लेखक : अशोक कुमार झा
संपादक – PSA Live News एवं रांची दस्तक
बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित प्रसाद अस्पताल में आईसीयू में लगी आग और उसमें तीन मरीजों की दर्दनाक मौत केवल एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि यह हमारे स्वास्थ्य तंत्र, प्रशासनिक निगरानी और मानवीय संवेदनाओं के पतन का भयावह दस्तावेज है। रात के अंधेरे में जब अस्पताल के आईसीयू में आग भड़की, तब वहां जीवन बचाने की शपथ लेने वाले लोग मौजूद थे। लेकिन सबसे दुखद और शर्मनाक आरोप यह सामने आया कि अस्पताल का स्टाफ मरीजों को आग और धुएं के बीच छोड़कर स्वयं अपनी जान बचाने के लिए भाग निकला। यदि यह तथ्य जांच में सही साबित होता है, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि मानवता के विरुद्ध अपराध की श्रेणी में आने वाली घटना होगी।
अस्पताल वह स्थान होता है जहां कोई व्यक्ति अपने जीवन की सबसे कठिन घड़ी में आशा लेकर पहुंचता है। एक मरीज जब आईसीयू में भर्ती होता है, तब वह स्वयं अपने जीवन की रक्षा करने की स्थिति में नहीं होता। वह पूरी तरह डॉक्टरों, नर्सों और अस्पताल प्रबंधन पर निर्भर होता है। ऐसे में यदि आग जैसी आपदा के समय मरीजों को बचाने के बजाय अस्पताल कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी छोड़कर भाग जाएं, तो इससे बड़ा विश्वासघात शायद ही कोई दूसरा हो सकता है। जिन मरीजों ने अपने जीवन की रक्षा के लिए अस्पताल का दरवाजा खटखटाया था, उन्हें वहीं मौत के हवाले छोड़ दिया गया।
यह घटना केवल मुजफ्फरपुर की नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में अस्पतालों में आग लगने की अनेक घटनाएं सामने आ चुकी हैं। कभी अहमदाबाद, कभी दिल्ली, कभी मुंबई और कभी कोलकाता में अस्पतालों में आग लगने से मरीजों की मौत हुई है। हर बार जांच बैठती है, मुआवजे की घोषणा होती है, कुछ अधिकारियों का तबादला होता है और फिर मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला जाता है। लेकिन मूल प्रश्न वहीं का वहीं रह जाता है कि आखिर हमारे अस्पताल इतने असुरक्षित क्यों हैं?
हकीकत यह है कि देश के अनेक निजी और सरकारी अस्पतालों में अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन केवल कागजों पर होता है। फायर एनओसी प्राप्त करने के बाद वर्षों तक किसी प्रकार का निरीक्षण नहीं होता। कई अस्पतालों में आपातकालीन निकास मार्ग या तो बंद रहते हैं या उन्हें स्टोर रूम में बदल दिया जाता है। अग्निशमन यंत्र केवल दिखावे के लिए लगाए जाते हैं। अधिकांश कर्मचारियों को यह तक नहीं पता होता कि आग लगने की स्थिति में मरीजों को सुरक्षित बाहर कैसे निकाला जाए। जब तक सब कुछ सामान्य रहता है, तब तक इन कमियों पर किसी का ध्यान नहीं जाता, लेकिन जैसे ही कोई हादसा होता है, तब ये कमियां मौत का कारण बन जाती हैं।
मुजफ्फरपुर की घटना ने एक और गंभीर सवाल खड़ा किया है। यदि आग सुबह तीन बजे लगी थी, तो क्या अस्पताल में पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित कर्मचारी मौजूद थे? क्या अस्पताल में फायर अलार्म सिस्टम काम कर रहा था? क्या आईसीयू जैसे अत्यंत संवेदनशील विभाग में आग से बचाव की पर्याप्त व्यवस्था थी? क्या स्थानीय प्रशासन द्वारा नियमित सुरक्षा ऑडिट किया गया था? क्या स्वास्थ्य विभाग ने कभी इस अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की थी? इन सभी सवालों के जवाब केवल अस्पताल प्रबंधन से नहीं बल्कि प्रशासन और सरकार से भी मांगे जाने चाहिए।
यह भी विचारणीय है कि आज स्वास्थ्य सेवाएं बड़े पैमाने पर व्यवसाय में बदलती जा रही हैं। कई निजी अस्पताल करोड़ों रुपये का कारोबार करते हैं, लेकिन सुरक्षा व्यवस्थाओं पर खर्च करने में कंजूसी करते हैं। मरीजों से भारी-भरकम शुल्क वसूला जाता है, लेकिन जब सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात आती है तो अक्सर मानकों की अनदेखी कर दी जाती है। लाभ कमाने की इस अंधी दौड़ में मरीजों की जान का मूल्य कहीं पीछे छूट जाता है। यदि किसी अस्पताल में अग्नि सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं, तो उसे मरीज भर्ती करने का अधिकार ही नहीं होना चाहिए।
इस घटना का सबसे पीड़ादायक पक्ष उन परिवारों की स्थिति है जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया। सोचिए, कोई परिवार अपने बीमार सदस्य को इस उम्मीद से अस्पताल में भर्ती कराता है कि वहां उसका इलाज होगा और वह स्वस्थ होकर घर लौटेगा। लेकिन कुछ घंटों बाद उसे यह सूचना मिले कि अस्पताल में आग लग गई और उसका प्रियजन जीवित नहीं बच सका। इससे बड़ा दुख और क्या हो सकता है? जिन परिवारों ने अपने माता-पिता, भाई, बहन या अन्य परिजनों को खोया है, उनके लिए यह क्षति जीवन भर न भरने वाला घाव बन जाएगी।
सरकार की जिम्मेदारी केवल मुआवजा घोषित करने तक सीमित नहीं हो सकती। मृतकों के परिवारों को आर्थिक सहायता देना आवश्यक है, लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी है दोषियों की जवाबदेही तय करना। यदि अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। यदि सुरक्षा मानकों का उल्लंघन पाया जाता है तो अस्पताल का लाइसेंस रद्द होना चाहिए। यदि सरकारी अधिकारियों ने निरीक्षण में लापरवाही की है तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। जवाबदेही केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उस पूरी व्यवस्था तक पहुंचनी चाहिए जिसने ऐसी स्थिति पैदा होने दी।
कानून के दृष्टिकोण से भी यह मामला अत्यंत गंभीर है। यदि यह सिद्ध होता है कि आग लगने के बाद अस्पताल कर्मचारी मरीजों को छोड़कर भाग गए थे, तो यह केवल नैतिक विफलता नहीं बल्कि आपराधिक जिम्मेदारी का विषय भी है। चिकित्सा पेशा केवल रोजगार नहीं बल्कि सेवा और उत्तरदायित्व का क्षेत्र है। ऐसे समय में मरीजों को छोड़कर भाग जाना उस पेशे की मूल भावना के विपरीत है।
यह घटना हमें यह सोचने के लिए भी मजबूर करती है कि आपदा प्रबंधन को लेकर हमारी तैयारियां कितनी कमजोर हैं। अस्पतालों में नियमित मॉक ड्रिल, कर्मचारियों का प्रशिक्षण, अग्निशमन उपकरणों की जांच और आपातकालीन निकासी की व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए। प्रत्येक अस्पताल को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी संकट की स्थिति में मरीजों को सुरक्षित बाहर निकालने की स्पष्ट और प्रभावी योजना मौजूद हो।
समाज के रूप में भी हमें यह समझना होगा कि स्वास्थ्य सेवा केवल भवन, मशीन और दवाओं का नाम नहीं है। इसका सबसे महत्वपूर्ण आधार मानवीय संवेदना है। यदि अस्पतालों से संवेदनशीलता समाप्त हो जाएगी, तो वे केवल इमारतें बनकर रह जाएंगी। मरीजों को सबसे अधिक आवश्यकता दवाओं से पहले विश्वास की होती है। जब यह विश्वास टूटता है, तब पूरा स्वास्थ्य तंत्र प्रश्नों के घेरे में आ जाता है।
मुजफ्फरपुर का यह हादसा केवल तीन लोगों की मौत की खबर नहीं है। यह एक चेतावनी है कि यदि हमने अब भी स्वास्थ्य संस्थानों की सुरक्षा, जवाबदेही और मानवीय मूल्यों को गंभीरता से नहीं लिया, तो ऐसी त्रासदियां भविष्य में भी दोहराई जाती रहेंगी। आग केवल आईसीयू में नहीं लगी थी, बल्कि उसने हमारे प्रशासनिक तंत्र, स्वास्थ्य व्यवस्था और सामाजिक संवेदनशीलता की परतों को भी झुलसा दिया है। आवश्यकता इस बात की है कि इस घटना को केवल एक समाचार की तरह न देखा जाए, बल्कि इसे एक ऐसे सबक के रूप में लिया जाए जो आने वाले समय में हजारों लोगों की जान बचा सकता है।
आज पूरा समाज उन मृतकों के परिवारों के साथ खड़ा है। लेकिन सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब इस हादसे से सबक लेकर ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिसमें किसी भी मरीज को अस्पताल के बिस्तर पर असहाय अवस्था में मौत का इंतजार न करना पड़े। जीवन बचाने वाले संस्थानों को मृत्यु का केंद्र बनने से रोकना ही सरकार, प्रशासन, अस्पताल प्रबंधन और समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
लेखक : अशोक कुमार झा
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