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स्वच्छता के पैसों से अफसरों की ऐश!

हजारीबाग में स्वच्छ भारत मिशन फंड पर सवाल, ग्रामीण विकास की राशि से वीआईपी संस्कृति चलाने के आरोप

 


हजारीबाग 
संवाददाता। जिस धनराशि का उद्देश्य गांवों को खुले में शौच से मुक्त बनाना, स्वच्छता जागरूकता फैलाना, ग्रामीण क्षेत्रों में साफ-सफाई की बेहतर व्यवस्था विकसित करना और आम लोगों के जीवन स्तर को सुधारना था, उसी सरकारी राशि से यदि अफसरों के आवास चमकाए जाएं, वीआईपी स्वागत-सत्कार किए जाएं, महंगे भोजन पर खर्च हो और दफ्तरों में सुविधाओं का विस्तार किया जाए, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि सरकारी योजनाओं की आत्मा के साथ खिलवाड़ माना जाएगा।

हजारीबाग के पेयजल एवं स्वच्छता प्रमंडल में सामने आए कथित वित्तीय दुरुपयोग के मामले ने पूरे विभागीय तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) यानी एसबीएम (जी) की राशि के इस्तेमाल को लेकर जो दस्तावेज और जानकारियां सामने आई हैं, वे यह संकेत देती हैं कि सरकारी योजनाओं की रकम को ग्रामीण हितों की बजाय अधिकारियों की सुविधाओं और विभागीय दिखावे पर खर्च किया गया।

गांवों के शौचालय अधूरे, अफसरों के आवास चमकते रहे

आरोप है कि जिन पैसों से गांवों में शौचालय निर्माण, स्वच्छता अभियान, कचरा प्रबंधन और जनजागरूकता कार्यक्रम चलने थे, उसी राशि से अधीक्षण अभियंता, कार्यपालक अभियंता और सहायक अभियंता के सरकारी आवासों की साफ-सफाई पर हजारों रुपये खर्च किए गए।

स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों के नाम पर आवासों की विशेष सफाई और रखरखाव के लिए भुगतान किए जाने की बात सामने आई है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या राष्ट्रीय पर्व मनाने का अर्थ अधिकारियों के सरकारी आवासों को चमकाना था?

ग्रामीण इलाकों में आज भी कई पंचायतों में पेयजल और स्वच्छता की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। कई गांवों में शौचालय अधूरे पड़े हैं, कहीं पानी की उपलब्धता नहीं है, तो कहीं जागरूकता अभियान केवल कागजों तक सीमित हैं। ऐसे में मिशन की राशि का इस प्रकार उपयोग जनता के बीच गंभीर नाराजगी पैदा कर रहा है।

आरओ, सीसीटीवी और वीआईपी दावतों पर खर्च

दस्तावेजों के अनुसार अधीक्षण अभियंता कार्यालय में केंट आरओ लगाने, सीसीटीवी कैमरे लगाने, बिजली मरम्मत कराने और अन्य सुविधाओं के विस्तार पर भी एसबीएम (जी) फंड का उपयोग किया गया।

इतना ही नहीं, विभागीय अधिकारियों के विदाई समारोह, विशेष बैठकों और मंत्री भ्रमण के दौरान भोजन एवं स्वागत-सत्कार पर भी भारी राशि खर्च होने के आरोप हैं।

सूत्रों के मुताबिक कुछ बैठकों में भोजन पर 500 रुपये प्रति प्लेट तक खर्च किया गया। जबकि कोविड काल के दौरान सरकार लगातार सादगी और सीमित कार्यक्रमों पर जोर दे रही थी।

जनता पूछ रही है कि क्या ग्रामीण स्वच्छता मिशन का उद्देश्य अधिकारियों के लिए “फाइव स्टार सुविधा मॉडल” तैयार करना था?

कोविड काल में भी चलती रही बैठकें और कार्यशालाएं

मामले का सबसे संवेदनशील पक्ष यह है कि यह कथित अनियमितताएं उस समय हुईं, जब पूरा देश कोविड महामारी से जूझ रहा था। सरकार की ओर से फिजिकल बैठकों, कार्यशालाओं और सामूहिक आयोजनों को सीमित करने के निर्देश जारी थे।

लेकिन आरोप है कि विभाग में लगातार बैठकें आयोजित होती रहीं, कार्यशालाएं चलती रहीं और इन आयोजनों पर सरकारी राशि खर्च होती रही।

यह सवाल भी उठ रहा है कि जब आम लोग महामारी में आर्थिक संकट झेल रहे थे, तब सरकारी विभागों में भोज और आयोजन किस नैतिक आधार पर किए जा रहे थे?

जल जीवन मिशन के कार्यों में भी एसबीएम फंड इस्तेमाल करने के आरोप

जांच और दस्तावेजों में यह भी सामने आया है कि जल जीवन मिशन (जेजेएम) से जुड़े कार्यों के लिए भी एसबीएम (जी) की राशि का उपयोग किया गया।

यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि योजनागत नियमों का सीधा उल्लंघन माना जाएगा। क्योंकि प्रत्येक योजना की राशि का उपयोग निर्धारित मदों में ही किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि योजनाओं के फंड का इस प्रकार मिश्रित उपयोग वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता दोनों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

निविदा प्रक्रिया और अनुमति पर भी सवाल

सूत्रों के अनुसार कई खर्च ऐसे हैं जिनमें न तो विधिवत निविदा प्रक्रिया अपनाई गई और न ही वरीय अधिकारियों से आवश्यक स्वीकृति ली गई।

यदि यह तथ्य जांच में प्रमाणित होते हैं, तो विभागीय अधिकारियों पर वित्तीय नियमों के उल्लंघन, शक्ति के दुरुपयोग और सरकारी धन के अनुचित उपयोग जैसे गंभीर आरोप बन सकते हैं।

वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए प्रत्येक भुगतान, निविदा और स्वीकृति की स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित होती है। लेकिन यदि इन्हें दरकिनार किया गया, तो यह सुनियोजित अनियमितता का मामला बन सकता है।

“मिशन” से “मौज-मस्ती” तक?

स्वच्छ भारत मिशन को कभी ग्रामीण बदलाव की सबसे बड़ी योजनाओं में गिना गया था। इसका उद्देश्य केवल शौचालय बनाना नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन में स्वच्छता की संस्कृति विकसित करना था।

लेकिन हजारीबाग से सामने आए आरोपों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी मिशनों को कुछ अधिकारियों ने व्यक्तिगत सुविधा और विभागीय ऐशो-आराम का माध्यम बना दिया?

ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि योजनाओं की राशि इसी प्रकार खर्च होती रही, तो गांवों तक विकास कभी नहीं पहुंचेगा।

“2021 की संस्कृति आज भी हावी”

विभागीय सूत्रों का दावा है कि कोविड काल के दौरान जिस प्रकार की कार्यशैली विकसित हुई थी, उसकी छाया आज भी विभाग में दिखाई देती है।

सूत्रों का कहना है कि “फाइलों में विकास और जमीन पर खर्च” की संस्कृति ने सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया है।

जनता पूछ रही — जिम्मेदार कौन?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि यह पूरा मामला सही है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

क्या केवल निचले स्तर के कर्मियों पर कार्रवाई होगी या फिर उन अधिकारियों तक भी जांच पहुंचेगी जिनके कार्यकाल में यह खर्च हुए?

क्या सरकार इस मामले में उच्चस्तरीय जांच कराएगी?
क्या स्वच्छ भारत मिशन की राशि का ऑडिट होगा?
क्या दोषियों से राशि की वसूली होगी?

ये सवाल अब केवल हजारीबाग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था और सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर सवाल बन चुके हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि स्वच्छता मिशन की राशि भी सुरक्षित नहीं है, तो फिर गांवों के विकास की उम्मीद किससे की जाए?

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