भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर: भोजपुर से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची लड़ाई, बिहार की राजनीति में मचा भूचाल, NIA-CBI जांच की मांग तेज
विशेष संवाददाता, PSA LIVE NEWS
आरा/पटना/रांची। भोजपुर जिले के शाहपुर प्रखंड अंतर्गत बिलौटी गांव निवासी सामाजिक कार्यकर्ता भारत भूषण तिवारी की पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत अब केवल एक आपराधिक घटना या पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह बिहार की राजनीति, मानवाधिकार, न्यायिक प्रक्रिया और कानून व्यवस्था पर राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है। घटना के बाद से लगातार उठ रहे सवालों, विपक्षी दलों के हमलों, सामाजिक संगठनों के विरोध और न्यायिक जांच की मांगों ने राज्य सरकार को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। अब यह मामला पटना हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है, जहां स्वतंत्र जांच और सीबीआई जांच की मांग की गई है।
भोजपुर के बिलौटी गांव में हुई इस मुठभेड़ के बाद सबसे तीखी प्रतिक्रिया सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार समूहों की ओर से सामने आई है। अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद ने इस पूरी घटना को संदिग्ध बताते हुए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) अथवा किसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी से जांच कराने की मांग की है। परिषद का आरोप है कि यदि भारत भूषण तिवारी वास्तव में आत्मसमर्पण करने जा रहे थे, तो उन्हें जीवित गिरफ्तार करने के बजाय गोली मारने की नौबत क्यों आई। संगठन का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी नागरिक को न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने का अधिकार प्राप्त है और पुलिस किसी भी स्थिति में अदालत का विकल्प नहीं बन सकती।
परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार झा ने कहा कि भारत भूषण तिवारी वर्षों से सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए थे और क्षेत्र में उनकी एक अलग पहचान थी। गरीबों, किसानों और सामाजिक मुद्दों पर उनकी सक्रियता उन्हें आम लोगों के बीच लोकप्रिय बनाती थी। ऐसे व्यक्ति को अपराधी के रूप में प्रस्तुत कर मुठभेड़ में मार देना अनेक गंभीर सवाल पैदा करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूरे मामले में शुरू से ही एक पूर्व निर्धारित कथा गढ़ी गई और उसके आधार पर कार्रवाई को उचित ठहराने की कोशिश की गई।
इधर, इस मामले ने बिहार की राजनीति में भी जबरदस्त हलचल पैदा कर दी है। विपक्ष लगातार राज्य सरकार को घेर रहा है और मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए उच्चस्तरीय जांच की मांग कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भरत भूषण तिवारी प्रकरण आने वाले विधानसभा चुनावों में भी एक बड़ा मुद्दा बन सकता है, क्योंकि यह मामला सीधे तौर पर कानून व्यवस्था, पुलिस की जवाबदेही और नागरिक अधिकारों से जुड़ गया है।
घटना के बाद बढ़ते दबाव को देखते हुए बिहार सरकार ने न्यायिक जांच का निर्णय लिया है। सरकार की ओर से संकेत दिए गए हैं कि मामले की जांच एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा कराई जाएगी ताकि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष समीक्षा हो सके। हालांकि आलोचकों का कहना है कि न्यायिक जांच की घोषणा के बावजूद लोगों के मन में संदेह बना हुआ है और वे केंद्रीय एजेंसी से जांच की मांग पर कायम हैं।
इस बीच भारत भूषण तिवारी का परिवार भी खुलकर सामने आया है। परिजनों ने घटना को संदिग्ध बताते हुए सीबीआई जांच की मांग की है। उनकी माता ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि उन्हें राज्य पुलिस की जांच पर भरोसा नहीं है और यदि सच्चाई सामने लानी है तो किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच करानी होगी। बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह भी पीड़ित परिवार से मिले और उन्होंने भरोसा दिलाया कि मामले में न्याय सुनिश्चित करने के लिए सरकार के समक्ष उनकी बात रखी जाएगी।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब यह सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका में पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच कराने की मांग की गई है। वहीं पटना हाईकोर्ट में भी एक जनहित याचिका दाखिल कर स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि पुलिस कार्रवाई पूरी तरह वैध थी तो सरकार को स्वतंत्र जांच से डरने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
राजनीतिक स्तर पर सबसे चर्चित प्रतिक्रिया केंद्रीय मंत्री एवं हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के संरक्षक Jitan Ram Manjhi की ओर से आई है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से पुलिस कार्रवाई का समर्थन करते हुए कहा कि यदि अपराधी पुलिस पर हमला करते हैं और पुलिस जवाबी कार्रवाई करती है तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। मांझी ने सवाल उठाया कि जब पुलिसकर्मी मारे जाते हैं तब उतनी चर्चा नहीं होती, लेकिन जब पुलिस कार्रवाई करती है तो उस पर सवाल खड़े किए जाते हैं। उनके इस बयान ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है, क्योंकि एक ओर मानवाधिकार संगठन कार्रवाई को संदिग्ध बता रहे हैं तो दूसरी ओर सत्ता पक्ष के नेता पुलिस के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे हैं।
भरत भूषण तिवारी प्रकरण ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार को भी कठिन स्थिति में ला खड़ा किया है। कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि सरकार की कानून-व्यवस्था की नीति अब सीधे तौर पर इस मामले की जांच और उसके निष्कर्षों से आंकी जाएगी। यदि जांच में किसी प्रकार की प्रक्रिया संबंधी त्रुटि सामने आती है तो सरकार को गंभीर राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। दूसरी ओर यदि पुलिस की कार्रवाई को वैध पाया जाता है तो सरकार इसे कानून व्यवस्था की सफलता के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करेगी।
इस पूरे विवाद के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का एक पुराना बयान भी चर्चा में आ गया है, जिसमें उन्होंने अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही थी। सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर उस बयान को वर्तमान घटना से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि सरकार की ओर से अब तक इस संबंध में कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं की गई है।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह मामला केवल भारत भूषण तिवारी की मौत तक सीमित नहीं है। यह प्रश्न देश की न्याय व्यवस्था, पुलिस की जवाबदेही और नागरिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है। यदि किसी व्यक्ति को अदालत में अपना पक्ष रखने का अवसर मिले बिना मुठभेड़ में मार दिया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय बन सकता है। दूसरी ओर पुलिस समर्थक समूहों का तर्क है कि अपराध और कानून-व्यवस्था की चुनौतियों से निपटने के लिए पुलिस को कठोर कदम उठाने पड़ते हैं।
फिलहाल बिहार की राजनीति, सामाजिक संगठनों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आम जनता की निगाहें जांच प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में न्यायिक जांच, अदालतों की सुनवाई और सरकार की अगली कार्रवाई तय करेगी कि भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामला बिहार की राजनीति का एक क्षणिक विवाद बनकर रह जाता है या फिर यह राज्य की कानून व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दूरगामी प्रभाव डालने वाला ऐतिहासिक प्रकरण साबित होता है।
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11:37:00 pm
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