रांची, 1 मई: संतोष कुमार गंगवार ने झारखण्ड लोक सेवा आयोग (JPSC) द्वारा हाल में आयोजित महत्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं में सामने आई गंभीर त्रुटियों पर कड़ा रुख अपनाया है। राजभवन की ओर से आयोग के अध्यक्ष को पत्र भेजकर पूरे प्रकरण में तत्काल संज्ञान लेने, जांच कराने और जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा गया है।
राज्यपाल को प्राप्त सूचनाओं के अनुसार, सहायक वन संरक्षक मुख्य परीक्षा तथा सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के प्रश्नपत्रों में कई त्रुटियां पाई गई हैं। इतना ही नहीं, प्रारंभिक रूप से जारी उत्तर-कुंजी (Answer Key) में भी गलत उत्तरों की शिकायतें सामने आई हैं, जिससे अभ्यर्थियों में असंतोष और भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है।
परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल
राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने अपने निर्देश में स्पष्ट कहा है कि इस प्रकार की चूक न केवल अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि इससे पूरी परीक्षा प्रणाली की निष्पक्षता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगते हैं। उन्होंने इसे आयोग की साख के लिए भी अत्यंत चिंताजनक बताया।
विस्तृत जांच के निर्देश, दोषियों पर कार्रवाई तय
राजभवन द्वारा जारी पत्र में आयोग को निर्देशित किया गया है कि पूरे मामले की निष्पक्ष एवं गहन जांच कराई जाए, त्रुटियों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों/विशेषज्ञों की जवाबदेही तय की जाए, और दोषी पाए जाने पर संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
भविष्य के लिए सख्त सुधारात्मक कदम जरूरी
राज्यपाल ने यह भी कहा है कि भविष्य में इस तरह की त्रुटियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आयोग को अपनी परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार करने होंगे। इसमें प्रश्नपत्र निर्माण प्रक्रिया की बहुस्तरीय जांच, उत्तर-कुंजी जारी करने से पहले विशेषज्ञों द्वारा सत्यापन और तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर निगरानी तंत्र को मजबूत करना जैसे उपाय शामिल किए जाएं।
अभ्यर्थियों का भरोसा बहाल करना प्राथमिकता
राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने उम्मीद जताई कि झारखण्ड लोक सेवा आयोग पारदर्शिता और शुचिता के उच्च मानकों का पालन करते हुए परीक्षा संचालन करेगा, जिससे लाखों अभ्यर्थियों का भरोसा फिर से कायम हो सके।
JPSC परीक्षाओं में सामने आई गड़बड़ियों पर राजभवन की यह सख्ती स्पष्ट संकेत देती है कि अब परीक्षा प्रणाली में लापरवाही किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं की जाएगी। इससे जहां अभ्यर्थियों को न्याय मिलने की उम्मीद जगी है, वहीं आयोग पर सुधारात्मक कदम उठाने का दबाव भी बढ़ गया है।
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