी स्थापित राजनीतिक दल के साथ आने पर संगठन, कार्यकर्ता, चुनावी ढांचा और राजनीतिक संसाधन पहले से उपलब्ध होते हैं। स्वतंत्र राजनीति में यह सब स्वयं तैयार करना पड़ता है। यदि दिव्या मित्तल वास्तव में बिना किसी दल के अपनी राजनीतिक यात्रा आगे बढ़ाती हैं, तो उन्हें गांव-गांव, कस्बे-कस्बे और विधानसभा स्तर पर अपना संपर्क तंत्र विकसित करना होगा। उन्हें ऐसे लोगों को अपने साथ जोड़ना होगा जो उनके राजनीतिक विचारों और कार्यक्रमों को जनता तक पहुंचा सकें। सोशल मीडिया से बनी लोकप्रियता को जमीनी संगठन में बदलना अपने आप में एक बड़ी प्रक्रिया होगी।

दिव्या मित्तल ने अपने राजनीतिक संदेश में जिन मुद्दों को उठाया है, वे भी इस यात्रा को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, पेपर लीक, ग्रामीण विकास और सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन ऐसे विषय हैं जो सीधे आम नागरिक और खासकर युवाओं से जुड़े हैं। उन्होंने अपने प्रशासनिक अनुभव के दौरान देखी गई समस्याओं का उल्लेख करते हुए यह सवाल उठाया है कि जब किसी योजना के लिए धन स्वीकृत हो जाए, प्रशासनिक अनुमति मिल जाए, फिर भी वर्षों तक जमीन पर काम न हो तो जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए। इसी तरह उन्होंने शिक्षा के बुनियादी ढांचे और युवाओं के भविष्य से जुड़े प्रश्नों को भी प्रमुखता से सामने रखा है।

उनकी राजनीतिक घोषणा के बाद मिर्जापुर से जुड़ी एक घटना ने भी ध्यान खींचा है। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने जिस क्षेत्र में स्कूल निर्माण में देरी का मुद्दा उठाया था, वहां उनके राजनीतिक संदेश के बाद निर्माण कार्य शुरू होने की खबर सामने आई। इस घटना को लेकर प्रशासनिक कार्रवाई और उनके सार्वजनिक हस्तक्षेप के बीच संबंध की चर्चा हुई है। हालांकि किसी भी राजनीतिक दावे का मूल्यांकन करते समय यह देखना आवश्यक है कि प्रशासनिक प्रक्रिया पहले से किस चरण में थी और निर्माण शुरू होने के वास्तविक कारण क्या थे।

दिव्या मित्तल के राजनीति में आने से एक व्यापक बहस भी सामने आती है—क्या प्रशासनिक अनुभव राजनीति में उपयोगी हो सकता है? इसका उत्तर सीधा हां या ना में देना कठिन है। प्रशासनिक अनुभव किसी व्यक्ति को शासन व्यवस्था की अंदरूनी चुनौतियों को समझने में मदद कर सकता है। सरकारी योजनाएं कैसे बनती हैं, बजट कैसे लागू होता है, जिला प्रशासन किस तरह काम करता है और योजनाओं के क्रियान्वयन में कहां-कहां बाधाएं आती हैं—इनका अनुभव किसी राजनीतिक नेता के लिए उपयोगी हो सकता है। लेकिन राजनीति में जनप्रतिनिधित्व की अपनी अलग प्रकृति है। जनता के बीच राजनीतिक विश्वास, संगठनात्मक क्षमता और स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों की समझ भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

भारत की राजनीति में ऐसे कई उदाहरण रहे हैं जहां प्रशासनिक सेवा छोड़ने वाले अधिकारी बाद में राजनीति में सक्रिय हुए। कुछ ने बड़े राजनीतिक दलों का रास्ता अपनाया और कुछ ने क्षेत्रीय या स्वतंत्र राजनीति की। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि नौकरशाही से राजनीति तक का रास्ता संभव है, लेकिन हर व्यक्ति की राजनीतिक यात्रा अलग रही है। दिव्या मित्तल का मामला इसलिए अलग है क्योंकि उन्होंने शुरुआत में ही यह संकेत दिया है कि वह किसी स्थापित राजनीतिक दल के बजाय जनता के बीच स्वतंत्र रूप से जाने की कोशिश करेंगी।

इस घटनाक्रम का एक महिला नेतृत्व के संदर्भ में भी उल्लेखनीय पहलू है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और राजनीतिक रूप से अत्यंत सक्रिय राज्य में एक पूर्व महिला आईएएस अधिकारी का प्रशासनिक करियर छोड़कर सक्रिय राजनीति में आना अपने आप में ध्यान आकर्षित करने वाली घटना है। दिव्या मित्तल ने अपने संदेश में महिलाओं पर पड़ने वाले राजनीतिक दबावों का उल्लेख करते हुए कहा है कि वह डरने वाली नहीं हैं। हालांकि उनके राजनीतिक सफर की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इन व्यक्तिगत और प्रशासनिक अनुभवों को व्यापक राजनीतिक कार्यक्रम में किस तरह बदलती हैं।

राजा भैया से जुड़े पोस्टर का महत्व इस वजह से भी है कि जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के पास उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में अपना विशिष्ट राजनीतिक आधार है। ऐसे में किसी पूर्व आईएएस अधिकारी के साथ पार्टी नेतृत्व की तस्वीर को लेकर राजनीतिक चर्चा होना स्वाभाविक है। लेकिन यहां भी तथ्य और अटकल को अलग रखना जरूरी है। पोस्टर जारी हुआ है, पोस्ट में दिव्या मित्तल का स्वागत किया गया है और उनके प्रशासनिक अनुभव को राजा भैया की जमीनी राजनीति के साथ जोड़कर सवाल उठाया गया है। इसके आगे कोई औपचारिक राजनीतिक घोषणा हुई है या नहीं, यह अलग प्रश्न है। उपलब्ध रिपोर्टों में फिलहाल तस्वीर को लेकर अटकलों की बात कही गई है, औपचारिक राजनीतिक साझेदारी की पुष्टि नहीं।

यूपी की राजनीति में इस तरह के संकेतों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि चुनावी राजनीति में नए चेहरे लगातार चर्चा का विषय बनते हैं। स्थापित नेताओं के सामने जनता की बदलती अपेक्षाएं, युवाओं की आकांक्षाएं, रोजगार, शिक्षा, सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता और पारदर्शिता जैसे मुद्दे लगातार मौजूद हैं। ऐसे में प्रशासनिक पृष्ठभूमि से आने वाला कोई चेहरा यदि इन्हीं मुद्दों को लेकर राजनीति में उतरता है, तो उसके सामने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने का अवसर भी होता है। लेकिन उस पहचान को स्थायी जनाधार में बदलने के लिए लगातार जमीन पर काम करना पड़ता है।

दिव्या मित्तल के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहेगा कि क्या वह प्रशासनिक अधिकारी की लोकप्रियता को राजनीतिक नेतृत्व की स्वीकार्यता में बदल पाएंगी? यह कोई तत्काल उत्तर देने वाला प्रश्न नहीं है। इसका उत्तर आने वाले समय में उनके जनसंपर्क, संगठन निर्माण, राजनीतिक कार्यक्रम और जनता के साथ उनके संवाद से सामने आएगा। उनके सामने यह भी स्पष्ट करना होगा कि वह किन क्षेत्रों में सक्रिय होंगी, किन मुद्दों को प्राथमिकता देंगी और अपने राजनीतिक संगठन का स्वरूप क्या रखेंगी।

वहीं जनसत्ता दल लोकतांत्रिक और राजा भैया की ओर से सामने आया पोस्टर भी भविष्य के राजनीतिक समीकरणों पर नजर रखने वालों के लिए महत्वपूर्ण है। अगर आने वाले समय में पार्टी या राजा भैया की ओर से दिव्या मित्तल को लेकर कोई औपचारिक घोषणा होती है तो तस्वीर और स्पष्ट होगी। यदि ऐसा नहीं होता और दिव्या मित्तल अपनी स्वतंत्र राजनीतिक यात्रा पर आगे बढ़ती हैं, तो यह भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अलग प्रयोग के रूप में देखा जाएगा।

यह पूरा घटनाक्रम एक और बात की ओर संकेत करता है कि आज राजनीति केवल पारंपरिक राजनीतिक परिवारों या लंबे समय से पार्टी संगठन में सक्रिय नेताओं तक सीमित नहीं है। प्रशासन, शिक्षा, सामाजिक क्षेत्र, कॉरपोरेट और अन्य पेशेवर पृष्ठभूमि से आने वाले लोग भी राजनीति में प्रवेश कर रहे हैं। लेकिन राजनीति में प्रवेश करना और राजनीतिक प्रभाव स्थापित करना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। किसी व्यक्ति की प्रशासनिक उपलब्धियां उसकी राजनीतिक यात्रा के लिए आधार बन सकती हैं, लेकिन राजनीतिक सफलता के लिए जनता के बीच दीर्घकालिक संबंध और संगठनात्मक काम जरूरी होते हैं।

दिव्या मित्तल का मामला इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि उन्होंने राजनीति में प्रवेश का कारण केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के रूप में प्रस्तुत नहीं किया है। उनके सार्वजनिक वक्तव्यों में शिक्षा, युवाओं, रोजगार, सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही और बुनियादी सुविधाओं जैसे विषय दिखाई देते हैं। अब इन मुद्दों को वह किस तरह राजनीतिक कार्यक्रम का रूप देती हैं, यह देखने वाली बात होगी। यदि वह इन मुद्दों पर लगातार जनता के बीच काम करती हैं तो उनकी राजनीतिक पहचान प्रशासनिक सेवा से आगे विकसित हो सकती है। वहीं यदि उनकी राजनीतिक सक्रियता केवल सोशल मीडिया तक सीमित रहती है तो उसका प्रभाव अलग प्रकार का होगा।

इस पूरे घटनाक्रम में एक बात फिलहाल स्पष्ट है—दिव्या मित्तल ने प्रशासनिक सेवा की सुरक्षित और प्रतिष्ठित भूमिका छोड़कर सार्वजनिक जीवन के अधिक खुले और प्रतिस्पर्धी राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करने का फैसला किया है। यह फैसला अपने आप में उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत है, लेकिन राजनीतिक अध्याय अभी लिखा जाना बाकी है। राजा भैया के साथ सामने आया पोस्टर इस अध्याय के आसपास उत्सुकता जरूर बढ़ा रहा है, लेकिन उसकी अंतिम राजनीतिक व्याख्या भविष्य की घटनाओं पर निर्भर करेगी।

अंततः उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी भी नए चेहरे की वास्तविक ताकत का निर्धारण सोशल मीडिया पोस्ट, पोस्टर या राजनीतिक चर्चाओं से नहीं बल्कि जनता के बीच उसकी सक्रियता से होता है। दिव्या मित्तल के पास प्रशासनिक अनुभव है, सार्वजनिक पहचान है और अब उन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में उतरने की घोषणा भी कर दी है। उनके सामने शिक्षा, रोजगार, युवाओं, सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दे हैं। दूसरी ओर उनके सामने संगठन निर्माण, जनाधार तैयार करने और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान स्थापित करने की चुनौती भी है।

राजा भैया के साथ उनकी तस्वीर ने इस कहानी में एक नया अध्याय जरूर जोड़ दिया है। लेकिन फिलहाल वह अध्याय सवालों से भरा हुआ है—क्या यह केवल राजनीतिक स्वागत है, क्या यह भविष्य के संवाद का संकेत है, या आने वाले दिनों में कोई औपचारिक राजनीतिक समीकरण सामने आएगा? इसका उत्तर अभी समय के पास है।

इतना जरूर कहा जा सकता है कि आईएएस की कुर्सी छोड़कर राजनीति के मैदान में उतरी दिव्या मित्तल के लिए अब असली परीक्षा शुरू हो चुकी है। प्रशासनिक फाइलों से निकलकर जनता के बीच राजनीति करना एक बिल्कुल अलग अनुभव होगा। यहां आदेश नहीं, संवाद चलेगा; पद नहीं, जनविश्वास निर्णायक होगा; और सरकारी तंत्र नहीं, संगठन तथा जनता की भागीदारी राजनीतिक यात्रा की दिशा तय करेगी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनका यह नया अध्याय किस रूप में आगे बढ़ता है, यह आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा। फिलहाल इतना तय है कि एक पूर्व आईएएस अधिकारी के राजनीतिक पदार्पण और राजा भैया के साथ सामने आए पोस्टर ने यूपी के राजनीतिक विमर्श में एक नया विषय जरूर जोड़ दिया है।

IAS की कुर्सी छोड़ सियासत के मैदान में दिव्या मित्तल: एक पोस्टर, कई संकेत और उत्तर प्रदेश की राजनीति में उठते नए सवाल IAS की कुर्सी छोड़ सियासत के मैदान में दिव्या मित्तल: एक पोस्टर, कई संकेत और उत्तर प्रदेश की राजनीति में उठते नए सवाल Reviewed by PSA Live News on 12:35:00 pm Rating: 5

कोई टिप्पणी नहीं:

Blogger द्वारा संचालित.