✍️ अशोक कुमार झा
वरिष्ठ पत्रकार, संपादक – PSA Live News एवं रांची दस्तक
बिहार की राजनीति में कुछ चुनाव ऐसे होते हैं, जिनका महत्व उनकी संवैधानिक प्रकृति से कहीं अधिक होता है। वे केवल प्रतिनिधियों के चयन का माध्यम नहीं होते, बल्कि राजनीतिक शक्ति, संगठनात्मक क्षमता, नेतृत्व की स्वीकार्यता और भविष्य के सत्ता समीकरणों की परीक्षा बन जाते हैं। बिहार विधान परिषद की 10 सीटों के लिए होने वाला चुनाव भी धीरे-धीरे ऐसे ही एक राजनीतिक संघर्ष का रूप लेता दिखाई दे रहा है। विशेष रूप से 10वीं सीट को लेकर जिस प्रकार की चर्चाएं, राजनीतिक गतिविधियां और रणनीतिक तैयारियां सामने आ रही हैं, उससे स्पष्ट है कि यह चुनाव केवल विधान परिषद तक सीमित नहीं रहने वाला।
यह चुनाव ऐसे समय में हो रहा है जब बिहार में विधानसभा चुनाव की आहट भी सुनाई देने लगी है। सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी ताकत का आकलन कर रहे हैं, नए समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं और अपने सहयोगियों की निष्ठा को परख रहे हैं। ऐसे में विधान परिषद की यह लड़ाई एक प्रकार से आने वाले बड़े राजनीतिक संघर्ष की रिहर्सल भी मानी जा सकती है।
आखिर इतनी महत्वपूर्ण क्यों बन गई है 10वीं सीट?
संख्या बल के आधार पर देखें तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) नौ सीटों पर अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थिति में दिखाई देता है। भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) ने अपने उम्मीदवारों के चयन में इसी गणित को आधार बनाया है। लेकिन राजनीतिक चर्चा का केंद्र नौ सीटें नहीं, बल्कि 10वीं सीट बन गई है।
कारण स्पष्ट है। इस सीट का सीधा संबंध बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश के राजनीतिक भविष्य से जुड़ता दिखाई दे रहा है। दीपक प्रकाश राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र हैं। उन्हें बिहार मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है, लेकिन संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार उन्हें निर्धारित समय के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना आवश्यक है। यदि वे ऐसा नहीं कर पाते हैं तो उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है।
यही कारण है कि यह चुनाव केवल एक उम्मीदवार की जीत-हार का मामला नहीं रह गया है। यह उपेंद्र कुशवाहा की राजनीतिक प्रतिष्ठा, एनडीए की रणनीतिक क्षमता और गठबंधन की एकजुटता से भी जुड़ गया है।
बिहार की राजनीति और संख्या बल का वास्तविक अर्थ
भारतीय राजनीति में संख्या बल महत्वपूर्ण होता है, लेकिन बिहार की राजनीति में केवल संख्या बल पर्याप्त नहीं होता। यहां राजनीतिक रिश्ते, जातीय समीकरण, क्षेत्रीय प्रभाव, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और भविष्य की संभावनाएं भी उतनी ही निर्णायक भूमिका निभाती हैं।
राजनीतिक इतिहास इस बात का साक्षी है कि बिहार में कई बार अंतिम क्षणों में बने समीकरणों ने चुनावी परिणामों को पूरी तरह बदल दिया है। यही कारण है कि इस चुनाव को लेकर कोई भी राजनीतिक दल पूरी तरह आश्वस्त दिखाई नहीं देता।
एनडीए को जहां अतिरिक्त समर्थन की तलाश है, वहीं महागठबंधन अपनी एकजुटता बनाए रखने की चुनौती से जूझ रहा है। यही वजह है कि यह चुनाव राजनीतिक अंकगणित से अधिक राजनीतिक प्रबंधन का चुनाव बनता जा रहा है।
दीपक प्रकाश के बहाने उपेंद्र कुशवाहा की परीक्षा
राजनीति में कई बार किसी व्यक्ति का चुनाव पूरे दल की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। वर्तमान परिस्थिति में दीपक प्रकाश का मामला भी कुछ ऐसा ही दिखाई देता है।
उपेंद्र कुशवाहा लंबे समय से बिहार की राजनीति के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। वे कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देख चुके हैं और अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने में सफल रहे हैं। लेकिन वर्तमान चुनाव उनके लिए भी एक बड़ी परीक्षा है।
यदि दीपक प्रकाश विधान परिषद पहुंच जाते हैं, तो यह संदेश जाएगा कि सीमित संख्या बल के बावजूद उपेंद्र कुशवाहा आज भी बिहार की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाने की क्षमता रखते हैं। लेकिन यदि ऐसा नहीं होता, तो विपक्ष इसे उनकी राजनीतिक कमजोरी के रूप में प्रचारित करने का प्रयास करेगा।
विपक्ष की रणनीति: केवल सीट बचाने की नहीं, संदेश देने की लड़ाई
इस चुनाव में विपक्ष की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। महागठबंधन इस चुनाव को केवल एक सीट का चुनाव नहीं मान रहा है। उसके लिए यह अपनी राजनीतिक एकजुटता और संगठनात्मक मजबूती साबित करने का अवसर भी है।
राजद नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव भली-भांति समझते हैं कि यदि इस चुनाव में विपक्षी खेमे में किसी प्रकार की टूट या क्रॉस वोटिंग होती है, तो उसका असर सीधे उनके नेतृत्व पर पड़ेगा। इसलिए विपक्ष की पहली और सबसे बड़ी रणनीति अपने सभी विधायकों को एकजुट बनाए रखना है।
सूत्रों के अनुसार महागठबंधन के भीतर लगातार बैठकों का दौर चल रहा है। विधायकों से व्यक्तिगत स्तर पर संवाद स्थापित किया जा रहा है। उन्हें राजनीतिक परिस्थितियों की जानकारी दी जा रही है और यह संदेश दिया जा रहा है कि यह चुनाव केवल एक सीट का नहीं बल्कि पूरे विपक्ष की विश्वसनीयता का प्रश्न है।
विपक्ष की दूसरी रणनीति नैतिक और राजनीतिक दबाव बनाना है। महागठबंधन लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर सकता है कि यदि सत्ता पक्ष विपक्षी विधायकों को तोड़ने का प्रयास करता है तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध होगा। इससे वह जनता के बीच नैतिक बढ़त हासिल करने की कोशिश करेगा।
तीसरी रणनीति छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों को अपने पक्ष में बनाए रखने की है। विपक्ष जानता है कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में एक-एक वोट का महत्व बढ़ गया है। इसलिए केवल अपने विधायकों को संभालना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि सहयोगी दलों और संभावित समर्थकों को भी साथ रखना होगा।
क्या दोहराया जाएगा राज्यसभा चुनाव का इतिहास?
विपक्ष की चिंता का एक कारण हाल के चुनावी अनुभव भी हैं। राज्यसभा चुनावों के दौरान कुछ विधायकों की अनुपस्थिति और राजनीतिक गतिविधियों ने महागठबंधन को असहज स्थिति में डाल दिया था। उस अनुभव ने विपक्ष को यह सिखाया कि केवल सार्वजनिक दावे पर्याप्त नहीं होते, बल्कि संगठनात्मक सतर्कता भी उतनी ही आवश्यक होती है।
इसी कारण इस बार विपक्ष पहले से अधिक सावधान दिखाई दे रहा है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि मतदान तक विपक्ष अपने विधायकों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखेगा और किसी भी प्रकार की असंतोष की स्थिति को तुरंत दूर करने का प्रयास करेगा।
क्या बिहार में दिखेगा ‘ऑपरेशन लोटस’ का प्रभाव?
राजनीतिक चर्चाओं में इन दिनों एक और शब्द बार-बार सुनाई दे रहा है—‘ऑपरेशन लोटस’। हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन विपक्षी दल लगातार यह आशंका जता रहे हैं कि सत्ता पक्ष विपक्षी विधायकों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर सकता है।
भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में ऐसी घटनाएं देखने को मिली हैं, जहां सत्ता परिवर्तन या राजनीतिक समीकरणों में बदलाव के पीछे विधायकों की निष्ठा बदलने की भूमिका रही है। इसी कारण बिहार में भी ऐसी चर्चाओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा रहा।
हालांकि यह भी सच है कि केवल चर्चाओं के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। राजनीति में अफवाहें और वास्तविकताएं कई बार अलग-अलग होती हैं। लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि ऐसी चर्चाओं ने चुनाव के महत्व को और बढ़ा दिया है।
तेजस्वी यादव के लिए नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा
यदि इस चुनाव का सबसे अधिक राजनीतिक प्रभाव किसी एक नेता पर पड़ सकता है, तो वे तेजस्वी यादव हैं। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने खुद को बिहार में भाजपा और एनडीए के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित किया है।
लेकिन किसी भी नेता की वास्तविक ताकत केवल जनसभाओं में भीड़ जुटाने से नहीं मापी जाती। उसकी ताकत संकट के समय अपने सहयोगियों और विधायकों को एकजुट रखने की क्षमता से भी निर्धारित होती है।
यदि विपक्ष एकजुट रहता है और अपने मतों को सुरक्षित रखता है, तो यह तेजस्वी यादव की बड़ी राजनीतिक सफलता होगी। लेकिन यदि विपक्षी खेमे में टूट दिखाई देती है, तो इसके राजनीतिक परिणाम लंबे समय तक महसूस किए जा सकते हैं।
18 जून: केवल मतदान नहीं, राजनीतिक शक्ति परीक्षण
18 जून को होने वाला मतदान केवल विधान परिषद की सीटों का फैसला नहीं करेगा। यह चुनाव बताएगा कि बिहार में किस गठबंधन की राजनीतिक पकड़ अधिक मजबूत है, किस नेतृत्व पर उसके विधायक अधिक भरोसा करते हैं और कौन राजनीतिक परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने की अधिक क्षमता रखता है।
यह चुनाव सत्ता पक्ष के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना विपक्ष के लिए। एनडीए यदि 10वीं सीट जीतने में सफल होता है तो वह इसे अपनी रणनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत करेगा। वहीं विपक्ष यदि इस सीट को बचाने में सफल रहता है तो वह इसे अपनी एकजुटता और राजनीतिक मजबूती का प्रमाण बताएगा।
निष्कर्ष: एक सीट से कहीं बड़ी है यह लड़ाई
बिहार विधान परिषद की 10वीं सीट अब केवल एक चुनावी सीट नहीं रह गई है। यह बिहार की वर्तमान राजनीति का प्रतीक बन चुकी है। यहां सत्ता अपनी शक्ति साबित करना चाहती है, विपक्ष अपनी एकजुटता बचाना चाहता है, छोटे दल अपनी उपयोगिता दिखाना चाहते हैं और राजनीतिक नेतृत्व अपनी विश्वसनीयता साबित करना चाहता है।
संभव है कि चुनाव परिणाम आने के बाद तत्काल कोई बड़ा राजनीतिक परिवर्तन दिखाई न दे, लेकिन यह भी उतना ही संभव है कि यही चुनाव आने वाले विधानसभा चुनावों की राजनीतिक दिशा तय करने वाला साबित हो। इसलिए बिहार की जनता, राजनीतिक दल और राजनीतिक विश्लेषक सभी की निगाहें इस चुनाव पर टिकी हुई हैं।
18 जून का दिन केवल मतगणना का दिन नहीं होगा, बल्कि वह बिहार की राजनीति के वर्तमान और भविष्य के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु भी साबित हो सकता है।
लेखक परिचय
अशोक कुमार झा वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक तथा PSA Live News एवं रांची दस्तक के संपादक हैं। वे बिहार, झारखंड, राजनीति, प्रशासन, लोकतंत्र और जनसरोकारों से जुड़े विषयों पर नियमित लेखन करते हैं। उनके लेख समसामयिक घटनाओं के गहन विश्लेषण, राजनीतिक परिप्रेक्ष्य और जनहित के मुद्दों पर स्पष्ट दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।
Reviewed by PSA Live News
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4:22:00 pm
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