कलम की ताकत को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। पत्रकार वह चेहरा होता है जो सत्ता से सवाल करता है, जनता की आवाज़ उठाता है, भ्रष्टाचार को उजागर करता है, अपराध के पीछे छिपे सच को सामने लाता है और समाज को आईना दिखाने का काम करता है। लेकिन विडंबना यह है कि जो व्यक्ति हर दिन दूसरों के दुख-दर्द, संघर्ष, शोषण और अन्याय की खबर दुनिया तक पहुंचाता है, उसकी अपनी जिंदगी के संघर्षों की खबर शायद ही कोई रखता है।
आज का पत्रकार सिर्फ खबर नहीं लिखता, वह जोखिम उठाता है। वह कभी दंगों के बीच खड़ा होता है, कभी बाढ़ और आपदा में जान जोखिम में डालकर रिपोर्टिंग करता है, कभी माफियाओं और अपराधियों के खिलाफ सच दिखाने के कारण धमकियां झेलता है। लेकिन जब वही पत्रकार मानसिक तनाव, आर्थिक संकट, सामाजिक उपेक्षा और संस्थागत शोषण से टूटने लगता है, तब उसके लिए खड़े होने वाले लोग बहुत कम दिखाई देते हैं।
पत्रकारिता: मिशन से मजबूरी तक
एक दौर था जब पत्रकारिता को मिशन माना जाता था। पत्रकार समाज परिवर्तन का माध्यम होता था। उसकी कलम में जनता का दर्द और राष्ट्रहित की चेतना होती थी। लेकिन समय के साथ पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदला। बड़े मीडिया संस्थान कॉरपोरेट प्रभाव में आने लगे, टीआरपी और क्लिक की दौड़ शुरू हुई, और धीरे-धीरे पत्रकारिता का मानवीय पक्ष कमजोर पड़ता गया।
आज छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में काम करने वाले हजारों पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें न नियमित वेतन मिलता है, न बीमा, न सुरक्षा और न ही कोई सामाजिक सम्मान। कई पत्रकार तो केवल पहचान पत्र और “प्रेस” लिखी गाड़ी के भरोसे दिन-रात काम कर रहे हैं। बड़ी खबरें वही लोग निकालते हैं, लेकिन पहचान किसी और को मिलती है।
ग्राउंड रिपोर्टिंग करने वाला पत्रकार अक्सर आर्थिक असुरक्षा में जीता है। पेट्रोल का खर्च खुद, कैमरा खुद, मोबाइल और इंटरनेट खुद, और ऊपर से यह दबाव कि खबर भी सबसे पहले और सबसे तेज होनी चाहिए। ऐसे में पत्रकार की जिंदगी लगातार तनाव, असुरक्षा और मानसिक थकान से भरती जा रही है।
सच दिखाने की कीमत
जब कोई पत्रकार भ्रष्टाचार की खबर करता है, तो सबसे पहले उस पर दबाव बनाया जाता है। कभी विज्ञापन रोकने की धमकी, कभी मुकदमे, कभी राजनीतिक दबाव, तो कभी सीधे जान से मारने तक की धमकी। हिंदुस्तान में कई पत्रकार ऐसे रहे जिन्होंने सच दिखाने की कीमत अपनी जान देकर चुकाई।
सबसे दुखद स्थिति तब होती है जब किसी पत्रकार पर हमला होता है और समाज कुछ दिनों की चर्चा के बाद उसे भूल जाता है। जिन पत्रकारों ने जनता की लड़ाई लड़ी, उनकी अपनी लड़ाई में अक्सर वे अकेले रह जाते हैं।
आज सोशल मीडिया ने भी पत्रकारों पर एक नया दबाव बना दिया है। हर खबर पर ट्रोलिंग, गालियां, चरित्र हनन और वैचारिक हमले आम बात हो चुकी है। यदि पत्रकार सत्ता से सवाल करे तो “देशद्रोही” कह दिया जाता है, और यदि विपक्ष से सवाल करे तो “भक्त”। निष्पक्ष पत्रकारिता का स्थान धीरे-धीरे वैचारिक युद्धभूमि में बदलता जा रहा है।
पत्रकार भी इंसान है
समाज अक्सर पत्रकार को केवल “मीडिया वाला” समझता है, लेकिन उसके पीछे भी एक परिवार होता है, जिम्मेदारियां होती हैं, सपने होते हैं और संघर्ष होते हैं। वह भी अपने बच्चों की पढ़ाई, घर का किराया, माता-पिता की दवाइयों और भविष्य की चिंता करता है। फर्क सिर्फ इतना है कि वह अपने दर्द को छिपाकर दूसरों के दर्द को दुनिया के सामने लाता रहता है।
कई पत्रकार अवसाद, चिंता और मानसिक दबाव से गुजरते हैं। लगातार नकारात्मक खबरों के बीच काम करना, हादसों और हिंसा को करीब से देखना, अस्थिर नौकरी और असुरक्षित भविष्य — यह सब किसी भी व्यक्ति को अंदर से तोड़ सकता है। लेकिन पत्रकारों के मानसिक स्वास्थ्य पर शायद ही कभी कोई चर्चा होती है।
लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब पत्रकार सुरक्षित होगा
यदि समाज को सच्ची और निर्भीक पत्रकारिता चाहिए, तो पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना होगा। पत्रकारों के लिए मजबूत सुरक्षा कानून, स्वास्थ्य बीमा, न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और स्वतंत्र कार्य वातावरण बेहद जरूरी है।
सरकारों को समझना होगा कि पत्रकार केवल खबर देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि लोकतंत्र की निगरानी करने वाला प्रहरी है। जिस दिन पत्रकार डरकर लिखने लगेगा, उस दिन लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ जाएगी।
मीडिया संस्थानों को भी आत्ममंथन करना होगा। केवल टीआरपी और मुनाफे की होड़ में पत्रकारों को “उपयोग की वस्तु” समझना खतरनाक है। जो व्यक्ति संस्थान के लिए दिन-रात काम करता है, उसे सम्मानजनक वेतन, सुरक्षा और मानसिक सहयोग मिलना चाहिए।
समाज को भी बदलनी होगी सोच
आम लोगों को भी यह समझना होगा कि पत्रकार केवल कैमरा लेकर घूमने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज और सत्ता के बीच एक सेतु है। यदि पत्रकार कमजोर होगा तो जनता की आवाज भी कमजोर हो जाएगी।
जब कोई पत्रकार सच लिखता है, तो वह केवल खबर नहीं लिख रहा होता, बल्कि समाज के भविष्य का दस्तावेज तैयार कर रहा होता है। इसलिए पत्रकारों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता जरूरी है।
आखिर में…
रात के अंधेरे में, थकी आंखों और टूटते मन के साथ जब एक पत्रकार अपनी खबर लिखता है, तब शायद उसके मन में भी यही सवाल उठता होगा—
“मैं तो सबकी खबर रखता हूं… लेकिन मेरी खबर कौन रखता है?”
यह सवाल केवल एक पत्रकार का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की आत्मा का सवाल है। क्योंकि जिस समाज में सच लिखने वाले अकेले पड़ जाएं, वहां धीरे-धीरे सच भी मरने लगता है।
Reviewed by PSA Live News
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9:33:00 pm
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