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बदहाल बिहार से बदलते बिहार तक : आंखों देखा सच और विकास की वास्तविक कहानी


लेखक : अशोक कुमार झा

संपादक : पीएसए लाइव न्यूज एवं रांची दस्तक

बिहार को लेकर देशभर में अनेक तरह की धारणाएं रही हैं। कुछ लोग बिहार को आज भी उसी नजर से देखते हैं, जैसी तस्वीर तीन या चार दशक पहले हुआ करती थी। लेकिन जो लोग बिहार की धरती पर रहे हैं, जिन्होंने इसके संघर्ष, अभाव, गरीबी और बदहाली को अपनी आंखों से देखा है, वे जानते हैं कि आज का बिहार और 1990 के दशक का बिहार दो बिल्कुल अलग वास्तविकताएं हैं।

मैं वर्ष 1990 से लगातार बिहार को देख रहा हूं। मैंने वह बिहार देखा है जहां सरकारी स्कूल तो थे, लेकिन शिक्षक नहीं थे। विद्यालयों की इमारतें थीं, लेकिन उनमें पढ़ाई नहीं होती थी। कई विद्यालयों में वर्षों तक नियुक्तियां नहीं हुईं। शिक्षक रिटायर होते रहे, लेकिन उनकी जगह नए शिक्षक नहीं आए। परिणाम यह हुआ कि शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे दम तोड़ती चली गई।

मैंने वह बिहार भी देखा है जहां अस्पताल तो थे, लेकिन डॉक्टर नहीं थे। सरकारी अस्पतालों की इमारतें खड़ी थीं, मगर उनमें मरीजों के इलाज की व्यवस्था नहीं थी। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डॉक्टरों की कमी के कारण खंडहर में तब्दील होते जा रहे थे। गरीब आदमी इलाज के लिए या तो झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भर था या फिर बड़े शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर था।

मुझे वह दौर भी याद है जब विद्यालयों की छतें बारिश में टपकती थीं। कई जगहों पर कक्षाएं पेड़ के नीचे लगती थीं। स्कूल भवनों की मरम्मत वर्षों तक नहीं होती थी। गांवों के अनेक विद्यालयों को लोगों ने मवेशियों के बथान के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। शिक्षा का मंदिर पशुओं का आश्रय स्थल बन चुका था।

ग्रामीण बिहार का जीवन और भी कठिन था। घरों में शौचालय नहीं थे। महिलाएं और बच्चे खुले में शौच के लिए जाने को मजबूर थे। गांवों के तालाब, पोखर और खेत ही शौच के स्थान हुआ करते थे। कई बार मासूम बच्चे पोखरों में डूब जाते थे और परिवार हमेशा के लिए उजड़ जाता था। यह केवल सुविधा का अभाव नहीं था, बल्कि सम्मान और सुरक्षा का भी प्रश्न था।

सड़क और परिवहन की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं थी। दरभंगा से कुशेश्वरस्थान की यात्रा, जो आज अपेक्षाकृत कम समय में पूरी हो जाती है, कभी पांच-पांच घंटे में पूरी होती थी। सड़कें टूटी हुई थीं, पुल-पुलियों का अभाव था और बरसात के दिनों में कई गांवों का संपर्क पूरी तरह कट जाता था।

बिजली की स्थिति तो और भी विचित्र थी। गांवों में बिजली के खंभे तो दिखाई देते थे, लेकिन बिजली नहीं आती थी। कई जगहों पर केवल खंभे खड़े कर दिए गए थे और वर्षों तक उनमें तार नहीं जुड़े। जहां तार लगे भी, वहां बिजली का दर्शन दुर्लभ था। लोग बिजली के तारों का उपयोग घरेलू सामान बनाने में करने लगे थे। बिजली के खंभे घरों के निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने लगे थे। यह किसी व्यंग्य से कम नहीं था कि बिजली व्यवस्था स्वयं लोगों के लिए अनुपयोगी हो चुकी थी।

यह वही बिहार था जिसकी चर्चा राष्ट्रीय मंचों पर पिछड़ेपन, अपराध, पलायन और अव्यवस्था के उदाहरण के रूप में होती थी। लाखों युवाओं को रोजगार, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता था। बिहार का नाम सुनते ही लोगों के मन में एक नकारात्मक छवि बन जाती थी।

लेकिन क्या आज भी बिहार वैसा ही है?

यदि कोई ईमानदारी से इस प्रश्न का उत्तर खोजे तो उसे स्वीकार करना पड़ेगा कि बिहार में परिवर्तन आया है। यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि सारी समस्याएं समाप्त हो गई हैं, लेकिन यह कहना भी अन्याय होगा कि कुछ बदला ही नहीं।

आज अधिकांश गांवों तक सड़कें पहुंच चुकी हैं। बिजली की उपलब्धता पहले की तुलना में कहीं बेहतर हुई है। घर-घर शौचालय बने हैं। विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्तियां हुई हैं। स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और चिकित्सा सुविधाओं की संख्या बढ़ी है। एम्बुलेंस सेवाएं उपलब्ध हुई हैं। सरकारी योजनाओं का दायरा गांव-गांव तक पहुंचा है।

आज का युवा शायद कल्पना भी नहीं कर सकता कि कभी बिहार के अनेक गांवों में शाम ढलते ही अंधेरा छा जाता था और पूरी रात लालटेन तथा ढिबरी के सहारे गुजारनी पड़ती थी। आज बिजली की कुछ समस्याएं अवश्य हैं, लेकिन स्थिति पहले जैसी नहीं है। आज अधिकांश घरों में पंखे चलते हैं, मोबाइल चार्ज होते हैं और बच्चे रात में पढ़ाई कर पाते हैं।

इसी प्रकार स्वच्छता के क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव देखने को मिला है। खुले में शौच से मुक्ति केवल एक सरकारी योजना नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन का भी अभियान था। करोड़ों लोगों के जीवन में इससे गरिमा और सुरक्षा का नया अध्याय जुड़ा।

कुछ लोग आज भी केवल कमियां गिनाते हैं। वे कहते हैं कि बेरोजगारी है, महंगाई है, समस्याएं हैं। यह सही है कि समस्याएं हैं। किसी भी समाज में समस्याएं समाप्त नहीं होतीं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या आज की स्थिति 1990 या 2000 के दशक की स्थिति से बेहतर नहीं है? यदि बेहतर है, तो उसे स्वीकार करना भी बौद्धिक ईमानदारी का हिस्सा होना चाहिए।

विकास का मूल्यांकन केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं किया जा सकता। विकास को जमीन पर उतरकर देखना पड़ता है। गांव की सड़क, स्कूल की कक्षा, अस्पताल का बिस्तर, घर का शौचालय और खेत तक पहुंचती बिजली की लाइन ही विकास का वास्तविक पैमाना है।

राष्ट्रीय स्तर पर भी इसी प्रकार बहस होती है। वर्ष 2004 से 2014 और 2014 से 2026 के बीच की तुलना अक्सर राजनीतिक दृष्टिकोण से की जाती है। लेकिन यदि वस्तुनिष्ठ दृष्टि से देखा जाए तो आधारभूत संरचना, डिजिटल सेवाओं, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, ग्रामीण सड़क निर्माण, बैंकिंग समावेशन, गैस कनेक्शन, विद्युत पहुंच और तकनीकी विकास के क्षेत्रों में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। इसका अर्थ यह नहीं कि सब कुछ आदर्श हो गया है, बल्कि यह है कि यात्रा आगे बढ़ी है।

आज लगभग हर गांव में गैस कनेक्शन पहुंचा है। बैंक खाते खुले हैं। डिजिटल भुगतान सामान्य बात बन गई है। सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे लाभार्थियों के खाते में पहुंच रहा है। ये परिवर्तन केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि आम आदमी के जीवन में दिखाई देते हैं।

लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है, लेकिन आलोचना तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। यदि किसी सरकार की आलोचना की जाए तो उसके साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि उसने क्या उपलब्धियां हासिल की हैं। केवल नकारात्मकता के आधार पर समाज आगे नहीं बढ़ता।

बिहार का परिवर्तन अभी अधूरा है। अभी रोजगार, उद्योग, शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और पलायन रोकने जैसे अनेक बड़े लक्ष्य बाकी हैं। लेकिन यह भी सच है कि जिस बिहार ने दशकों तक उपेक्षा और अव्यवस्था झेली, वह आज एक नई दिशा में आगे बढ़ रहा है।

जो लोग पुराने बिहार को देख चुके हैं, वे इस बदलाव को महसूस कर सकते हैं। जिन्होंने बदहाली के उस दौर को नहीं देखा, उन्हें शायद यह परिवर्तन साधारण लगे। लेकिन जिन्होंने खंडहर होते विद्यालय, डॉक्टर विहीन अस्पताल, अंधेरे में डूबे गांव और टूटी सड़कों पर जीवन बिताया है, उनके लिए यह बदलाव किसी क्रांति से कम नहीं है।

वास्तविकता यह है कि बिहार बदला है। यह परिवर्तन पूर्ण नहीं है, लेकिन स्पष्ट है। जो इसे नहीं देख पा रहे, संभव है उन्हें अपना नजरिया बदलने की आवश्यकता हो। क्योंकि कभी-कभी समस्या आंखों की नहीं, दृष्टिकोण की होती है।

बिहार की यात्रा अभी जारी है। मंजिल अभी दूर है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि बिहार अब वहां नहीं खड़ा है जहां वह तीन दशक पहले खड़ा था। यही परिवर्तन की सबसे बड़ी पहचान है और यही भविष्य की सबसे बड़ी उम्मीद भी।


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