रांची। झारखंड की राजधानी रांची में मारवाड़ी एवं राजस्थानी समाज द्वारा मनाया जाने वाला पारंपरिक और सांस्कृतिक महत्व का पर्व गणगौर महोत्सव इस वर्ष भी पूरे हर्षोल्लास, श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ। शहर का वातावरण दिनभर भक्ति, रंग और परंपरा के विविध रंगों से सराबोर रहा।
सुबह से ही महिलाओं में इस पर्व को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिला। सुहागिन महिलाओं एवं युवतियों ने अपने-अपने घरों में पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार माता गणगौर (माता पार्वती) और भगवान शिव की पूजा-अर्चना की। महिलाएं रंग-बिरंगे राजस्थानी परिधानों—लहंगा, ओढ़नी और पारंपरिक आभूषणों से सुसज्जित होकर पूरी श्रद्धा के साथ पूजा में शामिल हुईं। घर-घर में पारंपरिक मंगल गीतों की मधुर गूंज सुनाई दी, जिससे माहौल पूरी तरह भक्तिमय बना रहा।
इस अवसर पर विवाहित महिलाओं ने अपने पति की लंबी आयु, परिवार की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना की, वहीं अविवाहित युवतियों ने योग्य और मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए माता गणगौर से प्रार्थना की। यह पर्व विशेष रूप से महिलाओं की आस्था, सौभाग्य और पारिवारिक समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
संध्या समय शहर के विभिन्न तालाबों और जलाशयों के किनारे श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। पारंपरिक लोकगीतों, ढोल-नगाड़ों और नृत्य के बीच विधिपूर्वक गणगौर की प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया। इस दौरान पूरा वातावरण सांस्कृतिक रंगों और धार्मिक उल्लास से ओत-प्रोत नजर आया। महिलाओं के समूहों ने एकजुट होकर लोकगीत गाए और नृत्य प्रस्तुत कर इस पर्व को और भी जीवंत बना दिया।
झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री सह प्रवक्ता संजय सर्राफ ने इस अवसर पर कहा कि गणगौर महोत्सव केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि यह राजस्थानी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का अवसर मिलता है, जो समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है।
कुल मिलाकर, रांची सहित पूरे झारखंड में गणगौर महोत्सव श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। इस पर्व ने न केवल सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित किया, बल्कि सामाजिक समरसता और परंपराओं के संरक्षण का संदेश भी दिया, जिससे शहर का सांस्कृतिक परिवेश और अधिक समृद्ध हुआ।
Reviewed by PSA Live News
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7:13:00 pm
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