समाहरणालय में कानून का संकट: जब सरकारी दफ्तरों में ही सुरक्षित नहीं कर्मचारी, तो आम नागरिक का क्या होगा?
- अशोक कुमार झा
रांची समाहरणालय में एसडीओ कार्यालय के कर्मचारी महेंद्र कुमार दास के साथ कथित रूप से कुछ अधिवक्ताओं द्वारा कार्यालय में घुसकर मारपीट किए जाने की घटना केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं है, बल्कि यह राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, कानून के शासन और सरकारी संस्थानों की गरिमा पर सीधा आघात है। यह घटना इसलिए और भी गंभीर हो जाती है क्योंकि यह किसी सुनसान सड़क, बाजार या निजी परिसर में नहीं, बल्कि राजधानी के सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्रों में से एक समाहरणालय परिसर के भीतर घटी है। जिस स्थान से कानून-व्यवस्था, शासन और जनहित से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं, उसी परिसर में यदि कर्मचारी स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगें तो यह लोकतांत्रिक प्रशासनिक ढांचे के लिए अत्यंत चिंताजनक संकेत है।
समाहरणालय किसी भी जिले की प्रशासनिक धुरी होता है। यहां प्रतिदिन हजारों नागरिक अपनी समस्याओं के समाधान, प्रमाण पत्र, भूमि विवाद, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, राजस्व मामलों और अन्य सरकारी सेवाओं के लिए पहुंचते हैं। ऐसे संस्थान की सबसे बड़ी पूंजी उसकी विश्वसनीयता और अनुशासन होता है। यदि कार्यालय कक्षों में घुसकर कर्मचारियों के साथ मारपीट होने लगे और सरकारी कार्य में बाधा डाली जाने लगे तो यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं रह जाती, बल्कि शासन व्यवस्था की साख पर प्रश्नचिह्न बन जाती है।
कथित रूप से जिन लोगों पर मारपीट का आरोप लगा है, उनमें अधिवक्ताओं का नाम सामने आना मामले को और अधिक संवेदनशील बना देता है। अधिवक्ता न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ होते हैं। न्यायालय और अधिवक्ता समाज में कानून के सम्मान और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के प्रतीक माने जाते हैं। ऐसे में यदि किसी विवाद का समाधान संवाद, कानूनी प्रक्रिया और संस्थागत माध्यमों के बजाय हिंसा और दबाव की भाषा में खोजा जाने लगे, तो यह समाज के लिए गलत संदेश देता है। हालांकि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले निष्पक्ष जांच आवश्यक है, लेकिन यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल एक व्यक्ति की गलती नहीं बल्कि पेशेवर आचरण और संस्थागत मर्यादाओं पर भी गंभीर प्रश्न होगा।
यह घटना एक बड़े सवाल को जन्म देती है—क्या सरकारी कर्मचारी आज सुरक्षित हैं? बीते कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं, जहां डॉक्टरों, शिक्षकों, राजस्व कर्मचारियों, बिजली विभाग के कर्मियों और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ अभद्रता, धमकी या मारपीट की घटनाएं हुई हैं। इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह होता है कि कर्मचारी भय और दबाव के माहौल में काम करने लगते हैं। जब किसी सरकारी सेवक को यह चिंता सताने लगे कि किसी निर्णय, टिप्पणी या प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण उस पर हमला हो सकता है, तो उसकी कार्यक्षमता और निष्पक्षता दोनों प्रभावित होती हैं।
लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, विरोध का अधिकार है और अपनी बात रखने का अधिकार भी है। लेकिन किसी भी परिस्थिति में हिंसा का अधिकार नहीं है। यदि किसी नागरिक, संगठन, जनप्रतिनिधि या अधिवक्ता को किसी कर्मचारी या अधिकारी के व्यवहार से शिकायत है तो उसके लिए कानूनी और प्रशासनिक उपाय उपलब्ध हैं। शिकायत दर्ज कराई जा सकती है, उच्च अधिकारियों से संपर्क किया जा सकता है, न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति स्वयं न्यायाधीश बनकर दंड देने लगे तो फिर कानून के शासन का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
इस घटना का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष समाहरणालय की सुरक्षा व्यवस्था है। सामान्यतः समाहरणालय परिसर को संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। यहां सुरक्षा कर्मियों की तैनाती रहती है, प्रवेश और गतिविधियों पर निगरानी रखी जाती है तथा कई स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे भी लगे होते हैं। इसके बावजूद यदि किसी कार्यालय कक्ष में घुसकर मारपीट की घटना घट जाती है तो सुरक्षा तंत्र की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। प्रशासन को यह जांच करनी चाहिए कि घटना के समय सुरक्षा व्यवस्था में कहां चूक हुई और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या अतिरिक्त कदम उठाए जाने चाहिए।
सरकारी कर्मचारियों में व्याप्त आक्रोश भी स्वाभाविक है। कोई भी कर्मचारी यह अपेक्षा करता है कि कार्यस्थल पर उसे सुरक्षा और सम्मान मिलेगा। यदि कार्यालय के भीतर ही उसकी गरिमा और सुरक्षा खतरे में पड़ जाए तो उसका मनोबल टूटता है। कर्मचारी संगठनों द्वारा दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि पूरे सरकारी तंत्र के आत्मसम्मान का प्रश्न बन जाता है। यदि ऐसे मामलों में त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं होती तो कर्मचारियों के बीच असुरक्षा की भावना गहराने लगती है।
इस घटना का सामाजिक प्रभाव भी कम गंभीर नहीं है। आम नागरिक जब किसी सरकारी कार्यालय में इस प्रकार के विवाद और हिंसा की खबर सुनते हैं तो उनके मन में भी प्रशासनिक संस्थानों के प्रति विश्वास कम होता है। शासन की सफलता केवल योजनाओं और घोषणाओं से नहीं, बल्कि संस्थाओं की गरिमा और जनता के भरोसे से तय होती है। इसलिए ऐसी घटनाओं को सामान्य कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आवश्यक है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो। यदि सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध हैं तो उनकी बारीकी से समीक्षा की जाए। प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लिए जाएं। दोषी चाहे कोई भी हो, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई हो। साथ ही यदि किसी पक्ष की ओर से गलत आरोप लगाए गए हैं तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। न्याय का मूल सिद्धांत यही है कि सत्य सामने आए और जिम्मेदार व्यक्ति को जवाबदेह ठहराया जाए।
रांची समाहरणालय की यह घटना केवल एक दिन की खबर नहीं है। यह हमें याद दिलाती है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती उसके संस्थानों के सम्मान और कानून के शासन पर निर्भर करती है। यदि प्रशासनिक कार्यालयों की मर्यादा टूटती है, यदि सरकारी कर्मचारी भय में काम करने को मजबूर होते हैं और यदि विवादों का समाधान संवाद के बजाय ताकत के प्रदर्शन से होने लगे तो अंततः नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ता है।
आज आवश्यकता केवल दोषियों की पहचान और कार्रवाई की नहीं है, बल्कि एक स्पष्ट संदेश देने की भी है कि झारखंड में कानून से ऊपर कोई नहीं है। चाहे वह आम नागरिक हो, प्रभावशाली व्यक्ति हो, जनप्रतिनिधि हो या किसी प्रतिष्ठित पेशे से जुड़ा व्यक्ति—कानून का सम्मान सभी के लिए समान रूप से अनिवार्य है। समाहरणालय जैसे प्रशासनिक केंद्रों की गरिमा और सुरक्षा बनाए रखना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। क्योंकि जिस दिन सरकारी संस्थानों में भय का माहौल स्थापित हो जाएगा, उस दिन लोकतंत्र की जड़ें भी कमजोर पड़ने लगेंगी।
Reviewed by PSA Live News
on
9:18:00 pm
Rating:

कोई टिप्पणी नहीं: