जगन्नाथ मेला, भगवान जगन्नाथ की याद में और उनके प्रति श्रद्धा को व्यक्त करने के लिए झारखंड के आसपास के लोकल कारीगरों और उनकी कलाओं का प्रदर्शन और उत्पादों का बिक्री के लिए एक जगह जुटान हेतु आयोजित किया गया था, जो कि बिल्कुल दान की जमीन पर आपसी चंदा और सहयोग से निर्मित मंदिर के विकास के लिए किया जा रहा थाा। ताकि लोगों का ध्यान इस क्षेत्र में हमेशा बना रहे और प्रभु जगन्नाथ की भक्ति बरकरार रहे।
लेकिन इस वर्ष जगन्नाथपुर मंदिर न्यास समिति के सदस्यों ने इस व्यवस्था को व्यवसायीकरण कर दिया। यहां वर्ष 1691 से अब तक के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जिसमे 75 लाख से अधिक रुपए का टेंडर करवाकर इस पूजा को पूरी तरह से व्यवसाई का रूप से दिया गया है। जिसका सबसे गहरा चोट हुआ है Vocal for Local को।
क्या इस मेले में इस बार हस्तकरघा वाले दिख रहे हैं ?कोई हैंडीक्राफ्ट वाले दिख रहे हैं ? पारंपरिक झारखंड की औषधि और वनउत्पादों को लाने वाले दिख रहे हैं ?क्या सूप-दौरा, टोकरी और बांस के उत्पाद का व्यापार करने वाले दिख रहे हैं ? क्या पत्थर के उत्पाद का व्यापार करने वाले दिख रहे हैं ? तसर, इत्यादि कई लोकल उत्पाद और लोकल कलाकार इस मेला से हाय-तौबा करते हुए क्यों गायब है इस बार ? यह अपने आप में बड़ा सवाल है।
इस बार के मेला में अगर भरमार है तो सिर्फ झूले का ही भरमार है । क्योंकि झूले वाले आर एस इंटरप्राइजेज कंपनी ने ही इसका टेंडर लिया है ₹75 लाख से अधिक में। और उसी अनुरूप वह लोकल दुकानदारों से वसूली भी कर रहा है।
दूसरा कुछ दिख रहा है तो वह है मिठाई वालों का दुकान। क्योंकि वह तो अनजान होकर एक बार आ गए हैं और दुकान लगा लिया है मिठाई में इन्वेस्ट भी कर दिया है। इसलिए अब उनकी मजबूरी है कि लाभ हो या हानि वह तो रहेंगे ही। ऐसा ही बाहर के राज्यों से आए अन्य लोगों के साथ भी है, जो इक्के दुक्के दुकान लगाए हुए हैं।
बाकी चाट-पकौड़ी, फल ठेला, चुस्की, भेल-पापड़ी, आइसक्रीम की दुकान तो कॉमन चलता-फिरता रेड़ी है, जो जहां भीड़ होता है वही आ ही जाता है।
अगर इस प्रकार के मेले के इतिहास को बचाना है तो इसका व्यवसायीकरण करना बंद करना होगा।
पारंपरिक जगन्नाथ मेला का व्यवसायीकरण उसके अस्तित्व के लिए खतरा होगा, इसे बचाना होगा
Reviewed by PSA Live News
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6:24:00 pm
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