बिहार विधान परिषद चुनाव में बड़ा खेल संभव! क्या उपेंद्र कुशवाहा के लिए बीजेपी चलाएगी ‘ऑपरेशन 10वीं सीट’? सफल हुआ तो विपक्ष को लग सकता है करारा झटका
पटना। बिहार विधान परिषद की 10 सीटों के चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां चरम पर पहुंच गई हैं। चुनावी गणित, विधायकों की संभावित क्रॉस वोटिंग और सत्ता-विपक्ष के बीच बढ़ती रणनीतिक लड़ाई ने इस चुनाव को सामान्य प्रक्रिया से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि क्या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे एवं बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने के लिए कोई बड़ा राजनीतिक ऑपरेशन चलाने जा रहा है?
विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसा हुआ और एनडीए अपने मिशन में सफल रहा तो इसका असर केवल एक विधान परिषद सीट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बिहार की पूरी विपक्षी राजनीति का समीकरण बदल सकता है। यहां तक कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर भी संकट खड़ा हो सकता है।
10 सीटों का चुनाव और 25 विधायकों का गणित
विधान परिषद की 10 सीटों के लिए होने वाले चुनाव में एक उम्मीदवार को जीत के लिए लगभग 25 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होगी। वर्तमान संख्या बल के आधार पर एनडीए के पास 9 सीटें जीतने के लिए पर्याप्त मत हैं। यही वजह है कि बीजेपी और जदयू ने चार-चार उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जबकि एक सीट लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के खाते में गई है।
लेकिन राजनीतिक चर्चा अब 10वीं सीट पर केंद्रित हो गई है। यह सीट विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बनती जा रही है।
दीपक प्रकाश के सामने संवैधानिक चुनौती
पूरे घटनाक्रम के केंद्र में बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश हैं। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार किसी भी व्यक्ति को मंत्री बनाए जाने के बाद छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना आवश्यक होता है। यदि वह निर्धारित अवधि में किसी सदन का सदस्य नहीं बन पाता है तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है।
दीपक प्रकाश के सामने भी यही स्थिति है। यदि वे इस चुनाव में विधान परिषद नहीं पहुंचते हैं तो उनका मंत्री पद संकट में पड़ सकता है। अगला विधान परिषद चुनाव दिसंबर में प्रस्तावित है, इसलिए उनके पास समय भी सीमित है।
जब इस विषय पर उपेंद्र कुशवाहा से सवाल पूछा गया तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "नामांकन में अभी समय है, इंतजार कीजिए। गणित हमको भी आता है।"
राजनीतिक जानकार इस बयान को सामान्य प्रतिक्रिया नहीं मान रहे हैं। उनके अनुसार कुशवाहा ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अंतिम समय में कोई बड़ा दांव खेला जा सकता है।
राजद बनाम एनडीए: सीधी टक्कर के आसार
सूत्रों के अनुसार यदि दीपक प्रकाश चुनाव मैदान में उतरते हैं तो उनका मुकाबला सीधे राष्ट्रीय जनता दल से होगा। महागठबंधन की ओर से एक बार फिर पूर्व विधान परिषद सदस्य सुनील सिंह को उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा है।
राजद के पास अपने 25 विधायक हैं। कांग्रेस के 6 विधायक उसके साथ हैं। निर्दलीय विधायक आई. पी. गुप्ता भी महागठबंधन समर्थक माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त AIMIM के पांच विधायक और बहुजन समाज पार्टी के विधायक की भूमिका भी निर्णायक हो सकती है।
यही कारण है कि दोनों खेमे अब केवल अपने विधायकों की संख्या नहीं, बल्कि संभावित समर्थन और विरोध के हर समीकरण पर नजर रखे हुए हैं।
क्या शुरू होगा ‘ऑपरेशन लोटस’ का बिहार संस्करण?
राजनीतिक गलियारों में इन दिनों सबसे बड़ी चर्चा इस संभावना को लेकर है कि दीपक प्रकाश को जीत दिलाने के लिए बीजेपी बड़े स्तर पर राजनीतिक प्रबंधन कर सकती है। सत्ता पक्ष के रणनीतिकारों द्वारा विपक्षी विधायकों से संपर्क साधे जाने की अटकलें भी तेज हैं।
दावा किया जा रहा है कि राजद के कुछ विधायक असंतुष्ट हैं और यदि परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो 15 से 19 विधायकों तक में टूट की संभावना पैदा हो सकती है। हालांकि इस तरह के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीति में चर्चा का बाजार गर्म है।
उपेंद्र कुशवाहा और AIMIM नेतृत्व के बीच पुराने राजनीतिक संबंधों की भी चर्चा हो रही है। माना जा रहा है कि एनडीए इस समीकरण का लाभ उठाने की कोशिश कर सकता है। वहीं कांग्रेस के कुछ विधायकों के बारे में भी पहले से यह चर्चा रही है कि वे समय-समय पर एनडीए नेताओं के संपर्क में रहे हैं।
राज्यसभा चुनाव का इतिहास बढ़ा रहा चिंता
विपक्ष की चिंता की एक बड़ी वजह हालिया राजनीतिक इतिहास भी है। राज्यसभा चुनाव के दौरान राजद के एक और कांग्रेस के तीन विधायक मतदान के समय अनुपस्थित रहे थे। उस घटनाक्रम ने महागठबंधन को झटका दिया था और एनडीए को लाभ मिला था।
इसी अनुभव के कारण इस बार विपक्ष अपने विधायकों को एकजुट रखने की कोशिश में जुट गया है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले दिनों में पटना के राजनीतिक गलियारों में होटल राजनीति, बैठकें और विधायकों की निगरानी जैसे दृश्य भी देखने को मिल सकते हैं।
तेजस्वी यादव के सामने प्रतिष्ठा की लड़ाई
यह चुनाव नेता प्रतिपक्ष Tejashwi Yadav के लिए भी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं माना जा रहा है। पिछले कुछ महीनों में विपक्ष सरकार को कई मुद्दों पर घेरने में अपेक्षित आक्रामकता नहीं दिखा पाया है। ऐसे में यदि इस चुनाव में भी महागठबंधन अपने विधायकों को एकजुट रखने में असफल रहता है तो इसका राजनीतिक संदेश दूरगामी होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि विपक्षी खेमे में बड़ी टूट होती है तो केवल एक विधान परिषद सीट का नुकसान नहीं होगा, बल्कि बिहार विधानसभा में विपक्ष की ताकत पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर भी नए सवाल खड़े हो सकते हैं।
एनडीए के सामने भी आसान नहीं राह
हालांकि यह लड़ाई केवल विपक्ष के लिए चुनौती नहीं है। यदि एनडीए विपक्ष में सेंध लगाने में सफल नहीं होता तो उसे अपने भीतर से समाधान निकालना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में चिराग पासवान की पार्टी के उम्मीदवार को पीछे हटाने अथवा किसी अन्य उम्मीदवार का नाम वापस लेने जैसे विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है।
18 जून पर टिकी बिहार की निगाहें
फिलहाल बिहार की राजनीति की निगाहें नामांकन प्रक्रिया और 18 जून को होने वाली चुनावी जंग पर टिक गई हैं। यदि दीपक प्रकाश मैदान में उतरते हैं तो यह मुकाबला सिर्फ एक विधान परिषद सीट का नहीं रहेगा, बल्कि एनडीए और महागठबंधन की राजनीतिक ताकत, संगठन क्षमता और विधायकों पर पकड़ की परीक्षा बन जाएगा।
बिहार की राजनीति में अक्सर अंतिम क्षणों में समीकरण बदलते रहे हैं। ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि 10वीं सीट किसके खाते में जाएगी, लेकिन इतना तय है कि आने वाले दिनों में पटना का राजनीतिक तापमान और बढ़ने वाला है। यह चुनाव सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है, जिसके नतीजे दूरगामी राजनीतिक प्रभाव छोड़ सकते हैं।
Reviewed by PSA Live News
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9:44:00 am
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