सरकारी स्कूल की पीजीटी शिक्षिका ने शिक्षा को बनाया सेवा का मिशन, स्कूल के बाद भी 30 बच्चों को दे रही हैं निःशुल्क शिक्षा
हरियाणा, हिसार | राजेश सलूजा
आज जब शिक्षा व्यवस्था को लेकर देशभर में लगातार बहस चल रही है और निजी शिक्षा का दायरा बढ़ता जा रहा है, ऐसे समय में हरियाणा की एक सरकारी विद्यालय की शिक्षिका समाज के सामने सेवा, समर्पण और मानवता की ऐसी मिसाल पेश कर रही हैं, जिसने यह साबित कर दिया है कि यदि शिक्षक ठान ले तो वह केवल विद्यार्थियों का भविष्य ही नहीं, बल्कि पूरे समाज की दिशा बदल सकता है।
जींद जिले के उमरा गाँव की रहने वाली सुमन मलिक आज हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। सुमन मलिक, जय सिंह मलिक की सुपुत्री हैं और उनकी शादी खेड़ड़ गाँव निवासी सुभाष सहारण के साथ हुई। वर्तमान में वह सरसौद गाँव के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में पीजीटी इतिहास के पद पर कार्यरत हैं।
लेकिन सुमन मलिक की पहचान केवल एक सरकारी शिक्षिका तक सीमित नहीं है। वह उन बच्चों के लिए “उम्मीद की किरण” बन चुकी हैं, जिनके जीवन में कभी स्कूल, किताब और शिक्षा का कोई स्थान नहीं था।
विद्यालय के बाद शुरू होता है सेवा का दूसरा अध्याय
दिनभर विद्यालय में विद्यार्थियों को इतिहास पढ़ाने के बाद अधिकांश लोग अपने घर लौट जाते हैं, लेकिन सुमन मलिक का असली मिशन तब शुरू होता है। विद्यालय समय समाप्त होने के बाद वह सरसौद गाँव से बालक गाँव की ओर जाने वाली सड़क पर स्थित एक ईंट-भट्टे पर पहुंचती हैं, जहां मजदूर परिवारों के 25 से 30 बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देती हैं।
ये बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं, जिनके लिए दो वक्त की रोटी जुटाना ही सबसे बड़ी चुनौती है। पढ़ाई-लिखाई उनके जीवन में कभी प्राथमिकता नहीं रही। लेकिन सुमन मलिक ने इन बच्चों की जिंदगी में शिक्षा का दीप जलाने का संकल्प लिया।
भट्टे पर रहने वाले ये बच्चे प्रतिदिन अपनी “मैडम” का बेसब्री से इंतजार करते हैं। जैसे ही सुमन वहां पहुंचती हैं, बच्चों के चेहरे खिल उठते हैं। कोई किताब लेकर दौड़ता है, कोई कॉपी दिखाता है और कोई नई सीखी हुई कविता सुनाने लगता है।
शुरुआत आसान नहीं थी
सुमन मलिक बताती हैं कि शुरुआत में इन बच्चों को पढ़ाना बेहद चुनौतीपूर्ण था। अधिकांश बच्चे अक्षरों से भी परिचित नहीं थे। कुछ बच्चों ने कभी पेंसिल तक नहीं पकड़ी थी। भाषा, अनुशासन और नियमितता जैसी कई समस्याएं सामने थीं।
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने धीरे-धीरे बच्चों को अक्षर ज्ञान से शुरुआत करवाई। खेल-खेल में पढ़ाना शुरू किया। कहानियों, चित्रों और सामान्य ज्ञान के माध्यम से बच्चों में सीखने की रुचि विकसित की।
आज स्थिति यह है कि वही बच्चे अब पढ़ाई में रुचि लेने लगे हैं, नियमित रूप से पढ़ने आते हैं और अपने भविष्य के सपने देखने लगे हैं।
केवल शिक्षा नहीं, भोजन और सामग्री की भी व्यवस्था
सुमन मलिक का कार्य केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं है। वह प्रतिदिन अपने घर से बच्चों के लिए भोजन बनाकर भी लाती हैं। कई बार ये बच्चे भूखे पेट पढ़ने आते हैं। ऐसे में सुमन का मानना है कि खाली पेट शिक्षा संभव नहीं है।
वह अपने सहयोगियों और मित्रों की मदद से बच्चों को कॉपी, किताबें, पेंसिल, रबर और अन्य शैक्षणिक सामग्री भी उपलब्ध करवाती हैं।
उनकी इस पहल में उनके परिवार, पति और उनकी मित्र सुनीता का भी विशेष योगदान है। परिवार के सहयोग के बिना इस प्रकार का सामाजिक कार्य संभव नहीं हो सकता।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी कर रही हैं तैयार
सरकारी विद्यालय में सुमन मलिक केवल इतिहास विषय तक सीमित नहीं रहतीं। वह विद्यार्थियों को भूगोल, राजनीतिक विज्ञान और हरियाणा सामान्य ज्ञान भी पढ़ाती हैं ताकि ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में भी आगे बढ़ सकें।
उनका मानना है कि ग्रामीण प्रतिभाओं में किसी प्रकार की कमी नहीं होती, जरूरत केवल सही मार्गदर्शन और अवसर की होती है।
समाज के लिए प्रेरणा बनीं सुमन मलिक
आज जब कई लोग शिक्षा को केवल नौकरी और वेतन तक सीमित मानते हैं, ऐसे समय में सुमन मलिक जैसी शिक्षिकाएं यह साबित कर रही हैं कि शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला कर्मचारी नहीं, बल्कि समाज निर्माण का सबसे बड़ा आधार होता है।
उनकी यह पहल केवल शिक्षा अभियान नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत है। ईंट-भट्टों पर काम करने वाले मजदूरों के बच्चों के लिए शिक्षा का सपना देखना और उसे साकार करना किसी मिशन से कम नहीं।
स्थानीय लोग भी सुमन मलिक के कार्य की जमकर सराहना कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समाज में ऐसे शिक्षक बढ़ें तो कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित नहीं रहेगा।
सरकार और समाज को आगे आना होगा
विशेषज्ञों का मानना है कि देशभर में ऐसे हजारों बच्चे हैं जो आर्थिक और सामाजिक कारणों से शिक्षा से दूर हैं। यदि सरकारी और सामाजिक स्तर पर सुमन मलिक जैसे प्रयासों को समर्थन मिले तो शिक्षा का वास्तविक अधिकार अंतिम पंक्ति तक पहुंच सकता है।
सुमन मलिक की यह कहानी केवल एक शिक्षिका की नहीं, बल्कि उस सोच की कहानी है जो मानती है कि “शिक्षा सबसे बड़ा परिवर्तन है।”
वास्तव में, सुमन मलिक आज उन मासूम बच्चों के जीवन में सिर्फ एक शिक्षिका नहीं, बल्कि भविष्य की नई रोशनी बन चुकी हैं।
Reviewed by PSA Live News
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9:36:00 pm
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