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बिहार का सियासी शादी-विवाह: बारात भगवा, दूल्हा समाजवादी और ‘पंडित’ नीतीश!

लेखक : अशोक कुमार झा।


बिहार की राजनीति को अगर आप समझना चाहते हैं, तो उसे सीधे-सीधे ‘राजनीति’ मत समझिए—उसे एक देसी शादी की तरह देखिए। यहाँ बारात निकलती है बड़े ठाठ से, बैंड-बाजा बजता है, घोड़ी सजती है, लेकिन आखिरी वक्त पर दूल्हा बदल जाए तो किसी को हैरानी नहीं होती।

इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। जाते-जाते नितीश कुमार ऐसा ‘रिटर्न गिफ्ट’ दे गए हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  के गलियारों से लेकर भाजपा दफ्तरों तक हलचल मची हुई है।

बारात निकली थी बड़े अरमानों के साथ…

भाजपा के कार्यकर्ता इस बार कुछ ज्यादा ही उत्साहित थे। सोचिए—सालों का संघर्ष, संगठन की मेहनत, और अब मौका आया था कि बिहार में ‘पूरी तरह’ अपना मुख्यमंत्री बने। 

बैंड-बाजा तैयार, घोड़ी सजी हुई, बाराती नाचते-गाते आगे बढ़ रहे थे। पीछे से आवाज आ रही थी— “इस बार दूल्हा अपना होगा!” लेकिन बिहार है साहब… यहाँ कहानी सीधी कहाँ चलती है!

मंडप सजा, और दूल्हा बदल गया!

जैसे ही सब कुछ तय होने लगा, अचानक से सियासत के ‘पंडित’ नितीश कुमार ने ऐसा मंत्र पढ़ा कि पूरा खेल ही बदल गया। जो कुर्सी ‘विचारधारा’ के लिए सजाई गई थी, उस पर बैठा ऐसा चेहरा— जो कभी शाखा नहीं गया, जिसने ‘नमस्ते सदा वत्सले’ नहीं गाया और जो भाजपा का प्राथमिक सदस्य तक नहीं रहा । यानी बारात पूरी तरह भगवा, और दूल्हा ‘समाजवादी पाठशाला’ का निकला !

तेजस्वी की मुस्कान: “खेल तो हमने ही जीता है”

इस पूरे सियासी विवाह में अगर कोई सबसे ज्यादा ‘एंटरटेन’ हो रहा है, तो वह हैं तेजस्वी यादव । उनकी मुस्कान किसी फिल्म के उस सीन जैसी है, जहाँ हीरो कुछ नहीं करता, लेकिन विलेन खुद ही हार जाता है।

बगल में बैठकर उनका मंद-मंद मुस्कुराना मानो कह रहा हो— “आप लोग शादी की तैयारी करते रहिए, दूल्हा हमारा ही निकलेगा!” 

और कहीं न कहीं इस कहानी की जड़ें लालू प्रसाद यादव की उसी पुरानी ‘समाजवादी पाठशाला’ में मिलती हैं, जहाँ राजनीति किताबों से नहीं, अनुभव और चाल से सिखाई जाती है।

विजय सिन्हा का चेहरा: किताब से ज्यादा सच्चा

अगर इस पूरे घटनाक्रम को समझना है, तो भाषण मत सुनिए—चेहरे पढ़िए। आज विजय सिन्हा के चेहरे की लकीरें वह सच्चाई बयान कर रही हैं, जिसे शब्दों में कहना मुश्किल है। वह भाव कुछ ऐसा है जैसे— “सवाल हमने बनाया था, लेकिन जवाब कोई और लिख गया!”

चाणक्य भी चूक गए?

राजनीति के इस ‘ड्रामे’ का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यह सब उन लोगों के सामने हुआ, जिन्हें रणनीति का मास्टर माना जाता है। यानि बी एल  संतोष और शिवराज सिंह चौहान जैसे दिग्गज मौजूद वहां थे, लेकिन खेल फिर भी हाथ से निकल गया।

अब सवाल उठता है— क्या यह चूक थी? या फिर यह बिहार की राजनीति का वह ‘लेवल’ है जहाँ पुराने फॉर्मूले काम ही नहीं करते?

नीतीश: सियासत के ‘मैकेनिकल इंजीनियर’

नितीश कुमार को अगर राजनीति का ‘मैकेनिकल इंजीनियर’ कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। वे समीकरण ऐसे जोड़ते हैं जैसे कोई मशीन का पुर्जा फिट कर रहा हो— जहाँ जरूरत हो, वहीं फिट कर दिया, चाहे वह पुर्जा कंपनी का हो या बाहर से आया हो। उनका फॉर्मूला बड़ा सीधा है— “सत्ता में बने रहो, और बाकी सबको व्यस्त रखो।”

भाजपा कार्यकर्ताओं की हालत: ‘हम नाचे, कोई और ले गया सेहरा’

आज हालात कुछ ऐसे हैं कि भाजपा के कार्यकर्ता खुद ही मजाक का विषय बन गए हैं। सोचिए—नाचे-गाए आप, लड्डू आपने बाँटे और सेहरा कोई और पहन गया! यह वही स्थिति है जब दिल से सिर्फ एक ही गीत निकलता है— “दिल के अरमां आंसुओं में बह गए…”

बिहार: जहाँ राजनीति नहीं, ‘कला’ होती है

बिहार की राजनीति को समझने के लिए आपको यह मानना पड़ेगा कि यह सिर्फ सत्ता का खेल नहीं है—यह एक कला है। यहाँ दुश्मन दोस्त बनता है, दोस्त दुश्मन बनता है और अंत में जो सबसे ज्यादा मुस्कुराता है, वही असली खिलाड़ी होता है

अगर इस पूरे घटनाक्रम को एक लाइन में समझना हो, तो बस इतना समझ लीजिए— “बारात पूरी तैयारी में थी, घोड़ी भी सज चुकी थी, लेकिन आखिरी वक्त पर पंडित जी ने मंत्र बदल दिया… और दूल्हा कोई और बन गया!”

और यही बिहार है— जहाँ राजनीति नहीं, सियासी ‘कॉमेडी ऑफ एरर्स’ चलती है… जिसमें हर बार दर्शक बदलते हैं, लेकिन कहानी हमेशा नई लगती है।

बिहार का सियासी शादी-विवाह: बारात भगवा, दूल्हा समाजवादी और ‘पंडित’ नीतीश! बिहार का सियासी शादी-विवाह: बारात भगवा, दूल्हा समाजवादी और ‘पंडित’ नीतीश! Reviewed by PSA Live News on 9:09:00 pm Rating: 5

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