संपन्नता से संघर्ष तक की दर्दनाक यात्रा और न्याय व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल
लेखक : अशोक कुमार झा
संपादक – रांची दस्तक एवं PSA Live News
सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार
किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों, बढ़ती अर्थव्यवस्था या राजनीतिक शक्ति से नहीं होती। किसी समाज की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वहां सबसे कमजोर, सबसे गरीब, सबसे असहाय और सबसे पीड़ित व्यक्ति को कितना न्याय मिलता है। जिस समाज में शक्तिशाली व्यक्ति कानून से ऊपर दिखाई देने लगे और जहां गरीब व्यक्ति अपनी बात कहने के लिए भी संघर्ष करने लगे, वहां लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था दोनों पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक हो जाता है।
आज मैं जिस विषय पर लिख रहा हूं, वह केवल एक परिवार की कहानी नहीं है। यह एक ऐसी पीड़ा का दस्तावेज है, जो हमारे समाज, हमारी प्रशासनिक व्यवस्था और हमारी राजनीतिक संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यह कहानी है स्वर्गीय मुरारी झा के परिवार की, जो कभी सम्मान, संपन्नता और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था, लेकिन आज उसी परिवार की एक महिला अपने बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।
जिस महिला की तस्वीर आज लोगों के सामने है, वह कोई साधारण महिला नहीं है। वह स्वर्गीय मुरारी झा की धर्मपत्नी हैं। एक ऐसा परिवार, जिसकी पहचान कभी आर्थिक रूप से बेहद मजबूत और सामाजिक रूप से अत्यंत प्रतिष्ठित परिवारों में होती थी। स्थानीय लोगों के अनुसार आज के बाजार मूल्य के हिसाब से परिवार की संपत्ति करोड़ों नहीं बल्कि अरबों रुपये की मानी जाती है। लेकिन विडंबना देखिए कि इतनी बड़ी संपत्ति वाले परिवार की बहू आज जीविका समूह से ऋण लेकर अपने मायके में एक छोटे से कटघरेनुमा घर में रहने को मजबूर है और अपने बच्चों का पालन-पोषण करने के लिए छोटे-मोटे व्यवसाय का सहारा ले रही है।
यह केवल आर्थिक गिरावट नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जहां कभी सम्मान और समृद्धि का जीवन जीने वाला परिवार कुछ वर्षों में ही असुरक्षा, भय, संघर्ष और न्याय की तलाश में भटकने को मजबूर हो जाता है।
परिवार और स्थानीय लोगों द्वारा लगाए जा रहे आरोप अत्यंत गंभीर हैं। आरोप है कि स्वर्गीय मुरारी झा भू-माफियाओं के निशाने पर आ गए थे। कहा जाता है कि बहेरी क्षेत्र में स्थित करोड़ों रुपये मूल्य की भूमि विभिन्न परिस्थितियों में उनसे लिखवा ली गई। जब उन्होंने अपने पैसे और अधिकारों की मांग की, तब परिस्थितियां तेजी से बदलीं। आरोप है कि इसके बाद घटनाओं की ऐसी श्रृंखला शुरू हुई, जिसका अंत उनकी हत्या के रूप में हुआ।
यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी भी आरोप की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया और निष्पक्ष जांच के बाद ही हो सकती है। लेकिन जो प्रश्न समाज के सामने खड़े हैं, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
स्वर्गीय मुरारी झा की मृत्यु के बाद उनका परिवार जिस स्थिति से गुजरा, वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर सकती है। एक ओर पति की असमय मृत्यु का दुख, दूसरी ओर बच्चों की जिम्मेदारी, तीसरी ओर संपत्ति विवाद और चौथी ओर न्याय के लिए संघर्ष। इन सभी परिस्थितियों ने एक महिला को पूरी तरह अकेला कर दिया।
बताया जाता है कि घटना के बाद जब मामले से जुड़े विभिन्न तथ्य और धमकियों से संबंधित घटनाएं सामने आने लगीं, तब पूरे प्रकरण की कई परतें खुलने लगीं। पीड़िता द्वारा दिए गए फर्दबयान के आधार पर बहेरी थाना में मामला दर्ज किया गया। परिवार का दावा है कि पीड़िता ने अपने बयान में एक विशिष्ट व्यक्ति का नाम लिया था और उसी आधार पर पुलिस ने शत्रोहन महतो नामक व्यक्ति को गिरफ्तार भी किया था।
यदि यह तथ्य सही है, तो यह दर्शाता है कि पीड़िता ने किसी अज्ञात व्यक्ति पर नहीं बल्कि एक नामजद व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगाए थे। लेकिन यहीं से मामले ने एक नया मोड़ लेना शुरू किया।
पीड़िता का आरोप है कि बाद के दिनों में प्रभावशाली लोगों ने पूरे मामले को प्रभावित करने का प्रयास किया। आरोप यह भी लगाया गया कि तत्कालीन पुलिस अधिकारियों पर दबाव डाला गया और जांच की दिशा बदल दी गई। पीड़िता का कहना है कि कुछ लोगों ने उनसे सादे कागज पर हस्ताक्षर करवा लिए और उसके बाद मामले की प्रकृति ही बदल गई।
जो मामला पहले नामजद आरोपियों से जुड़ा हुआ बताया जा रहा था, वह धीरे-धीरे अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज मामले में परिवर्तित हो गया। इसके बाद साक्ष्यों के अभाव का हवाला देते हुए अंतिम प्रतिवेदन समर्पित कर दिया गया।
यदि पीड़िता के आरोपों में सच्चाई है, तो यह केवल एक हत्या का मामला नहीं रह जाता। यह न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता, जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा हुआ विषय बन जाता है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज यह महिला न्याय के लिए लगभग अकेली लड़ाई लड़ रही है। न उसके पास बड़े वकीलों की फौज है, न राजनीतिक पहुंच, न आर्थिक संसाधन और न ही सत्ता के गलियारों तक पहुंचने का कोई माध्यम। उसके पास यदि कुछ है तो केवल अपने पति की स्मृतियां, अपने बच्चों का भविष्य और न्याय की उम्मीद।
आज वह जीविका समूह से कर्ज लेकर अपने परिवार का खर्च चला रही है। छोटे स्तर पर व्यवसाय कर रही है। बच्चों की पढ़ाई, भोजन, स्वास्थ्य और भविष्य की चिंता के बीच वह वर्षों से न्याय की लड़ाई भी लड़ रही है। यह संघर्ष केवल अदालतों और पुलिस थानों का नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक दिन का संघर्ष है।
इस पूरे मामले का एक सामाजिक पहलू भी है, जिस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। अक्सर हम समाज में जातीय एकता, सामाजिक सहयोग और सामुदायिक जिम्मेदारी की बातें करते हैं। लेकिन जब किसी परिवार पर संकट आता है, तब वही समाज कई बार मौन हो जाता है।
आज विभिन्न समाजों, संगठनों और राजनीतिक दलों के अनेक प्रभावशाली लोग मौजूद हैं। सांसद हैं, विधायक हैं, मंत्री हैं, बड़े पदाधिकारी हैं। लेकिन पीड़ित परिवार का दर्द यह है कि उनकी लड़ाई किसी बड़े राजनीतिक मुद्दे में परिवर्तित नहीं हो सकी।
शायद इसलिए क्योंकि यह महिला किसी राजनीतिक रैली में हजारों लोगों की भीड़ नहीं जुटा सकती। शायद इसलिए क्योंकि वह किसी चुनाव में निर्णायक वोट बैंक नहीं है। शायद इसलिए क्योंकि उसके पास न धनबल है, न जनबल और न ही राजनीतिक प्रभाव।
लेकिन क्या लोकतंत्र का उद्देश्य केवल प्रभावशाली लोगों की समस्याओं का समाधान करना है? क्या संविधान केवल ताकतवर लोगों की रक्षा के लिए बनाया गया था? क्या न्याय केवल उन्हीं लोगों को मिलना चाहिए जिनके पास आर्थिक और राजनीतिक संसाधन हों?
इन प्रश्नों का उत्तर निश्चित रूप से "नहीं" है।
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार देता है। कानून की नजर में सभी समान हैं। लेकिन जब जमीन पर वास्तविक परिस्थितियों को देखा जाता है, तब कई बार यह समानता केवल किताबों तक सीमित दिखाई देती है।
यही कारण है कि आज समाज में यह भावना बढ़ती जा रही है कि प्रभावशाली लोगों के सामने कानून कमजोर पड़ जाता है। यदि यह धारणा मजबूत होती है, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है।
जब अपराधी यह महसूस करने लगें कि वे अपने प्रभाव और संसाधनों के बल पर जांच को प्रभावित कर सकते हैं, तब कानून का भय समाप्त होने लगता है। और जब कानून का भय समाप्त हो जाता है, तब अपराध का साहस बढ़ने लगता है।
यही कारण है कि ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच केवल एक परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आवश्यक होती है। यदि कहीं भी जांच में त्रुटि हुई है, यदि किसी स्तर पर प्रभाव का उपयोग हुआ है, यदि किसी पीड़ित की आवाज दबाई गई है, तो उसका सत्य सामने आना चाहिए।
इस पूरे मामले में मीडिया की भूमिका भी उल्लेखनीय है। वरिष्ठ पत्रकार जगजीत झा द्वारा इस परिवार की स्थिति और संघर्ष को सामने लाने का प्रयास यह दर्शाता है कि पत्रकारिता केवल खबर लिखने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के वंचित और पीड़ित वर्ग की आवाज बनने का भी दायित्व निभाती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और स्वतंत्र समीक्षा की जाए। यदि आवश्यक हो तो उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। पीड़ित परिवार को कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाए। उनके बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उन्हें यह विश्वास दिलाया जाए कि न्याय अभी भी जीवित है।
क्योंकि किसी भी सभ्य समाज में एक विधवा की पुकार केवल उसकी व्यक्तिगत आवाज नहीं होती। वह उस समाज की आत्मा की आवाज होती है।
आज स्वर्गीय मुरारी झा की धर्मपत्नी केवल अपने पति के लिए न्याय नहीं मांग रही हैं। वह अपने बच्चों का भविष्य मांग रही हैं। वह व्यवस्था से जवाब मांग रही हैं। वह समाज से संवेदनशीलता मांग रही हैं।
उनकी मांग कोई विशेषाधिकार नहीं है। उनकी मांग केवल इतनी है कि सत्य सामने आए, दोषियों की निष्पक्ष जांच हो और न्याय स्थापित हो।
और यदि एक लोकतांत्रिक समाज अपने सबसे कमजोर नागरिक को न्याय नहीं दिला सकता, तो फिर उसे स्वयं से यह प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए कि उसकी प्रगति, उसकी राजनीति और उसकी व्यवस्था का वास्तविक उद्देश्य क्या है।
(लेखक अशोक कुमार झा वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक तथा रांची दस्तक एवं PSA Live News के संपादक हैं। प्रस्तुत लेख जनसरोकार, न्याय व्यवस्था और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़े मुद्दों पर आधारित है।)
Reviewed by PSA Live News
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10:25:00 pm
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