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53 एकड़ से अधिक खतियानी आदिवासी भूमि पर कथित कब्जे और रिकॉर्ड छेड़छाड़ का गंभीर आरोप, सिल्ली अंचल कार्यालय को भेजा गया विस्तृत आपत्ति-पत्र

पहले आदिवासी की जाति बदली गई, फिर रिकॉर्ड बदला गया, अब जमीन बेचने की तैयारी” — शम्भुराम बेदिया

“आदिवासी मुख्यमंत्री के राज्य में भी यदि आदिवासी अपनी जमीन बचाने के लिए दर-दर भटक रहा है, तो यह पूरे झारखंड के लिए चिंता का विषय”

रांची/सिल्ली : झारखंड की पहचान केवल खनिज संपदा, जंगल और पहाड़ों से नहीं है, बल्कि यहां की मूल आत्मा आदिवासी समाज और उसकी जल-जंगल-जमीन से जुड़ी हुई है। जिस झारखंड आंदोलन की नींव आदिवासी अस्मिता, भूमि अधिकार और पहचान की रक्षा के लिए रखी गई थी, आज उसी राज्य में आदिवासी खतियानी जमीनों को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक व्यवस्था, ऑनलाइन भूमि रिकॉर्ड प्रणाली, सीएनटी एक्ट की प्रभावशीलता और आदिवासी सुरक्षा पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।

रांची जिले के सिल्ली प्रखंड अंतर्गत हाकेदाग मौजा में लगभग 53 एकड़ से अधिक खतियानी भूमि को लेकर उठे विवाद ने अब बड़ा रूप ले लिया है। ग्राम हाकेदाग निवासी शम्भुराम बेदिया ने सिल्ली अंचलाधिकारी को एक विस्तृत आपत्ति-पत्र सौंपते हुए आरोप लगाया है कि अनुसूचित जनजाति वर्ग से आने वाली बेदिया जाति की सीएनटी संरक्षित जमीन को ऑनलाइन रिकॉर्ड में कथित रूप से “कुर्मी” जाति के रूप में दर्ज कर दिया गया, ताकि आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासी श्रेणी में दिखाकर उसकी खरीद-बिक्री आसान बनाई जा सके।

आवेदनकर्ता ने इसे केवल रिकॉर्ड त्रुटि नहीं बल्कि “सुनियोजित भूमि षड्यंत्र” बताया है। उनका आरोप है कि भू-माफियाओं और कुछ सरकारी अधिकारियों की कथित मिलीभगत से यह पूरा खेल खेला गया, जिसमें बिना वैध दस्तावेज, बिना रैयतों की सहमति और बिना कानूनी प्रक्रिया के ऑनलाइन पंजी-2 में बदलाव कर दिया गया।


क्या है पूरा मामला?

शम्भुराम बेदिया द्वारा सिल्ली अंचलाधिकारी को दिए गए विस्तृत आवेदन के अनुसार मौजा हाकेदाग, थाना नंबर-4 अंतर्गत खाता संख्या 63, 64, 65 एवं 116 की कुल लगभग 53 एकड़ 2 डिसमिल भूमि विवाद के केंद्र में है। आवेदनकर्ता का दावा है कि इनमें से लगभग 52 एकड़ 24 डिसमिल भूमि खतियानी आदिवासी रैयतों की पुश्तैनी जमीन है, जो छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) के अंतर्गत संरक्षित है।

उन्होंने कहा कि बेदिया जाति अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में आती है और इस कारण उनकी भूमि पर विशेष कानूनी सुरक्षा लागू होती है। लेकिन कथित रूप से ऑनलाइन रिकॉर्ड में छेड़छाड़ कर बेदिया जाति को “कुर्मी” दिखा दिया गया, जिससे भूमि को सामान्य श्रेणी की जमीन के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।

आवेदनकर्ता का कहना है कि यदि यह आरोप सही साबित होता है, तो यह केवल रिकॉर्ड त्रुटि नहीं बल्कि आदिवासी भूमि सुरक्षा कानूनों को कमजोर करने की बेहद खतरनाक साजिश मानी जाएगी।

पहले जाति बदली, फिर जमीन की प्रकृति बदली — गंभीर आरोप

शम्भुराम बेदिया ने आरोप लगाया कि ऑनलाइन भूमि रिकॉर्ड में जानबूझकर जातीय पहचान में बदलाव किया गया। उनका कहना है कि किसी भी खतियानी रैयत की जाति बदलना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि संवैधानिक और कानूनी विषय है।

उन्होंने सवाल उठाया कि—

  • आखिर किस अधिकारी के आदेश से बेदिया जाति को “कुर्मी” दर्ज किया गया?
  • क्या इसके लिए कोई सक्षम न्यायिक या प्रशासनिक आदेश मौजूद है?
  • क्या संबंधित रैयतों को इसकी जानकारी दी गई?
  • क्या ग्रामसभा या राजस्व अभिलेखों का सत्यापन हुआ?
  • और यदि कोई आदेश नहीं है, तो यह बदलाव किसके दबाव में किया गया?

ग्रामीणों का कहना है कि यदि आदिवासी जाति को रिकॉर्ड में बदलकर सामान्य जाति दिखाया जाने लगे, तो आने वाले समय में पूरे झारखंड की आदिवासी जमीनें खतरे में पड़ सकती हैं।

CNT एक्ट की आत्मा पर हमला?

झारखंड में लागू छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम यानी CNT Act आदिवासी जमीनों की सुरक्षा के लिए बनाया गया था। यह कानून आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों के हाथों में जाने से रोकने के उद्देश्य से अस्तित्व में आया था।

इस कानून के तहत—

  • आदिवासी भूमि का हस्तांतरण अत्यंत सीमित परिस्थितियों में ही संभव है,
  • प्रशासनिक अनुमति अनिवार्य होती है,
  • और अवैध हस्तांतरण को निरस्त करने का प्रावधान भी मौजूद है।

लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि यदि रिकॉर्ड में ही आदिवासी की जाति बदल दी जाए, तो फिर सीएनटी एक्ट की सुरक्षा कैसे बचेगी?

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मामला केवल एक गांव या एक खाता संख्या का नहीं है, बल्कि यह झारखंड की भूमि सुरक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा हमला है।

ऑनलाइन पंजी-2 में दर्ज नामों पर उठे गंभीर सवाल

आपत्ति-पत्र में कई ऐसे व्यक्तियों के नामों का उल्लेख किया गया है जिनके नाम कथित रूप से ऑनलाइन पंजी-2 में दर्ज कर दिए गए हैं। आवेदनकर्ता ने पूछा है कि आखिर किन दस्तावेजों के आधार पर तुलसीदास महतो, राखाल मंडल, बुधराम महतो, दासुवा महतो, मनसू कमार, मोहन लाल मांझी, बुका महतो, जगरनाथ महतो, लसुवा मांझी, अकलू मांझी, लिलु मांझी, लाल मुंडा, अघनु मांझी और धरमनाथ मांझी समेत अन्य लोगों के नाम ऑनलाइन रिकॉर्ड में जोड़े गए।

उन्होंने मांग की है कि—

  • सभी भू-अभिलेख सार्वजनिक किए जाएं,
  • नाम दर्ज होने की तिथि बताई जाए,
  • नामांतरण आदेश की प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराई जाए,
  • संबंधित म्यूटेशन फाइल सार्वजनिक की जाए,
  • और रिकॉर्ड संशोधन की प्रक्रिया की न्यायिक जांच कराई जाए।

“राजस्व हमसे लिया जा रहा, लेकिन रिकॉर्ड किसी और के नाम”

शम्भुराम बेदिया ने अपने आवेदन में एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। उनका कहना है कि खतियानी रैयत वर्षों से नियमित रूप से ऑनलाइन राजस्व रसीद कटवा रहे हैं। यदि जमीन वास्तव में किसी अन्य व्यक्ति की है, तो फिर प्रशासन खतियानी रैयतों से राजस्व क्यों ले रहा है?

उन्होंने कहा कि— “एक तरफ सरकार हमसे लगान और राजस्व ले रही है, दूसरी तरफ ऑनलाइन रिकॉर्ड में किसी और का नाम दिखाया जा रहा है। आखिर यह दोहरी व्यवस्था किसके हित में काम कर रही है?”

यह सवाल अब पूरे भूमि प्रशासन की पारदर्शिता पर गंभीर बहस खड़ा कर रहा है।

“बिना जानकारी के जमीन बेचने की तैयारी”

आवेदनकर्ता ने आरोप लगाया है कि बिना किसी वैध कानूनी सूचना, बिना सुनवाई और बिना खतियानी रैयतों की सहमति के जमीन की खरीद-बिक्री की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

उन्होंने इसे “भूमि लूट की संगठित साजिश” बताते हुए कहा कि—

  • न कोई नोटिस दिया गया,
  • न ग्रामसभा की सहमति ली गई,
  • न रैयतों को सुनवाई का अवसर मिला,
  • और न ही रिकॉर्ड परिवर्तन की जानकारी दी गई।

इसके बावजूद ऑनलाइन अभिलेखों में बदलाव कर दिए गए और अब जमीन हस्तांतरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।

आदिवासी मुख्यमंत्री के राज्य में भी असुरक्षित आदिवासी जमीन?

यह मामला अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बनता जा रहा है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि झारखंड एक आदिवासी राज्य है और वर्तमान में राज्य का नेतृत्व भी एक आदिवासी मुख्यमंत्री के हाथों में है। इसके बावजूद यदि आदिवासी अपनी पुश्तैनी जमीन बचाने के लिए दर-दर भटक रहा है, तो यह बेहद गंभीर स्थिति है।

ग्रामीणों का कहना है कि— “जिस राज्य का निर्माण आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ, उसी राज्य में यदि आदिवासी अपनी जमीन बचाने के लिए अधिकारियों के चक्कर काटे और उसकी सुनवाई तक न हो, तो फिर आम आदिवासी किस पर भरोसा करे?”

लोगों का आरोप है कि भू-माफियाओं का नेटवर्क इतना मजबूत हो चुका है कि गरीब ग्रामीणों की आवाज प्रशासन तक पहुंच ही नहीं पा रही।

झारखंड में बढ़ती भूमि माफिया गतिविधियों पर चिंता

ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि झारखंड में पिछले कुछ वर्षों में ऑनलाइन भूमि रिकॉर्ड में छेड़छाड़ की शिकायतें लगातार बढ़ी हैं।

आरोप लगते रहे हैं कि—

  • वास्तविक रैयतों के नाम हटाए जा रहे हैं,
  • बाहरी लोगों के नाम जोड़े जा रहे हैं,
  • फर्जी दस्तावेजों के आधार पर म्यूटेशन हो रहे हैं,
  • और डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया का दुरुपयोग कर जमीनों पर कब्जे की कोशिश की जा रही है।

हाकेदाग का मामला अब इन्हीं आरोपों का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है।

“यह केवल जमीन नहीं, आदिवासी अस्तित्व का सवाल”

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि आदिवासी समाज के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं होती। यही उनकी पहचान, संस्कृति, इतिहास और अस्तित्व का आधार है।

एक ग्रामीण ने कहा— “आदिवासी से उसकी जमीन छीन लेना मतलब उसकी पूरी पीढ़ी का भविष्य छीन लेना है।”

लोगों का कहना है कि यदि आज रिकॉर्ड में जाति बदलकर जमीनें हस्तांतरित की जाने लगीं, तो आने वाले वर्षों में झारखंड के आदिवासी गांवों का सामाजिक स्वरूप ही बदल जाएगा।

उच्चस्तरीय जांच और कार्रवाई की मांग तेज

ग्रामीणों ने मांग की है कि—

  • पूरे मामले की न्यायिक या सीबीआई जांच हो,
  • मूल खतियान और ऑनलाइन रिकॉर्ड का मिलान कराया जाए,
  • रिकॉर्ड बदलने वाले अधिकारियों की पहचान की जाए,
  • दोषियों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज हो,
  • सीएनटी एक्ट उल्लंघन की जांच हो,
  • और खतियानी रैयतों को सुरक्षा प्रदान की जाए।

सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि इस मामले में निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह राज्यभर में आदिवासी भूमि सुरक्षा को लेकर बड़ा आंदोलन बन सकता है।

न्यायालय जाने की चेतावनी

शम्भुराम बेदिया ने अपने आवेदन में स्पष्ट कहा है कि यदि छह माह के भीतर दस्तावेजी साक्ष्यों सहित जवाब नहीं दिया गया, तो वे व्यवहार न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ऐसे मामलों में शिकायतकर्ताओं को अक्सर झूठे मुकदमों में फंसाने या प्रताड़ित करने की कोशिश की जाती है। इसलिए उन्होंने प्रशासन से सुरक्षा की मांग भी की है।

उन्होंने कहा कि यदि भविष्य में उनके साथ कोई अप्रिय घटना होती है, तो इसके लिए वे उन लोगों को जिम्मेदार मानेंगे जो कथित रूप से उनकी खतियानी जमीन हड़पने की कोशिश कर रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल — आखिर आदिवासियों की जमीन बचाएगा कौन?

आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर झारखंड में आदिवासियों की जमीन सुरक्षित कैसे रहेगी? यदि रिकॉर्ड ही बदले जाने लगें, यदि जातीय पहचान तक बदल दी जाए, यदि भू-माफियाओं और सिस्टम की मिलीभगत के आरोप लगने लगें, तो फिर आदिवासी समाज अपने अधिकारों की रक्षा किससे उम्मीद करे?

यह मामला केवल हाकेदाग गांव का नहीं है। यह झारखंड की आत्मा, आदिवासी अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।

अब सबकी निगाहें सिल्ली अंचल प्रशासन और राज्य सरकार पर टिकी हैं कि वे इस गंभीर मामले में क्या कदम उठाते हैं। क्या निष्पक्ष जांच होगी? क्या रिकॉर्ड में कथित छेड़छाड़ का सच सामने आएगा? क्या आदिवासी रैयतों को न्याय मिलेगा? या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

झारखंड की जनता अब इन सवालों के जवाब चाहती है।

53 एकड़ से अधिक खतियानी आदिवासी भूमि पर कथित कब्जे और रिकॉर्ड छेड़छाड़ का गंभीर आरोप, सिल्ली अंचल कार्यालय को भेजा गया विस्तृत आपत्ति-पत्र 53 एकड़ से अधिक खतियानी आदिवासी भूमि पर कथित कब्जे और रिकॉर्ड छेड़छाड़ का गंभीर आरोप, सिल्ली अंचल कार्यालय को भेजा गया विस्तृत आपत्ति-पत्र Reviewed by PSA Live News on 11:18:00 pm Rating: 5

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