रजरप्पा से उठी एक आवाज़, जो पूरे हिंदुस्तान के मंदिरों तक पहुंचनी चाहिए
लेखक– अशोक कुमार झा
संपादक, रांची दस्तक एवं PSA Live News,सामाजिक, राजनीतिक एवं राष्ट्रीय विषयों के स्वतंत्र विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार।
झारखंड की पवित्र भूमि पर स्थित रजरप्पा मंदिर में मां छिन्नमस्तिका के चरणों में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु माथा टेकने पहुंचते हैं। कोई अपनी बेटी के विवाह की कामना लेकर आता है, कोई बीमारी से मुक्ति की प्रार्थना करता है, कोई अपने परिवार की खुशहाली के लिए मां का आशीर्वाद लेने आता है। लेकिन हाल के वर्षों में रजरप्पा मंदिर एक और कारण से चर्चा में रहा है—वीआईपी दर्शन, कथित विशेष सुविधाएं, दलाली, अव्यवस्था और श्रद्धालुओं के साथ भेदभाव के आरोप।
हाल ही में एक युवक द्वारा वीआईपी दर्शन व्यवस्था का विरोध किए जाने और उसके साथ कथित तौर पर अपराधियों जैसा व्यवहार किए जाने की घटना ने एक बार फिर उस बहस को जीवित कर दिया है, जो वर्षों से दबाई जाती रही है। यह बहस केवल रजरप्पा मंदिर तक सीमित नहीं है। यह प्रश्न देश के लगभग हर बड़े मंदिर, हर तीर्थस्थल और हर धार्मिक संस्थान से जुड़ा हुआ है। आखिर भगवान के दरबार में वीआईपी कौन है? क्या ईश्वर भी अब व्यक्ति का मूल्य उसके बैंक बैलेंस, राजनीतिक पहुंच या प्रशासनिक प्रभाव से तय करने लगे हैं? क्या गरीब की आस्था और अमीर की आस्था में कोई अंतर है? क्या धर्मस्थलों में समानता की अवधारणा केवल भाषणों और धार्मिक पुस्तकों तक सीमित होकर रह गई है?
सच्चाई यह है कि आज हिंदुस्तान के अनेक मंदिरों में एक ऐसी व्यवस्था विकसित हो चुकी है, जो धर्म की मूल भावना के विपरीत दिखाई देती है। आम श्रद्धालु कई घंटों तक कतार में खड़ा रहता है। बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे धूप, बारिश और भीड़ का सामना करते हैं। दूसरी ओर कुछ लोग विशेष टिकट, सिफारिश, प्रभाव या धन के बल पर सीधे गर्भगृह तक पहुंच जाते हैं। यह दृश्य केवल प्रशासनिक व्यवस्था का नहीं बल्कि सामाजिक असमानता का प्रतीक बन चुका है।
धर्म का मूल संदेश समानता है। सनातन परंपरा कहती है कि ईश्वर की दृष्टि में सभी जीव समान हैं। रामायण में भगवान राम ने निषादराज को गले लगाया, शबरी के जूठे बेर खाए। महाभारत में भगवान कृष्ण ने सुदामा जैसे निर्धन मित्र का सम्मान किया। संत कबीर, गुरु नानक, रविदास और तुलसीदास सभी ने मनुष्य की समानता का संदेश दिया। कहीं भी यह नहीं कहा गया कि जो अधिक धन देगा, उसे ईश्वर का अधिक आशीर्वाद मिलेगा या उसे भगवान के अधिक निकट खड़ा होने का अधिकार प्राप्त होगा।
विडंबना देखिए कि जिस धर्म ने समानता का संदेश दिया, उसी धर्म के मंदिरों में आज आर्थिक और सामाजिक हैसियत के आधार पर अलग-अलग कतारें दिखाई देने लगी हैं। यह स्थिति केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि नैतिक और सामाजिक दृष्टि से भी चिंताजनक है। जब एक गरीब किसान अपनी मजदूरी छोड़कर मंदिर पहुंचता है और घंटों लाइन में खड़ा रहता है, जबकि कोई प्रभावशाली व्यक्ति कुछ मिनटों में दर्शन कर निकल जाता है, तब उसके मन में केवल निराशा ही नहीं बल्कि व्यवस्था के प्रति अविश्वास भी जन्म लेता है।
सबसे गंभीर बात यह है कि वीआईपी दर्शन की यह संस्कृति धीरे-धीरे धर्म को सेवा और साधना के मार्ग से हटाकर व्यवसाय की दिशा में ले जा रही है। श्रद्धा और आस्था के स्थान पर सुविधा और भुगतान का सिद्धांत हावी होता दिखाई दे रहा है। अनेक स्थानों पर श्रद्धालुओं के बीच यह धारणा बनने लगी है कि बिना पैसे दिए या विशेष पहचान के बिना सम्मानजनक दर्शन संभव नहीं हैं। यदि ऐसी सोच मजबूत होती है तो यह धर्म के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा।
रजरप्पा मंदिर के संदर्भ में उठते विवाद इसीलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह केवल एक मंदिर का प्रश्न नहीं है। यह उस मानसिकता का प्रश्न है जिसने धार्मिक संस्थानों में जवाबदेही की जगह विशेषाधिकार को स्थापित कर दिया है। हर बार जब कोई श्रद्धालु वीआईपी व्यवस्था का विरोध करता है, तो उसे केवल व्यवस्था विरोधी नहीं बल्कि कभी-कभी उपद्रवी तक घोषित कर दिया जाता है। लेकिन क्या प्रश्न पूछना अपराध है? क्या समानता की मांग करना अनुशासनहीनता है? क्या भगवान के सामने बराबरी की बात करना व्यवस्था के लिए खतरा बन गया है?
यदि कोई श्रद्धालु यह पूछता है कि "जब हम सभी भगवान के बच्चे हैं तो दर्शन के लिए अलग-अलग श्रेणियां क्यों?" तो यह प्रश्न पूरी तरह उचित है। इसका उत्तर प्रशासन, मंदिर समिति और समाज को मिलकर देना होगा। दुर्भाग्य से अक्सर ऐसे प्रश्नों का उत्तर संवाद से नहीं बल्कि दबाव, भय या उपेक्षा से दिया जाता है।
यह भी एक कटु सत्य है कि देश के कई बड़े मंदिरों के आसपास दलालों का एक समानांतर तंत्र विकसित हो चुका है। श्रद्धालुओं को जल्दी दर्शन कराने, विशेष पूजा कराने या विशेष प्रवेश दिलाने के नाम पर बड़ी मात्रा में धन लिया जाता है। इससे न केवल श्रद्धालुओं का आर्थिक शोषण होता है बल्कि मंदिर की प्रतिष्ठा भी प्रभावित होती है। जब धर्मस्थलों की चर्चा आस्था से अधिक धन उगाही के संदर्भ में होने लगे तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है।
इस समस्या का दूसरा पहलू प्रशासनिक है। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं की व्यवस्था बनाए रखने के लिए वीआईपी व्यवस्था आवश्यक है। यह तर्क आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन प्रश्न यह है कि व्यवस्था और विशेषाधिकार में अंतर कहां समाप्त हो जाता है? यदि कोई दिव्यांग व्यक्ति, गंभीर रोगी, गर्भवती महिला या अत्यंत वृद्ध श्रद्धालु है, तो उसके लिए विशेष सुविधा देना मानवीय संवेदना है। लेकिन यदि केवल पद, प्रतिष्ठा या पैसे के आधार पर अलग रास्ता बनाया जाए तो वह सुविधा नहीं, विशेषाधिकार कहलाएगा।
भारत का संविधान समानता का अधिकार देता है। मंदिरों के द्वार भी समानता के प्रतीक होने चाहिए। यदि लोकतंत्र में नागरिक समान हैं तो धर्मस्थलों में भक्त भी समान होने चाहिए। मंदिरों का उद्देश्य समाज को जोड़ना है, वर्गों में बांटना नहीं। दुर्भाग्य से वीआईपी संस्कृति ने समाज में यह संदेश दिया है कि समानता केवल कानून की किताबों में है, व्यवहार में नहीं।
आज आवश्यकता केवल आलोचना की नहीं बल्कि व्यापक सुधार की है। रजरप्पा सहित देश के सभी प्रमुख मंदिरों में पारदर्शी और आधुनिक व्यवस्था लागू होनी चाहिए। दर्शन व्यवस्था पूरी तरह डिजिटल और निगरानी आधारित हो। किसी भी प्रकार की अवैध वसूली पर तत्काल कार्रवाई हो। मंदिर प्रबंधन की आय और व्यय सार्वजनिक की जाए। शिकायतों की स्वतंत्र जांच हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि सामान्य श्रद्धालु को यह महसूस होना चाहिए कि उसकी आस्था का सम्मान किसी मंत्री, उद्योगपति या प्रभावशाली व्यक्ति से कम नहीं है।
धर्म तब तक जीवित रहता है जब तक उसमें न्याय, समानता और विश्वास बना रहता है। जिस दिन श्रद्धालु को यह लगने लगे कि भगवान तक पहुंचने के लिए भी उसे विशेष वर्ग का सदस्य बनना पड़ेगा, उसी दिन धर्म की आत्मा घायल हो जाएगी। मंदिरों की भव्यता, सोने-चांदी के मुकुट, विशाल दानपात्र और आलीशान व्यवस्थाएं धर्म की शक्ति नहीं हैं। धर्म की वास्तविक शक्ति वह विश्वास है जिसके सहारे एक गरीब व्यक्ति भी हजारों कठिनाइयों के बीच मंदिर की सीढ़ियां चढ़ता है।
आज रजरप्पा मंदिर से उठी आवाज़ पूरे हिंदुस्तान को सुननी चाहिए। यह केवल वीआईपी दर्शन का विरोध नहीं है, बल्कि धर्म की आत्मा को बचाने का आह्वान है। यदि भगवान के दरबार में भी अमीर और गरीब की अलग-अलग श्रेणियां बन जाएं, तो फिर समाज को समानता का संदेश कौन देगा? यदि मंदिरों में भी विशेषाधिकार सर्वोच्च मूल्य बन जाए, तो न्याय और आस्था की बात कहां होगी?
समय आ गया है कि देश के सभी धार्मिक संस्थान आत्ममंथन करें। मंदिरों की पवित्रता केवल पूजा-पाठ से नहीं, बल्कि समानता से बनी रहती है। मां छिन्नमस्तिका के दरबार से लेकर काशी, मथुरा, अयोध्या, वैष्णो देवी और तिरुपति तक एक ही सिद्धांत लागू होना चाहिए—भगवान के सामने न कोई वीआईपी है, न कोई सामान्य। वहां केवल भक्त हैं।
और जिस दिन यह सिद्धांत व्यवहार में उतर जाएगा, उसी दिन धर्म पर लग रहे व्यवसायीकरण, दलाली और विशेषाधिकार के आरोप स्वतः समाप्त हो जाएंगे। क्योंकि ईश्वर का दरबार लोकतंत्र से भी बड़ा है, वहां न सत्ता चलती है, न संपत्ति; वहां केवल श्रद्धा चलती है। और श्रद्धा कभी अमीर या गरीब नहीं होती। वह केवल श्रद्धा होती है।
लेखक परिचय
अशोक कुमार झा देश के समसामयिक राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय सुरक्षा विषयों पर अपनी बेबाक और तथ्यपरक लेखनी के लिए जाने जाते हैं। वे रांची दस्तक एवं PSA Live News के संपादक हैं तथा पिछले कई वर्षों से जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर निरंतर लेखन, विश्लेषण और पत्रकारिता कर रहे हैं। उनकी लेखनी का केंद्र बिंदु राष्ट्रहित, सामाजिक न्याय, सुशासन, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत, लोकतांत्रिक मूल्यों और आम नागरिकों के अधिकारों से जुड़े विषय रहे हैं।
झारखंड, बिहार और पूर्वी भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य पर उनकी विशेष पकड़ मानी जाती है। उन्होंने जल संकट, ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार, नक्सलवाद, कानून-व्यवस्था, धार्मिक स्थलों की व्यवस्था, आदिवासी समाज, राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, भारत की विदेश नीति तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका जैसे विषयों पर अनेक महत्वपूर्ण लेख और संपादकीय लिखे हैं, जिन्हें व्यापक सराहना मिली है।
अशोक कुमार झा का मानना है कि पत्रकारिता केवल समाचारों का संकलन नहीं, बल्कि समाज के सामने सत्य को निर्भीकता से प्रस्तुत करने का दायित्व है। वे पत्रकारिता को लोकतंत्र का प्रहरी और जनता तथा शासन-प्रशासन के बीच संवाद का सबसे सशक्त माध्यम मानते हैं। उनकी लेखनी हमेशा उन मुद्दों को आवाज देती है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा की बहसों में पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता।
राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उनके लेखों में स्पष्ट दिखाई देती है। वे मानते हैं कि धर्म का उद्देश्य समाज को जोड़ना, नैतिकता को मजबूत करना और मानवता को ऊंचा उठाना है। इसी कारण धार्मिक स्थलों में व्याप्त अव्यवस्थाओं, भ्रष्टाचार, वीआईपी संस्कृति और आस्था के व्यवसायीकरण जैसे विषयों पर भी वे समय-समय पर मुखरता से अपनी बात रखते रहे हैं।
वर्तमान समय में जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, अशोक कुमार झा अपनी लेखनी के माध्यम से जनजागरण, सामाजिक सुधार, राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त करने का सतत प्रयास कर रहे हैं। उनके लेख केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करते, बल्कि पाठकों को सोचने, प्रश्न करने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने के लिए प्रेरित भी करते हैं।
Reviewed by PSA Live News
on
5:25:00 pm
Rating:

कोई टिप्पणी नहीं: