जब विधायक वोट नहीं, बल्कि राजनीतिक बाजार का हिस्सा बनने लगें तो लोकतंत्र की आत्मा पर सबसे बड़ा खतरा मंडराने लगता है
लेखक : अशोक कुमार झा
संपादक: पीएसए लाइव न्यूज एवं रांची दस्तक।
हिंदुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं, विश्वास और संवैधानिक मूल्यों की अभिव्यक्ति भी हैं। लोकसभा हो, विधानसभा हो या राज्यसभा, प्रत्येक चुनाव का अपना महत्व और उद्देश्य है। लेकिन जब चुनावी प्रक्रिया के साथ "हॉर्स ट्रेडिंग" अर्थात विधायकों की कथित खरीद-फरोख्त, दबाव, प्रलोभन और राजनीतिक सौदेबाजी जैसे शब्द जुड़ने लगते हैं, तब लोकतंत्र का सबसे पवित्र पर्व संदेह के घेरे में आ जाता है।
राज्यसभा चुनावों के दौरान अक्सर यह चर्चा सुनने को मिलती है कि कौन सा विधायक किस खेमे में जाएगा, किसे कितनी कीमत मिलेगी, कौन सा दल अपने विधायकों को रिसॉर्ट में रखेगा और कौन किस उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस वोटिंग करेगा। यह स्थिति केवल किसी एक राज्य या किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। पिछले दो दशकों में देश के कई राज्यों में राज्यसभा चुनावों के दौरान ऐसे आरोप लगते रहे हैं जिन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
राज्यसभा का मूल उद्देश्य क्या था?
संविधान निर्माताओं ने राज्यसभा को केवल एक दूसरा सदन नहीं माना था। इसका उद्देश्य राज्यों को राष्ट्रीय नीति निर्माण में भागीदारी देना था। राज्यसभा को "राज्यों की परिषद" कहा गया ताकि राज्यों की आवाज संसद तक पहुंचे।
संविधान सभा की बहसों में यह स्पष्ट किया गया था कि राज्यसभा एक ऐसा मंच होगी जहां अनुभवी, विद्वान, नीति विशेषज्ञ और विभिन्न क्षेत्रों के जानकार लोग पहुंचेंगे और कानून निर्माण की प्रक्रिया को अधिक परिपक्व बनाएंगे। लेकिन समय के साथ राज्यसभा की राजनीति का स्वरूप बदलता गया।
आज अनेक बार यह प्रश्न उठता है कि राज्यसभा में भेजे जाने वाले उम्मीदवार वास्तव में राज्य के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं या केवल राजनीतिक दलों और कॉरपोरेट हितों का।
हॉर्स ट्रेडिंग क्या है?
राजनीतिक शब्दावली में हॉर्स ट्रेडिंग का अर्थ है विधायकों या जनप्रतिनिधियों को विभिन्न प्रकार के प्रलोभन, पद, धन, राजनीतिक लाभ या अन्य साधनों के माध्यम से प्रभावित कर उनका समर्थन प्राप्त करना।
हालांकि ऐसे आरोपों को सिद्ध करना हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन जब चुनाव परिणाम अप्रत्याशित आते हैं, बड़ी संख्या में क्रॉस वोटिंग होती है या मतदान से पहले विधायकों को होटल और रिसॉर्ट में रखा जाता है, तब जनता के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं।
लोकतंत्र में मतदाता अपने प्रतिनिधि को चुनता है। लेकिन यदि वही प्रतिनिधि बाद में किसी अन्य कारण से अपनी राजनीतिक निष्ठा बदल दे, तो जनादेश की मूल भावना प्रभावित होती है।
राज्यसभा चुनाव और बढ़ती आशंकाएं
राज्यसभा चुनाव प्रत्यक्ष नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष चुनाव होते हैं। जनता सीधे सांसद नहीं चुनती। विधायक मतदान करके राज्यसभा सदस्य चुनते हैं।
यही कारण है कि इन चुनावों में व्यक्तिगत संबंध, राजनीतिक समीकरण, दलगत रणनीति और संख्या बल अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
जब किसी सीट पर मुकाबला कड़ा होता है और जीत-हार कुछ वोटों पर निर्भर करती है, तब हॉर्स ट्रेडिंग की आशंकाएं भी बढ़ जाती हैं। कई बार राजनीतिक दल अपने विधायकों को "सुरक्षित" रखने के लिए उन्हें दूसरे राज्यों के रिसॉर्ट्स में भेज देते हैं। यह दृश्य लोकतंत्र की मजबूती नहीं बल्कि राजनीतिक अविश्वास का प्रतीक बन जाता है।
यदि किसी दल को अपने ही विधायकों पर भरोसा नहीं है तो यह लोकतांत्रिक राजनीति के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
झारखंड और राज्यसभा चुनाव
झारखंड की राजनीति में भी राज्यसभा चुनाव हमेशा चर्चा और विवाद का विषय रहे हैं। राज्य छोटा है, विधानसभा में सदस्यों की संख्या सीमित है और कई बार राजनीतिक समीकरण बेहद जटिल हो जाते हैं।
वर्षों से यह आरोप लगता रहा है कि राज्यसभा चुनावों के दौरान धनबल और प्रभाव का इस्तेमाल बढ़ जाता है। कई बार जांच एजेंसियों को भी सक्रिय होना पड़ा है। कुछ मामलों में छापेमारी हुई, पूछताछ हुई और कानूनी कार्रवाई भी देखने को मिली।
यह स्थिति केवल झारखंड की नहीं बल्कि पूरे देश की राजनीति के लिए चिंता का विषय है।
क्या क्रॉस वोटिंग हमेशा गलत है?
लोकतांत्रिक दृष्टि से देखें तो हर विधायक को अपने विवेक से मतदान करने का अधिकार होना चाहिए। लेकिन व्यावहारिक राजनीति में विधायक किसी राजनीतिक दल के टिकट पर चुनकर आते हैं और जनता भी उन्हें उसी दल की विचारधारा के आधार पर चुनती है।
यदि कोई विधायक वैचारिक कारणों से क्रॉस वोटिंग करता है तो उसे सार्वजनिक रूप से अपने निर्णय का कारण बताना चाहिए। लेकिन यदि क्रॉस वोटिंग के पीछे व्यक्तिगत लाभ या राजनीतिक सौदेबाजी की आशंका हो तो लोकतांत्रिक नैतिकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
लोकतंत्र में धनबल का बढ़ता प्रभाव
आज चुनावों में धनबल सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।
चाहे लोकसभा चुनाव हो, विधानसभा चुनाव हो या राज्यसभा चुनाव, पैसे का प्रभाव लगातार बढ़ता दिखाई देता है। राजनीतिक दल चुनावी खर्च को लेकर एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं। आम जनता भी यह महसूस करने लगी है कि राजनीति में आर्थिक शक्ति का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।
यदि किसी राज्यसभा सीट की जीत धनबल, प्रभाव या सौदेबाजी से तय होने लगे तो यह लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध है।
राजनीति सेवा का माध्यम होनी चाहिए, निवेश और मुनाफे का व्यवसाय नहीं।
सबसे बड़ा नुकसान किसका?
राज्यसभा चुनावों में यदि हॉर्स ट्रेडिंग होती है तो सबसे बड़ा नुकसान किसी राजनीतिक दल का नहीं बल्कि जनता का होता है।
जनता अपने प्रतिनिधियों को विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और जनहित के मुद्दों पर काम करने के लिए चुनती है। लेकिन यदि प्रतिनिधि राजनीतिक सौदेबाजी में उलझ जाएं तो जनता के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
इसका दूसरा बड़ा नुकसान लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को होता है। जब जनता को यह लगने लगे कि चुनाव परिणाम जनादेश से नहीं बल्कि धनबल से प्रभावित हो रहे हैं, तब लोकतंत्र के प्रति विश्वास कमजोर पड़ने लगता है।
समाधान क्या है?
राज्यसभा चुनावों को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए कई सुधारों पर विचार किया जा सकता है।
सबसे पहले राजनीतिक दलों को उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया अधिक लोकतांत्रिक बनानी होगी।
दूसरा, चुनाव आयोग और संबंधित संस्थाओं को मतदान प्रक्रिया पर कड़ी निगरानी रखनी चाहिए।
तीसरा, विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोपों की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच होनी चाहिए।
चौथा, राजनीतिक दलों को नैतिक राजनीति की संस्कृति विकसित करनी होगी।
और सबसे महत्वपूर्ण, जनता को भी ऐसे मुद्दों पर सजग रहना होगा क्योंकि लोकतंत्र केवल नेताओं की नहीं बल्कि नागरिकों की भी जिम्मेदारी है।
निष्कर्ष
राज्यसभा चुनाव लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य राज्यों की आवाज को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाना है। लेकिन यदि यह प्रक्रिया हॉर्स ट्रेडिंग, धनबल, दबाव और राजनीतिक सौदेबाजी की चर्चाओं में घिर जाए तो लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है।
राजनीतिक दल बदलते रहेंगे, सरकारें बनती और गिरती रहेंगी, लेकिन लोकतंत्र की विश्वसनीयता बनी रहनी चाहिए। राज्यसभा चुनावों को राजनीतिक बाजार नहीं, लोकतांत्रिक मूल्यों का मंच बनाना होगा।
हिंदुस्तान के लोकतंत्र की ताकत विधायकों की कीमत में नहीं, बल्कि उनके विवेक, ईमानदारी और जनता के प्रति जवाबदेही में निहित है। जिस दिन यह भावना कमजोर पड़ जाएगी, उस दिन चुनाव भले होते रहेंगे, लेकिन लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ खो जाएगा।
राज्यसभा की हर सीट केवल एक सांसद नहीं चुनती, बल्कि यह तय करती है कि लोकतंत्र जनादेश से चलेगा या सौदेबाजी से। यही प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है और इसका उत्तर राजनीति से अधिक लोकतांत्रिक चरित्र में छिपा हुआ है।
Reviewed by PSA Live News
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6:54:00 pm
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